फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Make harmony no dwarf

बौना न बनाइए सौहार्द को

Wed, 07 Oct 2015 07:37 PM IST
जगदीश उपासने
जगदीश उपासने Updated Wed, 07 Oct 2015 07:37 PM IST
विज्ञापन
Make harmony no dwarf

दादरी के बिसाहड़ा गांव में राक्षसी कृत्य के बाद परस्पर विरोधी राजनीतिक विचारधारा और सत्ता-विपक्ष के कई नेताओं, तथाकथित धार्मिक पृष्ठभूमि के कुछ लोगों, मौलिक चिंतन के नाम पर सियासी शब्दों की जुगाली करने वाले कतिपय बुद्धिजीवियों और अर्धसत्य, पक्षपातपूर्ण, सनसनीखेज और उत्तेजक खबरें देने वाले मीडिया के एक तबके का बर्ताव उन जख्मों को नासूर में तब्दील करने का सबब बन रहा है, जिनसे उबरने की कोशिश न सिर्फ वह परिवार और उस छोटी-सी बस्ती के सयाने लोग, बल्कि समझदारी और सह-अस्तित्व वाला पारिवारिक जीवन जीने वाले देश के ज्यादातर लोग कर रहे हैं।

विज्ञापन


बिसाहड़ा अगर भारत की जगप्रसिद्ध सहिष्णुता का तानाबाना एक बार फिर दरकने की कलंकभरी मिसाल है, तो उसके बाद जो कुछ हुआ या हो रहा है, वह दबे-ढके ढंग में उसी असहिष्णुता का सोचा-समझा विस्तार है, जिसका विस्फोट समाज में यदाकदा होता है और निर्दोषों को जान गंवानी पड़ती है। फर्क यह है कि अपने भीतर के मुट्ठीभर उपद्रवी तत्वों की करतूत के कारण असहनशीलता के दावानल में झुलसे लोग और बस्तियां समय के साथ उस दुःस्वप्न को पीछे छोड़कर सामाजिक रिश्तों की डोर में पड़ी गांठें सामान्य जीवन जीने की हद तक सुलझा लेते हैं। लेकिन विचार की स्वतंत्रता की आड़ में दरअसल विचारों की राजनीतिक असहिष्णुता से, जिसे बहुधा घृणा की हद तक भी खींचा जाता है, समाज में वह असहनशीलता जड़ें जमा सकती हैं, जो विभिन्न वर्गों की जीवन शैली में टकराव के बिंदुओं पर ज्यादा जोर देने से लगातार पनप रही हैं।
विज्ञापन


बिसाहड़ा की सैर करने वाले या अपने सुखी और सुरक्षित वातावरण में चैन से बैठकर भड़काऊ 'बाइट' देने वाले विपक्ष या सत्ता पक्ष के नेताओं को क्या करना चाहिए था? बजाय इसके कि वे उत्तर प्रदेश सरकार से हालात तुरंत काबू में लाने, आरोपियों को गिरफ्तार करने, पीड़ित परिवार को सुरक्षा और सुकून पहुंचाने, बिसाहड़ा और आसपास के गांवों में उपजे तनाव को शांत कर सौहार्द कायम करने की मांग करते, उन्होंने क्या किया? उनमें से हरेक ने न उस परिवार का विचार किया, न उस गांव और आसपास की बस्तियों का, बल्कि शोक के उस माहौल का उन्होंने अपने-अपने वोट बैंक को आश्वस्त करने वाले संदेश देने के लिए बड़ी कुशलता से इस्तेमाल किया। इनमें हर किस्म थी- मंत्री, शाश्वत रूप से उग्र स्वामी-साध्वी और रजाकार समर्थक, दंगों के आरोपी, सिविल सोसाइटी के मशालची और मई, 2014 के बाद से देश में घटी हर घटना के लिए मोदी को निशाने पर लेने वाले।
विज्ञापन
विज्ञापन


