चुनाव आयोग को मद्रास हाईकोर्ट की लताड़, नियमों की कड़ी लकीर खींच पाएगी?
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लोकतंत्र है तो चुनाव हैं। चुनाव हैं तो नेता हैं, भाषण हैं, रैलियां हैं। रैलियां हैं तो भीड़ है। और भीड़ है तो कोरोना का खतरा है...बस ये खतरा सबको ठीक से दिखाई नहीं देता। न भीड़ को, न नेता को, न नियमों का पालन करवाने की जिम्मेदारी रखने वाले चुनाव आयोग को।
शायद इसीलिए, 26 अप्रैल को एक सुनवाई के दौरान जब मद्रास हाईकोर्ट कहता है कि देश में कोरोना की दूसरी लहर का जिम्मेदार कोई और नहीं, आपकी संस्था है, चुनाव आयोग है तो बात सीधी और सच्ची लगती है। जब कोर्ट तल्ख लहजे में ये तक कह जाता है कि लापरवाह रवैये के लिए आपके अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए तो बात कठोर भले लगे लेकिन गलत नहीं लगती।
‘जब एक नागरिक जिंदा रहेगा तभी जाकर वो उन अधिकारों का इस्तेमाल कर पाएगा, जो उसे एक लोकतंत्र में मिलते हैं।' कोर्ट की इन तीखी टिप्पणियों में चुनाव आयोग के लिए कई सबक छिपे हैं।
ये महज झल्लाहट या सख्ती से उपजे बयान नहीं हैं। इनमें झांक कर देखिएगा तो ढेर सारी हताशा और निराशा नजर आती है। चुनाव आयोग जैसी गंभीर और संवैधानिक संस्था की लापरवाही से पैदा हुई निराशा।
बंगाल में ‘मौत का चुनाव’
बंगाल में जब आठ चरणों में चुनाव का एलान हुआ था तो कई राजनीतिक पंडितों को आश्चर्य हुआ था। और आज जब हर चरण, देश में कोरोना के बढ़ते कहर के बीच आता है तो कई सारी मुश्किलें और चुनौतियां सामने आकर खड़ी हो जाती हैं।
अब तक कई उम्मीदवार कोरोना की चपेट में आ चुके हैं। कुछ को तो जान तक गंवानी पड़ी। 25 अप्रैल को खरदाहा सीट से टीएमसी प्रत्याशी काजल सिन्हा की मौत की खबर सामने आई। इससे पहले 16 अप्रैल को मुर्शिदाबाद से कांग्रेस के रजा उल हक की मौत हो गई थी। प्रचार के दौरान ही केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा संक्रमित हो चुके हैं। गोआलपोखोर से टीएमसी के गुलाम रब्बानी कोरोना के शिकार हैं। भाजपा नेता और टॉलीगंज से पार्टी के उम्मीदवार बाबुल सुप्रियो दूसरी बार कोरोना की जद में आ गए हैं। भाजपा से लेकर टीएमसी तक और कांग्रेस से लेकर लेफ्ट तक कितने ही नेता और उम्मीदवार घरों में बंद हैं।
बंगाल में संयम की बातें तो सबने कीं लेकिन संयम बरता किसी ने नहीं। और जब बरता यानी सातवें चरण से दो-चार दिन पहले तब तक बहुत देर हो चुकी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में कोरोना को लेकर बैठकों का दौर शुरू किया और बंगाल की रैलियां वर्चुअल कर दीं। इससे पहले राहुल गांधी ने ट्वीट कर, रैलियों से तौबा की बात कही, लेकिन ये सब होते-होते, रैलियों के रेले, कोरोना के कंधों पर सवार होकर धमाचौकड़ी करते रहे और चुनाव आयोग, एकाध धीमे सुर की चेतावनी देकर काम चलाता रहा।
राज्य में कोरोना संक्रमण के आंकड़ों पर नजर डालें तो पहले चरण यानी 27 मार्च को जहां 812 लोग संक्रमित पाए गए थे वहीं सातवां चरण आते-आते ये आंकड़ा 16 हजार पहुंच गया। यानी, करीब 1900 फीसदी की बढ़ोतरी।
केरल से असम तक यही आलम
ऐसा भी नहीं कि आयोग की हीला-हवाली का आलम सिर्फ बंगाल तक सीमित रहा हो। हां, तस्वीरें जरूर बंगाल की ज्यादा सामने आईं लेकिन उतनी ही विचलित करने वाली थीं केरल या तमिलनाडु की तस्वीरें। गनीमत बस इतनी थी केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनाव एक चरण में संपन्न हो गए।
‘...वरना रोक देंगे मतगणना’
26 अप्रैल को सुनवाई के दौरान मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीब बनर्जी, आयोग पर खासे आग बबूला दिखे। उन्होंने कहा कि 2 मई को मतगणना से जुड़ी तैयारियों का ब्लू प्रिंट, 30 अप्रैल तक तैयार करके कोर्ट के पास जमा कराया जाए। अगर ऐसा नहीं होता तो कोर्ट मतगणना पर रोक लगा देगा।
हाईकोर्ट, तमिलनाडु के परिवहन मंत्री एमआर विजयभास्कर की याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें उन्होंने, उनकी विधानसभा सीट पर मतगणना के दौरान कोविड नियमों के पालन की मांग की थी।
क्या सबक लेगा चुनाव आयोग?
मद्रास हाईकोर्ट से पहले कलकत्ता हाईकोर्ट भी चुनाव आयोग को लताड़ लगा चुका है। कोर्ट ने पूर्व चुनाव आयुक्त और सख्ती का दूसरा नाम समझे जाने वाले तेज-तर्रार टीएन शेषन की मिसाल भी दी। ऐसा नहीं है कि टीएन शेषन ने दायरे से आगे जाकर कुछ किया हो। उन्होंने तो बस पहले से मौजूद आचार संहिता का बेहद सख्ती से पालन करवाया। तब देश के आम आदमी को पता लगा कि चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त का पद कितना अहम है। कलकत्ता हाई कोर्ट की नसीहत हो या मद्रास हाई कोर्ट के कड़े तेवर, चुनाव आयोग अगर लोकतंत्र की सेहत के लिए नियमों का कड़ाई से पालन कराने का सबक सीख लेता है तो भविष्य के चुनाव कहीं बेहतर, पारदर्शी और नई लकीर खींचने वाले हो सकते हैं।