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प्रधानमंत्री का जुबानी जमाखर्च

Tue, 09 Apr 2013 11:02 PM IST
सीताराम येचुरी
सीताराम येचुरी Updated Tue, 09 Apr 2013 11:02 PM IST
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manmohan singh speech at cii was clever

हाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के राष्ट्रीय सम्मेलन में यह कहकर ‘फील गुड’ कराने की कोशिश की कि हम फिर से आठ फीसदी की वृद्धि दर पर पहुंच सकते हैं।

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यह दावा करते हुए कि, ‘हम अपने स्वतांत्र्योत्तर आर्थिक इतिहास के एक निर्णायक चरण में प्रवेश कर गए हैं', प्रधानमंत्री ने आग्रह किया कि भारतीय उद्योग जगत को उनके दृढ़-संकल्प पर भरोसा रखना चाहिए और नकारात्मकता की मानसिकता से बचना चाहिए।’
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उन्होंने यह दावा भी किया कि आज यह सर्वानुमति है कि अगर सरकार तेजी से कार्रवाई नहीं करेगी, तो विकास दर, जो पहले ही घट गई है, पांच फीसदी पर ही अटकी रह जाएगी।’ इसके आधार पर प्रधानमंत्री ने सरकार की ओर से त्वरित तथा निर्णायक कार्रवाई की पैरवी भी की।
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‘समावेशी विकास’ के नाम पर जुबानी जमाखर्च अपनी जगह, प्रधानमंत्री ने साफ कर दिया कि इस तरह की सरकारी कार्रवाई में सारा जोर इस पर होना चाहिए कि राजकोषीय सुदृढ़ीकरण हो और देश में निवेश के लिए बेहतर वातावरण बने।

उनके मुताबिक, मौजूदा विश्व परिदृश्य को देखते हुए ऐसा करना और भी जरूरी हो गया है। जहां तक राजकोषीय सुदृढ़ीकरण का सवाल है, प्रधानमंत्री सब्सिडियों को विवेकपूर्ण बनाने (वास्तव में घटाने) में और खासतौर पर ईंधन सब्सिडी को नीचे लाने में काफी गर्व का अनुभव करते हैं।

उन्होंने जोर देकर यह भी कहा कि आधार पर टिकी नकदी हस्तांतरण योजना अगले साल सब्सिडी के बोझ को कम करेगी।

दूसरी ओर इस सरकार द्वारा इंडिया इंक और संपन्न तबकों को दी जा रही विशाल रियायतों के बारे में प्रधानमंत्री ने एक शब्द भी नहीं कहा है। पिछले वित्त वर्ष में सरकार द्वारा छोड़ा गया कर राजस्व, इस वित्त वर्ष के समूचे राजकोषीय घाटे से 50,000 करोड़ रुपये ज्यादा रहा था।

अमीरों को दी जाने वाली कर रियायतों को आर्थिक विकास के लिए ‘प्रोत्साहन’ कहा जाता है, जबकि गरीबों को दी जाने वाली रियायतों को ‘सब्सिडी’ कहा जाता है और उसे अर्थव्यवस्था पर बोझ माना जाता है।

प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में नियामक ऊंचाई हासिल करने की नेहरूवादी दृष्टि को ही शीर्षासन करा दिया। उन्होंने कहा कि सरकार आर्थिक वृद्धि की मुख्य संचालक नहीं है।

घरेलू निवेशों के रास्ते की नौकरशाहीपूर्ण बाधाओं तथा पर्यावरण अनुमतियों को आसान बनाने के लिए अपनी सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों को रेखांकित करने के साथ ही साथ प्रधानमंत्री ने, विदेशी निवेश को आकर्षित करने की प्रक्रिया को तेज करने पर जोर दिया।

उन्होंने जहां खुदरा व्यापार, नागरिक उड्डयन तथा अन्य क्षेत्रों में विदेशी निवेश की इजाजत दिए जाने को महत्वपूर्ण संकेत बताया, वहीं इसका ऐलान भी किया कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति की चौतरफा समीक्षा की जा रही है, ताकि यह पता लग सके कि आने वाले महीनों में और क्या किया जा सकता है।

एक तरह से नई पीढ़ी के कथित सुधारों के एक और चक्र की ही घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि सुधार के दूसरे कदमों के लिए भी मन बनाया जा रहा है। वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार कमेटी ने अनेक सिफारिशें की हैं, जिन पर सावधानी से विचार किया जाएगा।

उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र के संबंध में हाल ही में उठाए गए विधायी कदमों का भी स्वागत किया, जिनसे विदेशी निजी बैंकों को भारतीय बचतें बटोरने का मौका मिल जाएगा और इस तरह बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बुनियादी तर्क को ही पलट दिया जाएगा।

दूसरे शब्दों में अब ठीक उन्हीं व्यवस्थाओं को पलटा जाना है, जिनके सहारे भारत 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बावजूद, पूरी तरह से बर्बाद होने से बचा रह गया था। आज देश के सामने आर्थिक वृद्धि में गिरावट की समस्या खड़ी है। लेकिन, दुरुस्ती के लिए जो रणनीति पेश की जा रही है, वह निवेश में गिरावट के रुझान को पलटने के गलत विश्लेषण पर आधारित है।

प्रधानमंत्री कहते हैं कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर, मजबूती से निवेश की दर के साथ जुड़ी हुई है। लेकिन सवाल यह है कि आखिरकार निवेश में गिरावट आई ही क्यों? पिछले तीन वर्षों में भारी रियायतें दिए जाने के बावजूद औद्योगिक व विनिर्माण वृद्धि दर में और वास्तव में समग्र वृद्धि दर में ही गिरावट हुई है।

इस गिरावट की वजह, इस सच्चाई में छिपी हुई है कि जब तक अर्थव्यवस्था में क्रय शक्ति नहीं होगी, निवेश में ही बढ़ोतरी के प्रयासों से कभी वृद्धि हासिल नहीं हो सकती है। आखिरकार, जिस चीज का भी उत्पादन होता है, उसका बिकना वृद्धि के लिए भी जरूरी होता है और मुनाफा हासिल करने के लिए भी।

दूसरी ओर जहां तक घरेलू बाजार का सवाल है, सब्सिडियों में कटौती, ईंधन की कीमतों में की गई बढ़ोतरियों और चौतरफा मुद्रास्फीति के जरिये तेजी से बढ़ रही है, भारतीय जनता के विशाल बहुमत के हाथों से क्रय शक्ति को निचोड़ा जा रहा है।

इसलिए आज जबकि विश्व स्तर पर तथा घरेलू स्तर पर भी, क्रयशक्ति गिरावट पर है, अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ने के रुझान को पलटने का एक ही रास्ता है कि भारतीय जनता के हाथों में क्रयशक्ति बढ़े।

लेकिन यह तभी हो सकता है, जब यूपीए सरकार संपन्नों को भारी कर रियायतें देना बंद करे और इससे बचने वाले संसाधनों का उपयोग बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निवेशों में करे।


इन निवेशों के बल पर बुनियादी ढांचे को खड़ा किया जा सकता है और बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

इसके फलस्वरूप घरेलू मांग में जो बढ़ोतरी होगी, उससे बढ़ते हुए निवेशों के लिए उत्प्रेरण मिलेगा और देश कहीं ज्यादा वहनीय विकास रणनीति की पटरी पर चल पड़ेगा।

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