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मतदाताओं की पाठशाला: जनादेश में राजनीतिक दलों और राजनेताओं के लिए कई सबक हैं

Tue, 29 Oct 2019 05:38 AM IST
शंकर अय्यर शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Published by: शंकर अय्यर Updated Tue, 29 Oct 2019 05:38 AM IST
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Mandate given by Maratha and Jat voters has many lessons for political parties and politicians
मतदान केंद्र पर लगी लंबी लाइन - फोटो : PTI

तथ्य और छवियां विधानसभा चुनावों की कहानी सबसे बेहतर तरीके से बयान कर रही हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा में भाजपा ने 73.5 लाख वोट हासिल किए थे और उसे 79 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। अक्तूबर, 2019 में भाजपा को 45.6 लाख वोट मिले और वह चालीस सीटों के साथ बहुमत से पीछे रह गई।


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तथ्य और छवियां विधानसभा चुनावों की कहानी सबसे बेहतर तरीके से बयान कर रही हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा में भाजपा ने 73.5 लाख वोट हासिल किए थे और उसे 79 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। अक्तूबर, 2019 में भाजपा को 45.6 लाख वोट मिले और वह चालीस सीटों के साथ बहुमत से पीछे रह गई।

मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करते समय इस बार मनोहर लाल खट्टर को जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के युवा नेता दुष्यंत चौटाला के साथ मंच साझा करना पड़ा, जिन्होंने उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने लोकसभा चुनाव में राज्य के 230 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी। अक्तूबर, 2019 में 288 विधानसभा चुनाव में 161 सीटों के मजबूत बहुमत के बावजूद सरकार गठन को लेकर शिवसेना के साथ अभी बातचीत चल ही रही है।

शिवसेना चाहती है कि 29 वर्षीय आदित्य ठाकरे को आधे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री बनाया जाए और मौजूदा परिदृश्य में भाजपा को कम से कम उपमुख्यमंत्री का पद शिवसेना को देना पड़ सकता है। लोकतंत्र की महिमा का प्रदर्शन चरम पर है। मराठा और जाटों के गढ़ में मतदाताओं ने जो जनादेश दिया है, उसमें राजनीतिक दलों और राजनेताओं के लिए कई सबक हैं।

पहला सबक : चुनावी पर्यटकों के खिलाफ वोट। कैंसर को पराजित करने वाले 79 वर्षीय शरद पवार की वह तस्वीर, जिसमें उन्होंने प्रचार के दौरान सतारा में भारी बारिश के बीच छाता लेने से इनकार कर दिया था, हाल के चुनावों की सबसे स्थायी तस्वीर बनी रहेगी। उन्होंने दमखम लगाकर अपनी पार्टी को 54 सीटों पर विजय दिलाई। मतदाताओं ने उन नेताओं और पार्टियों को खारिज कर दिया, जो सामने नहीं आए। यह सबक खासतौर से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जो हाई कमांड संस्कृति पर यकीन करते हैं और नाराजगी को राजनीतिक दर्शन तथा उम्मीद को सबसे व्यावहारिक रणनीति मानते हैं।

दूसरा सबक : मतदाता मोदी पर तो निवेश करना चाहते हैं, भाजपा पर नहीं। मसलन, इंडिया टुडे एक्सिस माई इंडिया सर्वे में भाजपा को वोट देने वाले 60 फीसदी मतदाताओं ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और केंद्र सरकार के काम को देखते हुए वोट दिया। यानी भावनाएं और भरोसा ही पर्याप्त नहीं।

तीसरा सबक : आखिर यह अर्थव्यवस्था का मामला है। चाहे विदर्भ, पश्चिमी महाराष्ट्र या फिर ग्रामीण हरियाणा हो, नतीजे कृषि क्षेत्र की हताशा और रोजगार की चिंता को दिखाते हैं। हरियाणा में किसानों, खेतिहर मजदूरों, बेरोजगारों और 18 से 35 वर्ष के मतदाताओं ने भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को पसंद किया (एक्सेसिमाई इंडिया सर्वे)। यह महत्वपूर्ण है कि इन मुद्दों का समाधान न होने से हताशा और जाति में गठजोड़ बन गया और इस वर्ग ने जाति के आधार पर वोट दिया।

