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शराबबंदी समस्या का हल नहीं

Sun, 28 Aug 2016 06:00 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
नीलांजन मुखोपाध्याय Updated Sun, 28 Aug 2016 06:00 PM IST
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Liquor prohibition is not solution
नीलांजन मुखोपाध्याय

ऐसा कौन-सा अपराध है, जिसकी सजा न्यूनतम दस वर्ष से लेकर अधिकतम उम्रकैद और जुर्माना न्यूनतम एक लाख रुपये से अधिकतम दस लाख तक है? अगर कोई सोचता है कि ऐसी गंभीर सजा देश में कहीं न कहीं जघन्य अपराध के लिए सुनाई जा सकती है, तो वह गलत है। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की शराब-विरोधी नई नीति के तहत बिहार निषेध एवं आबकारी विधेयक, 2016 को राज्यपाल रामनाथ कोविद द्वारा मंजूरी दिए जाने के बाद न केवल यह कानून लागू हो जाएगा, बल्कि बिहार देश का सबसे कठोर शराब-विरोधी कानून वाला राज्य होगा।

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नरेंद्र मोदी ने गुजरात में बतौर मुख्यमंत्री शराब नीति को ज्यादा कठोर बनाने के लिए कदम उठाया था। वहां 2009 में पारित कानून में ऐसा प्रावधान शामिल किया गया था, जिसमें जहरीली शराब से होने वाली मौतों के जिम्मेदारों को फांसी की सजा सुनाई जा सकती है। बिहार के शराब-विरोधी कानून पर निम्न कारणों से सवाल उठ रहे हैं-यदि कोई अपने घर पर शराब पीता है, तो घर के सभी वयस्क सदस्यों को दोषी माना जाएगा; यदि कोई कर्मचारी कंपनी परिसर के भीतर इस निषेध का उल्लंघन करता है, तो कंपनी प्रमुख, प्रभारी और सभी जिम्मेदार व्यक्तियों को दोषी माना जाएगा; बार-बार कानून के उल्लंघन की स्थिति में जिलाधिकारी पूरे गांव, शहर या समुदाय पर सामूहिक जुर्माना लगा सकता है; जो भी शराब बनाने के लिए उपयोग में आने वाले बर्तन या उपकरण रखेगा, वह दंड का भागी होगा; शराब पीने या बेचने की सूचना पुलिस को न देने पर दस साल की सजा का प्रावधान है; और जिस मकान में इस कानून का उल्लंघन होगा, उसके मालिक को भी दोषी मानकर सजा दी जा सकती है!
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सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और मकान-मालिक तथा कंपनी मालिक को किरायेदारों व कर्मचारियों की निजता का उल्लंघन करने के लिए प्रोत्साहन देने के अलावा यह कानून आबकारी एवं पुलिस अधिकारियों को किसी भी परिसर में मनमाने ढंग से घुसने और बिना वारंट के निरीक्षण करने, तलाशी लेने, नमूना इकट्ठा करने और गिरफ्तार करने का अलोकतांत्रिक अधिकार देता है। इस देश के हर नागरिक को पता है कि अधिकारी कैसी मनमानी करते हैं और कैसे अक्सर सत्ताधारी पार्टी द्वारा अपने राजनीतिक विरोधियों को धमकाने के लिए कानून का दुरुपयोग किया जाता है। इतिहास बताता है कि शराबबंदी किसी भी राज्य में सफल नहीं हुई। सबसे पुराना शराब-विरोधी कानून गुजरात में है, पर वहां भी देसी एवं विदेशी शराब, दोनों का अवैध व्यापार धड़ल्ले से चलता है। जब मैं प्रधानमंत्री मोदी की जीवनी पर काम कर रहा था, तब एक इंटरव्यू में मैंने उनसे सवाल किया था कि क्या वह कभी राज्य की मद्य निषेध नीति की समीक्षा करेंगे। मोदी ने समझाया था कि शराबबंदी किस तरह गुजरात के लिए एक सांस्कृतिक मसला है। जिस राज्य में गांधी का जन्म हुआ, वहां खुलेआम शराब कैसे बह सकती है? पर वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन के दौरान हुए मौन विरोध को देखते हुए राज्य सरकार ने अपनी शराब नीति को थोड़ा उदार बनाया। अब भी गुजरात में हजारों करोड़ रुपये का अवैध शराब व्यापार फल-फूल रहा है। यदि इसमें सरकारी खजाने को होने वाले नुकसान और कानून प्रवर्तन की लागत को जोड़ दें, तो कुल नुकसान काफी ज्यादा होगा।
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शराबबंदी पर अमल करने की कोशिश में नीतीश कुमार की प्राथमिकताएं गड्डमड्ड हो गई हैं। बिगड़ती कानून-व्यवस्था पर ध्यान देने के बजाय पुलिस मुख्यमंत्री की इस प्रिय नीति को लागू करने में लगी है। जरा आंकड़ों पर नजर डालिए-एक अप्रैल से अब तक बिहार सरकार ने बारह हजार से ज्यादा लोगों को इस कानून का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। इनमें से करीब छह हजार लोगों को आबकारी विभाग ने गिरफ्तार किया है, जबकि बाकी को पुलिस ने। उनमें से कुछ को रेलवे पुलिस ने भी गिरफ्तार किया है। होमगार्ड को अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है और पूर्व सैन्यकर्मियों को राज्य सहायक पुलिस के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। इसके लिए 2,500 से ज्यादा लोगों की नियुक्ति की गई है। नदियों के मार्ग से तस्करी रोकने के लिए किराये पर नावें ली गई हैं। अधिकारी सैन्यकर्मियों को भी नहीं बख्श रहे, चाहे वे बिहार में पदस्थापित हों या राज्य से होकर गुजर रहे हों। सेना ने अपने सभी कर्मियों को चेतावनी दी है कि यदि वे बिहार में यात्रा पर हों, तो अपने साथ शराब न ले जाएं।

