{"_id":"6844d02cbf36929c8c0da226","slug":"many-friends-behind-one-enemy-reconsider-indian-military-strategy-and-foreign-policy-with-new-thinking-2025-06-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"एक दुश्मन के पीछे उसके कई ‘दोस्त’: भारतीय सैन्य रणनीति और विदेश नीति पर फिर से विचार जरूरी, नई सोच के साथ...","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
एक दुश्मन के पीछे उसके कई ‘दोस्त’: भारतीय सैन्य रणनीति और विदेश नीति पर फिर से विचार जरूरी, नई सोच के साथ...
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
कैबिनेट की बैठक में पीएम मोदी (फाइल)
- फोटो :
यूट्यूब वीडियो ग्रैब- पीएम मोदी
विस्तार
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने 31 मई, 2025 को सिंगापुर में ब्लूमबर्ग और रॉयटर्स को एक साक्षात्कार दिया। मौका था शांगरी-ला वार्ता का। यह ट्रैक वन इंटर-गवर्नमेंटल सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस है, जो हर साल सिंगापुर में अंतरराष्ट्रीय सामरिक अध्ययन संस्थान (आईआईएसएस) द्वारा आयोजित की जाती है। इस साक्षात्कार के लिए जो समय, स्थान और मीडिया का चयन किया गया, वह आश्चर्यजनक तो था, लेकिन गलत नहीं था।
सच तो एक न एक दिन बताना ही था। मुझे लगता है कि ज्यादा अच्छा यह होता कि संसद का विशेष सत्र बुलाया जाता और प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्री ऑपरेशन सिंदूर पर बयान देते तथा विपक्ष को चर्चा के लिए आमंत्रित करते। हालांकि बयान को लेकर जनरल चौहान और विदेश सचिव विक्रम मिसरी को ट्रोल किया जाना काफी दुखद था।
नफा और नुकसान
जनरल चौहान बिना किसी उच्चस्तरीय निर्देश के ऐसी बात नहीं कह सकते हैं। उन्होंने सीधी और सरल बातें कहीं कि भारतीय सेना ने अपने उद्देश्य को प्राप्त किया, लेकिन उसे कुछ नुकसान भी उठाना पड़ा। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि 7 मई को सामरिक स्तर पर कुछ गलतियां हुईं, लेकिन सैन्य अधिकारियों ने फिर से रणनीति बनाई और भारत ने 9 एवं 10 मई की रात को पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए नए सिरे से हमला किया। सीडीएस ने नुकसान के बारे में तो नहीं बताया, लेकिन स्वतंत्र विशेषज्ञ और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के अनुसार, भारत को तीन राफेल, एक सुखोई और एक मिग विमान का नुकसान हुआ।
‘रणनीतिक गलतियों’ और ‘नुकसान’ वाले मुद्दे का विश्लेषण सैन्य विशेषज्ञों द्वारा किया जाना जरूरी है, न कि टीवी पर बिना पूरी जानकारी के होने वाली बहस में। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी (कुछ सत्यापित, कुछ नहीं) से कुछ बातें स्पष्ट हैं-भारतीय लड़ाकू विमान और मिसाइलों ने 7 मई की अलसुबह हमला कर पाकिस्तान के 9 आतंकी ठिकानों को नष्ट या पूरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया।
पाकिस्तान ने भी 8 मई को जवाबी कार्रवाई की और भारत पर ड्रोन से हमले किए। पाकिस्तान ने गाइडेड मिसाइल भी तैनात की। भारतीय विमान 8 मई को गायब हो गए थे। पुणे में 4 जून को सीडीएस द्वारा दिए गए बयानों से ऐसा लगा कि भारतीय विमान अपने ही हवाई क्षेत्र में गायब हो गए और दूसरे विमानों को 8 तथा 9 मई को जमीन पर उतार दिया गया।