असहमति लोकतंत्र की प्राणवायु है, लेकिन दुश्मनी उसकी जड़ पर मट्ठा डालने का काम करती है। नेताओं की राजनीतिक विचारधारा और उनके बयान भर एक-दूसरे के विरोधी थे। पर इस विरोधाभास का निचोड़ एक ही था—अपने वोट बैंक को भरोसे का संदेश। गांव में बन रहे माहौल की जानकारी रखने और आननफानन हुई खूंरेजी रोक पाने की सांविधानिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर संयुक्त राष्ट्र को अर्जी भेजने का दम भरने वाले वाले राज्य के वरिष्ठ मंत्री ने अपने मुख्यमंत्री की मुश्किल कोई आसान नहीं की। बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर नेताओं के संदेशों की यह उग्रता असहिष्णुता से बन रहा सामाजिक बंटवारा स्थायी करने की कोशिश से कम नहीं। और यह सब उस उत्तर प्रदेश में, जहां 2013 में देश भर में हुई सांप्रादायिक घटनाओं में से 35 प्रतिशत घटनाएं हुई थीं। वोट बैंक की सरपरस्ती के लिए मौत के मातम का यह इस्तेमाल भारतीय राजनीति में नए चलन की गवाही है।

तात्कालिक राजनीतिक लाभ उठाने के मंसूबों से विवेक-बुद्धि इस कदर ढंक गई है कि बड़े-बड़ों को भी ख्याल न रहा कि राज्य में गौहत्या पर पहले से पाबंदी है और गौवंश के मांस के निर्यात पर मोदी सरकार आने के पहले से रोक लगी हुई है। बेहतर होता कि राज्य और केंद्र में सत्तारूढ़ दलों के नेता बताते कि वे सामाजिक सौहार्द कायम करने, अपने-अपने वर्गों के उपद्रवी-उग्र तत्वों की नकेल कसने और गांवों में फिर भरोसा कायम करने के लिए क्या करने वाले हैं। वे यह भी बता सकते थे कि गाय-बैलों-बछड़ों की चोरी और तस्करी करने वाले अपराधी गिरोहों की रोकथाम के लिए उनकी सरकारें क्या कर रही हैं। और अगर बीफ के निर्यात पर पाबंदी है, तो फिर ऐसे आंकड़े क्यों सामने आ रहे हैं कि भारत दुनिया में इस निर्यात में सिरमौर बन गया है?

लेकिन मीडिया और आर्मचेयर बुद्धिजीवियों की एक जमात के सामने तो सियासतदां कुछ नहीं। पूर्वाग्रह, झूठ, अर्धसत्य, अपुष्टता और सनसनी इस एजेंडा-संचालित पत्रकारिता के मानदंड बन गए। राज्य और बाकी देश के हिंदी अखबारों के संवेदनशील कवरेज के मुकाबले महज डेढ़ प्रतिशत अंग्रेजी जानने वालों के लिए छपने वाले पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक तबके की असंवेदशील सामग्री तथा समाज के स्वयंभू बौद्धिक कोतवालों की वैचारिक जुगाली का असर क्या हो सकता है? समाज के एक वर्ग में असुरक्षा, तो दूसरे में स्वयं को शिकार बनाए जाने की धारणा। इससे एक-दूसरे की कमियों को बर्दाश्त कर साथ रहने की परंपरा में शत्रुता के बीज पड़ते हैं।


द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर के राजनीतिक चिंतक डॉ. कार्ल पॉपर ने अपनी मशहूर कृति द ओपन सोसाइटी ऐंड इट्स एनिमीज में इसे ''सहिष्णुता का विरोधाभास'' कहा है। असीमित सहिष्णुता, सहिष्णुता का ही अंत कर सकती है। वह लिखते हैं कि यदि हम असहिष्णु लोगों के लिए असीमित रूप से सहिष्णुता बरतते रहते हैं, यदि हम असहिष्णु लोगों से सहिष्णुता की रक्षा नहीं करते, तो न केवल सहिष्णु लोग समाप्त हो जाएंगे, अपितु सहिष्णुता भी खत्म हो जाएगी। वह आगे लिखते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि असहिष्णुता भरे विचारों को हमेशा दबाया जाना चाहिए, बल्कि असहिष्णुता के दर्शन का जवाब तर्कपूर्णता से दिया जाना चाहिए। दिक्कत यह है कि सद्भाव और सौहार्द छोटे स्वार्थों और पूर्वाग्रहों के सामने बौना हो जाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed