संत और सरकार, दोनों के लिए सबक
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जंग में जो हथियार इस्तेमाल किए जाते हैं, विजय जुलूस में प्रदर्शन के बाद वे म्यान में लौट जाते हैं या तहखानों में बंद कर दिए जाते हैं, मगर सियासत में ऐसा नहीं होता। जाति, धर्म, भाषा और किसी संप्रदाय को जब हथियार बनाकर चुनाव जीतने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो इन हथियारों की महत्वाकांक्षा की धार और पैनी हो जाती है। उन्हें यह भ्रम हो जाता है कि दुनिया की सारी ताकत उनके ही हाथों में है। तब वे शक्ति प्रदर्शन के बहाने तलाशते हैं और कानून-व्यवस्था का मखौल उड़ाते हैं। नतीजतन ऐसी स्थितियां पैदा होती हैं कि इनके सहारे जीतने वाले नेता बार-बार शर्मिंदा होते हैं। इसलिए राजनीति में धर्म, जाति और संप्रदाय का इस्तेमाल निकृष्ट माना जाता है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हरियाणा को शुरू से ही भाषा और जाति की राजनीति की दोधारी तलवार पर चलना पड़ा। अब यहां धर्म की राजनीति फिर से रंग पकड़ने लगी है। जाट मुख्यमंत्री के समय जाट आंदोलनों के आगे कानून-व्यवस्था को सबने चरमराते देखा। मोदी लहर के साथ मुख्यमंत्री जरूर बदल गए हैं, पर दृश्य बहुत नहीं बदला। हाई कोर्ट के एक आदेश के अनुपालन में प्रदेश सरकार और पुलिस, दोनों के पसीने छूट गए।
हिसार के सतलोक आश्रम से जुड़े संत रामपाल और उनके भक्तों का आर्य समाजियों से करीब डेढ़ दशक पुराना विवाद है। स्वामी दयानंद सरस्वती पर कथित टिप्पणियों से यह शुरू हुआ था। हुड्डा सरकार के समय जुलाई, 2006 में रामपाल के करौंथा आश्रम पर पहली बड़ी कार्रवाई हुई। आश्रम के भीतर से फायरिंग की बात सामने आई, जिसमें एक की मौत हुई और रामपाल गिरफ्तार कर लिए गए। उन पर अनैतिक गतिविधयां चलाने के आरोप भी लगे। दो साल बाद वह जमानत पर रिहा हुए। इसी आश्रम को लेकर पिछले साल मई में बड़ा विवाद हुआ, जिसमें तीन लोग मारे गए। 18 महीने बाद अब फिर पुलिस को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी और इस बार सात लोगों की जानें गईं। सवाल उठता है कि कानून-व्यवस्था से खेलने की ताकत किसी के पास कैसे आ जाती है। क्या चोले का रंग कोई विशेषाधिकार देता है या इसके पीछे सिर्फ राजनीति है?
असल में कुछ राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं को समाज में छोटे-छोटे दबाव समूह तैयार करने का पाठ पढ़ाते हैं। लेकिन होता यह है कि कार्यकर्ता क्षेत्र की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित कर समूह तैयार करने की जगह धर्म, जाति और भाषा के नाम पर समाज में पहले से बने समूहों में अपनी पैठ बढ़ाते हैं। ऐसे में उन्हें भ्रम हो जाता है कि वे इन समूहों का नेतृत्व करने लगे हैं। दूसरी ओर, समूह की सभी शक्तियों को यह भ्रम हो जाता है कि वे ही सरकार चला रहे हैं। इसी भ्रम में वे खुद को कानून-व्यवस्था से ऊपर समझने लगते हैं। ऐसे में टकराव होना स्वाभाविक है, मगर इसकी कीमत भोली जनता को चुकानी पड़ती है। हालांकि सरकार और रामपाल, अब दोनों ही बचाव की मुद्रा में हैं।
शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद देश में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है, जिन्हें चमत्कार की कहानियां सुनाकर भेड़ की तरह हांका जा सकता है। लेकिन रामपाल प्रकरण भक्तों के लिए ही नहीं, संतों और सरकार के लिए भी सबक है। देश में कानून से ऊपर कोई नहीं है।