फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Manifesto in the middle of debate

बीच बहस में घोषणापत्र

Thu, 04 Apr 2019 06:22 PM IST
नीरजा चौधरी नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Published by: नीरजा चौधरी Updated Thu, 04 Apr 2019 06:22 PM IST
विज्ञापन
Manifesto in the middle of debate
कांग्रेस का घोषणा पत्र

दिवंगत जाट नेता और पूर्व प्रधानमंत्री देवीलाल पार्टियों के चुनावी घोषणापत्र का तिरस्कार करते थे। वह कहते थे कि सभी पार्टियों के घोषणापत्रों में कमोबेश एक जैसी ही सामग्री होती है, इसलिए आप अंदर की सामग्री उठाकर उसके आवरण पर अपना नाम और अपनी पार्टी का चुनाव चिह्न डालकर काम चला सकते हैं।


loader

एक समय था, जब चुनावों में घोषणापत्रों को गंभीरता से नहीं लिया जाता था। घोषणापत्र प्रेस को जारी किए जाते थे और फिर वे पार्टी कार्यालय में ढेर के रूप में पड़े रहते थे, जिन्हें बाद में रद्दी के रूप में बेच दिया जाता था। मीडिया भी उसमें मात्र कुछ घंटे ही दिलचस्पी दिखाती थी। वे औपचारिकता निभाने के लिए उसके बारे में लिखते थे और फिर किसी को याद नहीं रहता था कि उसमें क्या कहा गया है। राजनेता स्वयं भी उसे एक रस्म के तौर पर जारी करते थे, जो उन्हें करना होता था और फिर तुरंत उसे भुला देते थे।

लेकिन चीजें बदल रही हैं और अन्यथा तेजी से विवादास्पद होती राजनीति में यह एक सकारात्मक पहलू है। घोषणापत्र आखिर मतदाताओं को विकल्पों के बारे में सूचित करने में मददगार ही होते हैं। प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति आखिरकार पार्टियों को उनके वादे के हर पहलू पर अधिक सोचने के लिए मजबूर कर रही है, जिसमें योजनाओं  का वित्तपोषण भी शामिल है और क्रियान्वयन भी। आप मानें या न मानें, पर हाल में जारी कांग्रेस का घोषणापत्र अच्छी तरह से तैयार दस्तावेज है, और अगर राहुल गांधी की मानें, तो इसे तैयार करने में छह महीने लगे हैं। पार्टी ने दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों से सलाह करके न्याय योजना तैयार की है, जिसके तहत बीस फीसदी अति निर्धन परिवारों को प्रति महीने 6,000 रुपये देने का वादा किया गया है।

खैरात बनाम विकास पर बहस को अलग रखें, तो न्याय योजना ने सत्तारूढ़ पार्टी की चिंता बढ़ा दी है। रोजगार का अभाव आज अन्य किसी भी मुद्दों की तुलना में लोगों को ज्यादा आंदोलित कर रहा है, भले ही इसे पुलवामा और बालाकोट मामले से ढकने की कोशिश हो रही हो। भाजपा समर्थकों तक का मानना है कि इसका असर हो सकता है। सवाल हालांकि यह है कि क्या कांग्रेस आखिरी मतदाता तक अपना संदेश पहुंचा पाएगी। जैसे कांग्रेस बार-बार प्रत्येक व्यक्ति के खाते में पंद्रह लाख रुपये ट्रांसफर करने और दो करोड़ रोजगार सृजित करने के वादे पूरे न कर पाने के लिए भाजपा की खिंचाई करती है, वैसे ही भाजपा 50 साल से अधिक समय तक सत्ता में रही कांग्रेस की गरीबी उन्मूलन में विफल रहने के लिए आलोचना कर रही है, जिसका वह अभी वादा कर रही है। वे कहते हैं कि इंदिरा गांधी ने ही 1971 के चुनाव में ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था।

