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कोसी के खतरे में अलकनंदा के सबक

Fri, 08 Aug 2014 08:54 PM IST
अनंत मित्तल
अनंत मित्तल Updated Fri, 08 Aug 2014 08:54 PM IST
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Lessons of Alaknanda in danger of Kosi

नेपाल की दुर्गम पहाड़ियों का सीना चीर भारत में बिहार के विशाल मैदानों में फैले खेतों की जीवनरेखा कोसी नदी इस बरसात में फिर डरा रही है। इस डर का कारण है, भारतीय सीमा से कुछ दूर नेपाल की दुर्गम पहाड़ियों में वहां सनकोसी कहलाने वाली कोसी नदी की धार पर गिरी भारी-भरकम पहाड़ी चट्टान। इस भीषण हादसे के कारण पहाड़ों के बीच करीब ढाई किलोमीटर के दायरे में कोसी की धार थमने से 130 मीटर गहरी झील बन गई थी। इस झील में जमा पानी की मात्रा 24 लाख क्यूसेक आंकी गई। यदि यह कृत्रिम झील अचानक फट जाती, तो इतना सारा पानी दिल्ली जैसे महानगर को डुबो देने के लिए काफी होता। ऐसे में कोसी के मैदानी इलाके के कम से कम नौ जिलों में अफरा-तफरी मचनी स्वाभाविक थी। वैसे भी इन जिलों को कोसी की विकराल बाढ़ में अपना सब कुछ गंवाकर पैरों पर खड़े हुए अभी एक दशक भी नहीं बीता है।

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इस बार बस अंतर इतना है कि इन जिलों में कोसी के तटीय इलाकों में बसे परिवारों को वहां से निकाल कर प्रशासन की दृष्टि में सुरक्षित स्थानों पर ले जाने का सिलसिला कहर टूटने के पहले ही युद्ध स्तर पर जारी था। साथ ही, कोसी की धार में रोड़ा बनी विशाल चट्टान को भी नेपाल की सेना के इंजीनियर भारतीय जल इंजीनियरी विशेषज्ञों की सलाह पर बारूद के हल्के-हल्के धमाकों से टुकड़ों में तोड़ने में जुटे थे। यदि पानी की निकासी धीरे-धीरे न की गई होती, तो इतना सारा पानी अपने रास्ते में आने वाले पहाड़ों, खेतों, गांवों, कस्बों और शहरों में चौतरफा तबाही ही नहीं, बल्कि बारिश में कोसी की विकरालता को काबू करने वाले विशाल वीरपुर बांध को भी लील जाता।
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अस्सी के दशक की शुरुआत में उत्तराखंड ऐसी ही तबाही झेल चुका है। वह तबाही 1971 के आरंभ में उत्तराखंड की सबसे वेगवती नदी अलकनंदा ने बरपाई थी। तब अलकनंदा में उंचाई पर भूस्खलन से टूटकर गिरे पहाड़ की विशाल चट्टान से इसी तरह पहाड़ों के बीच अलकनंदा का बहाव रुकने से गहरी झील बन गई थी। उस कृत्रिम झील के कारण अलकनंदा और भागीरथी के आपस में मिलकर उन्हें गंगा का रूप देने वाले संगम स्थल देवप्रयाग से लेकर विशाल मैदानी इलाके में भीषण बाढ़ की आशंका ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर उत्तर प्रदेश सरकार की नींद हराम करके रख दी थी। आज कोसी की कृत्रिम झील की बाधा की टुकड़ों में की जा रही सफाई के विपरीत तब लंबा इंतजार करना पड़ा था, क्योंकि तब आपदा से बचाव के आज जैसे साधन नहीं थे। इस लिहाज से ऑपरेशन कोसी में लगे इंजीनियरों को दाद देनी होगी कि कोसी में बनी झील को उन्होंने हल्के में नहीं लिया।
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बहरहाल, कोसी नदी से जुड़ी इस आशंका से यह भी साफ हो गया कि पिछले साल केदारनाथ सहित चारों धाम पर टूटी आपदा के कारण अकेले उत्तराखंड अथवा भारत में स्थित हिमालय की पर्वत शृंखलाओं का ही नहीं, समूचे हिमालय का अस्तित्व संकट में है। ऐसे में सभी हिमालयी देशों के लिए क्या एकजुट होकर हिमालय की संरचना और उसमें जल संग्रह के स्रोतों की सेहत और उनमें मनुष्य की दखलंदाजी के नतीजों का अध्ययन नहीं करना चाहिए? हिमालयी क्षेत्र में मानसून में बादल फटने की घटनाओं का बढ़ते जाना वहां की सरकारों और उनके निवासियों को झकझोर रहा है कि अब भी चेत जाओ और अपने तौर-तरीके सुधार लो, वर्ना पिछले साल की तरह हालत बेकाबू होते देर नहीं लगेगी।

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