आखिर भाषा भी तो एक चुनाव है
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यह दावा लगातार सही साबित होता जा रहा है कि 2014 का लोकसभा चुनाव पिछले कई चुनावों से अलग है। इस चुनाव की यह विशिष्टता भाषा के स्तर पर सामने आ रही है। सचमुच इस बार भाषा का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि उसकी ढलान पर राजनीति और समाज फिसले बिना बच नहीं सकते। यदि मौजूदा प्रधानमंत्री अपनी रोबोटी खामोशी से तमाम वक्ताओं को चुप करने और जनता को बेचैन करने वाला तनाव देने के लिए जाने जाएंगे, तो भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बड़बोलेपन और ‘सबका विनाश’ करने वाली अपनी आक्रामक भाषा के लिए भारत के राजनीतिक इतिहास में दर्ज होने जा रहे हैं।
यह रोचक है कि सितंबर, 2013 में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में पहली बार उतरी आम आदमी पार्टी ने दावा किया था कि वह राजनीति का नया व्याकरण लिख रही है। यही वजह है कि उसकी भाषा और व्यवहार को समझने में तमाम दलों और मीडिया को अड़चन हो रही है। तब यह उम्मीद जताई गई थी कि आप के प्रभाव में बाकी पार्टियों की भाषा और विमर्श का स्तर उठेगा और वे इस चुनाव को अलग धरातल पर लड़ेंगे। लेकिन मीडिया, सरकार और बाकी राजनीतिक दलों ने घेर कर आप को भी उसी स्तर पर ला दिया है, जो भारतीय राजनीति के विमर्श का सामान्य स्तर रहा है। आप नेता अरविंद केजरीवाल को भाजपा नेता नरेंद्र मोदी ने एके-47 जैसे आतंकी हथियार की तर्ज पर एके-49 तो कहा ही, मीडिया ने भी उन पर लगातार हमले किए।
सवाल उठता है कि यह स्तरहीन और तल्ख भाषा आती कहां से है। क्या यह भाषा देशप्रेम से पैदा होती है, राष्ट्रवाद से पैदा होती है, किसी क्रांतिकारी विचारधारा से पैदा होती है, किसी संगठन विशेष से पैदा होती है या इसके पीछे कुछ और कारण हैं। एक बात स्पष्ट है कि किसी की भाषा तभी तल्ख होती है, जब उसकी बात सुनी न जा रही हो। लेकिन जब बात सुनी जा रही हो, तो भाषा के तल्ख होने की वजह विचारहीनता होती है।
भाषा उस समय भी कटु होती है, जब विचार प्रभावहीन हो गए हों। हर विचारधारा के भीतर आलोचना और गाली देने की एक खास शब्दावली होती है। जैसे कि कम्युनिस्टों की शब्दावली में प्रतिक्रियावादी, बुर्जुआ, फासीवादी, सांप्रदायिक और दलाल, तो हिंदुत्ववादियों में देशद्रोही, छद्म धर्मनिरपेक्ष, तुष्टीकरण, वोट बैंक, माओवादी वगैरह। इसी के साथ अंबेडकरवादी विमर्श में मनुवादी, जातिवादी, ब्राह्मणवादी, छद्म अंबेडकरवादी जैसे शब्द विरोधी की कटु आलोचना के लिए प्रयुक्त होते हैं। इन शब्दों में एक वैचारिक आधार होता था, लेकिन विचारों के भ्रष्ट हो जाने के साथ वह अर्थ समाप्त होता गया है।
यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या 16वीं लोकसभा के इस चुनाव को विशिष्ट बनाने वाले यह संवाद सलमान खान की दबंग और जय हो फिल्म की तरह इस तीन महीने की अवधि के बाद राजनीतिक बॉक्स आफिस से उतर जाएंगे या वे आगे भी शोले के संवादों की तरह गूंजते रहेंगे? अगर यह कड़वाहट और स्तरहीन भाषा चुनाव के बाद भी जारी रही और जिसकी आशंका बनी हुई है, तो आगे का लोकतंत्र निश्चित तौर पर टकराव और हिंसा के रास्ते पर जाएगा।
भारतीय राजनीति भले विकास का आवरण ओढ़कर अपने को युवाओं व मध्यवर्ग और उस पर निगाह लगाए बाजार के बीच लुभावना बना रही हो, लेकिन जैसे ही कहीं भी वह आवरण फटा, तो इस राजनीति का भयानक रूप सामने आएगा। इसलिए आज अपना प्रतिनिधि, सरकार और प्रधानमंत्री चुनने जितना ही जरूरी उस भाषा का चुनाव करना है, जो हमारे लोकतंत्र के विमर्श और उसकी संस्कृति को निर्धारित करेगी। अगर हम अच्छी भाषा चुनेंगे, तो उससे अमन का वातावरण बनेगा और देश का विकास भी समावेशी होगा।