दोबारा रणनीति बनाने के बाद भारतीय विमान, मिसाइल और ड्रोन ने 9 और 10 मई को फिर से हमले किए। भारतीय विमान ने अपने हवाई क्षेत्र में रहते हुए ब्रह्मोस मिसाइल दागे और पाकिस्तान के 11 सैन्य ठिकानों पर हमला किया। 10 मई को कार्रवाई रोक दी गई।
चीन का छद्म युद्ध
इस लेख का उद्देश्य शौकिया सैन्य विश्लेषक बनना नहीं है। इसका उद्देश्य यह बताना है कि भारत ने खुद को एक नई स्थिति में पाया है। अब यह पूरी तरह से स्पष्ट हो चुका है कि चीनी विमान (जे-10), मिसाइल (पीएल-15) और चीनी वायु रक्षा प्रणालियां पूरी तरह से पाकिस्तान की रक्षा आक्रमण रणनीति में शामिल थीं। दुर्भाग्य यह था कि पाकिस्तानी पायलट चीन के विमान में थे। पाकिस्तानी सेना की उंगली चीनी मिसाइलों पर थी और उसके जनरल चीनी सेना के जनरल द्वारा बनाई गई योजनाओं पर काम कर रहे थे। इसके अलावा ऐसा लगता है कि चीन के उपग्रह और चीनी एआई ने पाकिस्तान की मदद की। संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि चीन ने छद्म युद्ध का उपयोग, अपने सैन्य उपकरणों का परीक्षण भारत के खिलाफ किया।
अब हम दूसरे बड़े मुद्दे की ओर चलते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए तीन सूत्री सिद्धांत इस पूरी तरह बदली हुई स्थिति में कितने प्रासंगिक और प्रभावकारी हैं? यह सिद्धांत कहता है कि भारत पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध लड़ेगा। अब ऐसा नहीं है। अब यह स्पष्ट है कि अगर भारत पर युद्ध थोपा जाता है तो भारत पाकिस्तान और चीन के खिलाफ युद्ध लड़ेगा, जो मिलकर एक ही दुश्मन बन गए हैं।
प्रधानमंत्री मोदी के तीन सूत्री सिद्धांतों में से एक है कि हर आतंकी हमले का उसी भाषा में जवाब दिया जाएगा। भारतीय सेना द्वारा उरी के जवाब में गुप्त हमला या भारतीय वायु सेना द्वारा पठानकोट के जवाब में किए गए हवाई हमले सिर्फ धमकाने वाली कार्रवाई नहीं थी। यही वजह है कि पहलगाम की प्रतिक्रिया में चार दिनों का युद्ध हुआ। अगर आतंकी हमले नहीं रुकते हैं तो क्या होगा? एक लंबा चलने वाला युद्ध या फिर एक दुश्मन देश के पीछे खड़े उसके कई ‘दोस्त’?
विदेश और सैन्य नीतियां
नरेंद्र मोदी के शासन काल में बनी भारतीय विदेश नीति बदली हुई परिस्थिति में नाकाफी साबित हुई है। भारत के विरोध के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने विस्तारित निधि सुविधा (ईएफएफ) के तहत पाकिस्तान को 1 बिलियन यूएस डॉलर दिया है, जिससे कुल संवितरण 2.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। 3 जून को एडीबी ने पाकिस्तान को 800 मिलियन यूएस डॉलर मंजूर किए हैं। हाल ही में विश्व बैंक ने पाकिस्तान को दस सालों के लिए 40 बिलियन यूएस डॉलर ऋण देने का निर्णय लिया है। इन निर्णयों में अमेरिका और चीन दोनों एक ही तरफ हैं। सबसे दुखद यह है कि पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तालिबान प्रतिबंध समिति का अध्यक्ष और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आतंकवाद निरोधी समिति का उपाध्यक्ष चुना गया! (स्रोत: श्री पवन खेड़ा, अध्यक्ष, एआईसीसी मीडिया एवं प्रचार विभाग)
यह सब ऑपरेशन सिंदूर के दौरान और उसके बाद हुआ है, जब हमारे सांसदों के प्रतिनिधिमंडल विश्वभर के देशों को पाकिस्तान की करतूतों के बारे में बता रहे थे। हर देश ने आतंकी घटना की निंदा की, लेकिन जहां तक मुझे पता है, किसी भी देश ने पाकिस्तान की निंदा नहीं की।
जैसा कि मैंने पहले भी लिखा था, अब समय आ गया है कि हम भारत की सैन्य रणनीति और विदेश नीति पर नई सोच के साथ फिर से विचार करें।