चौथा सबक :  हर टीम को एक कप्तान की जरूरत होती है। स्थानीय नेतृत्व को ताकत देने से कांग्रेस को पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में लाभांश मिला है। लेकिन अभी हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस नेतृत्व के सवाल पर उलझी रही। कुमारी सैलजा और भूपिंदर सिंह हुड्डा की नियुक्तियां जब हुईं, तब चुनाव को चालीस दिन भी नहीं बचे थे, लेकिन उन्होंने भाजपा को अपने दम पर बहुमत हासिल करने से रोक दिया। महाराष्ट्र में दो चव्हाणों के बीच भ्रम बना रहा। पवार की मेहरबानी से पार्टी सतह पर नजर आई, जिन्होंने अपने नेटवर्क का इस्तेमाल कर अपने अनमने सहयोगी को ताकत दी और कांग्रेस के अपने साथियों के लिए प्रचार किया।

पांचवा सबक :  आरक्षण अच्छा है, पर पर्याप्त नहीं। देवेंद्र फडणवीस ने मराठाओं को आरक्षण देने की पहल की, पर यह पर्याप्त नहीं था। भाजपा ने विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच अच्छा प्रदर्शन किया, पर पश्चिमी और उत्तरी महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस का बेहतर प्रदर्शन और ग्रामीण हरियाणा में कांग्रेस के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी सत्तारूढ़ दल के लिए संकेत है।

छठा सबक : संगठन मायने रखता है। भारत के आर्थिक केंद्र मुंबई में महाराष्ट्र की 288 में से 36 सीटें हैं। डेढ़ साल के भीतर कांग्रेस ने मुंबई के तीन प्रमुख बदल दिए। इस शहर में पार्टी की वोट हिस्सेदारी है, कार्यकर्ता हैं, पर कोई नेता नहीं है। कांग्रेस मुंबई में आपस में लड़ती रही। हरियाणा और महाराष्ट्र, दोनों ही ऑटो हब हैं, पर कांग्रेस अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी को लेकर जनता की नाराजगी का लाभ नहीं उठा सकी।

सातवां सबक : अहंकारियों को सजा मिलेगी। महाराष्ट्र में पंकजा मुंडे और हरियाणा में कैप्टन अभिमन्यु को मिली हार यही रुझान दिखाती है। हरियाणा में खट्टर के साथ अनिल विज ही जीत पाए, बाकी के उनके आठ मंत्री हार गए। महाराष्ट्र में भी फडणवीस के आठ मंत्री हार गए। लोग बाढ़, सूखा या हताशा जैसे मुद्दों को लेकर मंत्रियों की संवेदनहीनता के कारण नाराज थे।

आठवां सबक : दलबदलुओं को गले लगाना महंगा पड़ सकता है। गुजरात में अल्पेश ठाकोर और महाराष्ट्र में उदयराजे भोसले की पराजय का यही सबक है। भाजपा की आयात-निर्यात नीति का, यानी अवांछितों को किनारे करना और दलबदलुओं को शामिल करना, प्रभाव उसके प्रदर्शन में दिख रहा है। कांग्रेस और एनसीपी छोड़ने वाले अनेक दलबदलू पराजित हो गए। दलबदलुओं के कारण वफादार कार्यकर्ताओं के हाथ से अवसर चला गया और दो दर्जन विद्रोहियों के हाथ में अब मोलभाव करने का अधिकार आ गया है।

नौवां सबक :  नोटा फैक्टर। किसी भी उम्मीदवार को वोट न देना उभरता हुआ विकल्प है। हरियाणा, महाराष्ट्र और विधानसभा के उपचुनावों में कुल 8.9 लाख मतदाताओं ने नोटा का बदन दबाया। नोटा फैक्टर वहां नजर आया, जहां राजनेता संकट या आपदा के समय सामने नहीं आए। आम धारणा के विपरीत ग्रामीण मतदाताओं ने शहरी मतदाताओं की तुलना में नोटा को हथियार बनाया है, जैसा कि लातूर ग्रामीण और पलुस खड़गांव में नजर आया, जहां नोटा दूसरे नंबर पर रहा।

दसवां सबक : हाई कमांड के लिए खतरे की घंटी। चुनाव परिणाम का सबसे आश्चर्यजनक तथ्य क्या है? कांग्रेस के प्रदर्शन से पार्टी और उसके नेतृत्व के बारे में धारणा बनती है। कांग्रेसियों ने अभी तक हाई कमांड को श्रेय नहीं दिया है और पार्टी नेतृत्व का अता-पता नहीं है। पार्टी ने खुद का अस्तित्व बचाने के लिए एक और चुनाव लड़ा और दिखाया कि हाई कमांड के बिना भी काम चल सकता है!
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