नीतीश कुमार शराबबंदी का ऐसा कठोर कानून क्यों चलाना चाहते हैं, जिस कारण उनकी ही पार्टी के लोग उन्हें तानाशाह बता रहे हैं? उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि उनका शराब-विरोधी रुख राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के विकल्प के रूप में उभरने में प्रमुख भूमिका निभाएगा? पुरुषों की शराबखोरी का खामियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ता है। यह भी सच है कि पीने की लत के कारण गरीब तबकों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो जाती है। इससे भी इन्कार नहीं कि शराबखोरी उच्च वर्ग में भी रिश्ते टूटने का एक बड़ा कारण है। शराब के बुरे प्रभाव को भी स्वीकार किया जाता है। लेकिन शराब पर प्रतिबंध लगाना और एक कठोर कानून ले आना इसका समाधान नहीं है।


हाल में बिहार में हुई जहरीली शराब त्रासदी भी बताती है कि जहां शराब कानूनी रूप से उपलब्ध नहीं होती, वहां उसका अवैध कारोबार करने वाले पहुंच जाते हैं। एक कुशक प्रशासक को जीवन के हर पहलू पर ध्यान देना चाहिए और बिखरे हुए परिवारों को भी जोड़ना चाहिए। किसी भी सरकार को शराब की समस्या की अनदेखी नहीं करनी चाहिए और नशा-मुक्ति तथा परामर्श कार्यक्रमों की जांच करनी चाहिए। पर जबरन शराबबंदी से दीर्घकालीन अर्थों में समस्याएं पैदा होंगी। अन्यथा, अन्य राज्यों में जहां शराबबंदी को शुरू में महिलाओं का समर्थन मिला था, वहां कुछ ही समय बाद इस नीति का त्याग नहीं किया जाता। एक सच्चे राष्ट्रीय नेता के रूप में नीतीश कुमार को लोकलुभावन नीति का त्याग करना चाहिए, भले थोड़े दिनों के लिए यह आकर्षक लगे।

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