कांग्रेस ने जीडीपी का छह प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने का वादा किया है, जो सबसे आकर्षक है। हमारे सरकारी स्कूलों की दुर्दशा को देखते हुए कांग्रेस ने बारहवीं तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का भी वादा किया है। स्वाभाविक रूप से भाजपा प्रवक्ता पूछ रहे हैं कि इसके लिए पैसे कहां से आएंगे, बुनियादी संरचनाओं का निर्माण और शिक्षकों को प्रशिक्षित कौन करेगा।

अपने बच्चों को स्वास्थ्य-पोषण और शिक्षा का महत्वपूर्ण आधार दिए बिना भारत नई ऊंचाइयों को नहीं छू सकता। हम सभी जानते हैं कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो रास्ते निकल आते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रतिस्पर्धी राजनीति भाजपा को कांग्रेस के इस दांव का काट ढूंढने के लिए विवश करती है या नहीं और मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के सामने इसका कोई रास्ता है या नहीं।

अलबत्ता यह हैरान करने वाला है कि कांग्रेस के घोषणापत्र में बाल कुपोषण से मुकाबला करने के लिए ऐसा कोई लक्ष्य नहीं है। जबकि हार्वर्ड के एक प्रोफेसर के नेतृत्व में एक टीम द्वारा किए गए अध्ययन में बताया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी, सोनिया गांधी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह और कई अन्य प्रमुख नेताओं के संसदीय क्षेत्र में बौनेपन और एनीमिया की स्थिति भीषण है। घोषणापत्र में हालांकि बच्चों के लिए पोषक आहार की गुणवत्ता में सुधार के लिए समेकित बाल विकास योजना के विस्तार के बारे में जोर डाला गया है। पर इसमें कुपोषण खत्म करने के लिए देशव्यापी युद्ध छेड़ने की बात शामिल नहीं है। यह तब है, जब देश के हर पांच में से दो बच्चे बौने कद के हैं और खुद पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कुपोषण को 'राष्ट्रीय शर्म' बता चुके हैं।

घोषणापत्र के जरिये कांग्रेस ने चुनावी बहस को आर्थिक मुद्दों पर लाने की कोशिश की है, जिसने इसे राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में बढ़त प्रदान की। उसने न सिर्फ न्याय का वादा किया है, बल्कि मनरेगा में भी कार्य दिवसों को बढ़ाकर 150 करने, 22 लाख खाली सरकारी पदों को भरने और ग्राम पंचायतों में दस लाख रोजगार पैदा करने के प्रति प्रतिबद्धता जताई है। इसके अलावा संकटग्रस्त किसानों के लिए भी संदेश है, जैसे पार्टी के सत्ता में आने पर किसानों के लिए अलग बजट, या कर्ज न चुकाने वाले किसानों पर आपराधिक नहीं, बल्कि दीवानी मुकदमा चलाने जैसी बात, आदि।

लेकिन भाजपा को राष्ट्रवाद के अपने प्रमुख मुद्दे पर वापस लौटने में मिनट भी नहीं लगे। अरुण जेटली ने राजद्रोह कानून खत्म करने तथा अफ्स्पा पर पुनर्विचार करने जैसे वादों को 'खतरनाक' बताते हुए कांग्रेस को आड़े हाथों लिया। स्पष्ट है कि कांग्रेस अपने पिछले रिकॉर्ड के विपरीत मानवाधिकार का सम्मान करते हुए उदार बातें करने की कोशिश कर रही है, जिनका कुछ लोगों द्वारा स्वागत किया जा सकता है।

घोषणापत्र के वादों पर जंग ने एक बार फिर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है और 2019 के चुनावी समर का मुख्य विषय है-राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम रोजगारहीनता। इसने यह भी रेखांकित किया है कि मतदाताओं से ज्यादा विरोधी पार्टी ही अपने प्रतिद्वंद्वी के वादों पर नजर रखेंगी और उसे पूरा किए जाने पर सतर्क रहेंगी। उम्मीद है, इससे दोनों पक्षों में जवाबदेही बढ़ेगी। लेकिन यह हमारे राष्ट्रीय बहस से बीच की जगह के गायब होते जाने के प्रति चेतावनी भी है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed