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मशीन बदल रही है पंजाब के गांवों को

Wed, 24 Sep 2014 08:35 PM IST
मयंक मिश्र
मयंक मिश्र Updated Wed, 24 Sep 2014 08:35 PM IST
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Machine is changing the villages of Punjab

करीब छह साल पहले पंजाब के किसानों का एक दल तीर्थयात्रा पर पाकिस्तान पहुंचा था। चूंकि तीर्थयात्री किसान थे, इसलिए वे पाकिस्तानी खेतों में इस्तेमाल हो रही तकनीक के बारे में जानना चाह रहे थे। इसी सिलसिले में वे पाकिस्तानी पंजाब के खेतों में जा पहुंचे। वहां उनका सामना लेजर लेवलर से हुआ। इस मशीन के उपयोग से खेतों में पानी की जरूरत 30 से 50 फीसदी तक कम हो जाती है। देश वापस लौटने के बाद किसानों ने ठान लिया कि वे अपने खेतों में भी इस मशीन का इस्तेमाल करेंगे।

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पंजाब में भूजल का स्तर हर साल 14 सेंटीमीटर की रफ्तार से नीचे जा रहा है। अनुमान है कि वहां के 78 फीसदी इलाकों में पानी की कमी है, और यह कमी साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। ऐसे में, लेजर लेवलर पंजाब के किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं। अभी यहां 2,000 से ज्यादा लेजर लेवलर काम कर रहे हैं। किसान नेताओं की मानें, तो राज्य के 40 फीसदी इलाकों में यह पहुंच चुका है। इसके अलावा रोटा वेटर, हैप्पी सीडर, जीरो टिल ड्रिल और हार्वेस्टर कम्बाइन जैसी मशीनों के उपयोग का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है। इनके पीछे बड़ी वजह किसानों को मजदूरों का नहीं मिलना है। किसान नेता पीपीएस पांगली का मानना है, अगर किसान खेती के लिए जरूरी सारी मशीनों का इस्तेमाल करना शुरू कर दें, तो मजदूरों की जरूरत में 30 फीसदी तक की कमी आ सकती है।
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लेकिन आधुनिकतम तकनीक वाली मशीनें काफी महंगी हैं। इन मशीनों को खरीदकर इस्तेमाल करना हर किसान के लिए संभव नहीं। वैसे भी पंजाब में 60 फीसदी किसानों के पास पांच एकड़ से कम जमीन है। ऐसे में सभी किसानों तक नई तकनीक पहुंचे, तो भला कैसे? जवाब कुछ किसानों ने ढूंढ लिए हैं। असल में, पंजाब के गांवों में कई वर्षों से किसानों की सहकारी संस्थाएं काम कर रही हैं। अकेले लुधियाना जिले में 363 सहकारी संस्थाएं हैं। अनुमान है कि इनमें से 60 फीसदी संस्थाओं के पास खेती से जुड़ी सारी मशीनें हैं। हाल के दिनों में ये संस्थाएं मशीनों को खरीद कर किसानों को किराये पर देने लगी हैं। ऐसी ही एक संस्था है, नूरपुर बेट। 740 किसान इसके सदस्य हैं, और पिछले वित्त वर्ष में इसने मशीनों के किराये से करीब 26 लाख रुपये की कमाई की। नई तकनीकों के इस्तेमाल से जहां खेती में काफी सहूलियत हो जाती है, वहीं किराये पर लेकर मशीन चलाने का एक दूसरा फायदा यह भी हो रहा है कि किसानों की कर्ज चुकाने की क्षमता में तेजी से सुधार हो रहा है। लुधियाना सहकारी बैंक की छोटी अवधि के लोन की रिकवरी की दर 2004 में जहां 92.85 फीसदी थी, वह 2010 में बढ़कर 95.3 फीसदी हो गई। रिकवरी की दर बढ़ते-बढ़ते इस साल जनवरी में 97 फीसदी को पार कर चुकी है।
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पंजाब में हो रहे इस बदलाव से वहां के किसानों को मजदूरों की कमी का रोना नहीं रोना पड़ रहा है। देर-सबेर देश के बाकी इलाकों में भी इसका असर होना तय है। हरियाणा में तो इसकी शुरुआत हो भी चुकी है। ऐसे में देश के गांवों में नई हरित क्रांति दस्तक देने वाली है। हालांकि लागत जरूर बढ़ेगी, लेकिन खेती की उत्पादकता में काफी तेजी से इजाफा होगा।

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