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इस चुप्पी के खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत

Tue, 12 Aug 2014 07:10 PM IST
मनीषा सिंह
मनीषा सिंह Updated Tue, 12 Aug 2014 07:10 PM IST
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Make voice against this silence

दो साल पहले निर्भया कांड के बाद पूरे देश में जैसी प्रतिक्रिया हुई थी, उसके बाद किसने सोचा था कि देश में कोई बलात्कार जैसे कृत्य के बारे में सोच भी पाएगा। उस हादसे के बाद पूरे देश में न सिर्फ सामाजिक जागरूकता का उफान पैदा हुआ था, बल्कि सरकार ने कानून के स्तर पर कई तब्दीलियां भी की। ये उपाय स्त्रियों को आश्वस्त तो करते थे, पर ये अंदेशे भी थे कि क्या होगा, अगर समाज और अपराधियों का रवैया न बदला।

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ये सारी आशंकाएं सच साबित होती दिख रही हैं। बदायूं गैंगरेप जैसी घटना से साबित होता है कि आपराधियों के मन में कानूनों का कोई खौफ नहीं है। विचलित करने वाली बात है कि समाज के स्तर पर भी कोई तब्दीली नहीं दिख रही है। यहां तक कि पढ़े-लिखे तबके के बीच स्त्री अब भी एक वस्तु (ऑब्जेक्ट) के रूप में देखी जा रही है। इसकी मिसाल एक फैशन फोटोग्राफर के फोटो शूट से मिली है। फोटोग्राफर राज शेट्टे ने 'बस में गैंगरेप' शीर्षक के साथ कुछ फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर प्रसारित किए, जिसमें एक युवा महिला मॉडल को बस में कुछ गुंडों के बीच दिखाया गया। उस फोटो में वैसी ही काल्पनिक खींचतान दिखाई गई है, जैसी शायद निर्भया वाले मामले में अपराधियों ने की थी। जब ट्वीटर और फेसबुक पर उनके इस कृत्य को शर्मनाक बताने वालों की भीड़ लग गई, तो उन्होंने उसका नाम बदलकर 'एडिटोरियल शूट' कर दिया। हालांकि वे सभी तस्वीरें उसी भाव-मुद्रा में सोशल मीडिया पर मौजूद रहीं।
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ऐसी घटना के लिए किसी व्यक्ति विशेष की मानसिकता को ही कठघरे में नहीं लाया जा सकता, बल्कि ऐसे मामलों में समाज की चुप्पी मार लेने की अदा का भी भारी योगदान है। पिछले दिनों एक सामाजिक संगठन ने प्रयोग के तौर पर एक शहर की सड़क पर देर शाम काले शीशे वाली एक वैन खड़ी कर दी, जिसमें से एक महिला के चीखने-चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं। आवाजों से ऐसा लग रहा था कि वैन में महिला के साथ जबर्दस्ती करने की कोशिश की जा रही है। इस प्रयोग के जरिये यह जानने की कोशिश की गई कि सड़क से गुजरने वाले कितने लोग महिला की चीख सुनकर उसकी मदद के लिए आगे आते हैं। एक छिपे कैमरे के माध्यम से इस पूरे वाकये की रिकॉर्डिंग के दौरान यह देखा गया कि ज्यादातर लोगों ने मदद की कोशिश नहीं की। वे आवाज सुनकर ठहरे जरूर, पर उन्होंने पचड़े में पड़ना उचित नहीं समझा।
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अब स्त्रियों का एक बड़ा वर्ग परंपरागत दायरों को लांघकर उन चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों और सेवाओं को भी अपनाने को उत्सुक है, जिन पर पुरुष अपना एकाधिकार समझते रहे हैं। लेकिन समाज का एक बड़ा तबका इस सच को स्वीकारने को तैयार नहीं है।


गैंगरेप की घटना का जिस तरह से व्यावसायिक इस्तेमाल करने की कोशिश की गई, वह हमारे लिए इस कारण चिंता का विषय होना चाहिए कि जिस शहरी और कारोबारी समाज को कथित तौर पर पढ़ा-लिखा और सभ्य माना जाता है, वहां महिला अस्मिता को कुचलने की मानसिकता अब भी कायम है। इस स्थिति में कोई परिवर्तन तभी होगा, जब खुद समाज के भीतर से इसके खिलाफ आवाज उठेगी।

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