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किसानों के हित में नहीं है नया भूमि अधिग्रहण कानून
सुभाष चंद्र कुशवाहा
Updated Sat, 03 Jan 2015 01:39 AM IST
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जब खेती योग्य जमीनें कौड़ियों के भाव अधिगृहीत की जाने लगीं, तो वर्ष 2010 में भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों ने ‘किसान संघर्ष समिति’ के बैनर तले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तीव्र विरोध किया। कई जगहों पर उग्र-हिंसक प्रदर्शन हुए, जिसके चलते किसान-पुलिस टकराव के दौरान कई लोगों की जानें गईं।
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दरअसल भूमि अधिग्रहण कानून के बल पर किसानों की जमीनें सस्ते में खरीदकर उद्योगपतियों को दी जा रही थीं, जो उसे महंगे में बेचकर मुनाफा कमा रहे थे। लेकिन किसानों के संघर्ष और बलिदान के बाद राजनीतिक पार्टियों पर दबाव बढ़ा, तो औपनिवेशिक कानून की जगह पर नया भूमि अधिग्रहण कानून पारित किया गया। हालांकि यह कानून भी पूरी तरह से किसानों के हित में नहीं है, लेकिन दो बातें बुनियादी तौर पर औपनिवेशिक कानून से भिन्न हैं। पहला यह कि जमीन अधिग्रहण के लिए पीपीपी परियोजनाओं के लिए सत्तर और निजी परियोजनाओं के लिए अस्सी प्रतिशत किसानों की सहमति जरूरी है और दूसरा यह कि अधिग्रहण से होने वाले पर्यावरणीय या सामाजिक प्रभाव को नजर अंदाज नहीं किया जाएगा। इसके अलावा, इसमें बहुफसली जमीनों के न्यूनतम अधिग्रहण की भी बात है।
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लेकिन आश्चर्य की बात है कि ऐसे दूरगामी कानून को एक वर्ष के अंदर ही बदल दिया गया। नए संशोधित भूमि अधिग्रहण कानून में सरकार ने उपरोक्त दोनों जरूरी प्रावधानों को समाप्त करने का फैसला ले लिया है। कहा जा रहा है कि नए प्रावधानों का इस्तेमाल केवल कुछ चुनिंदा क्षेत्रों, मसलन औद्योगिक गलियारों, पीपीपी मॉडल, ग्रामीण विद्युतीकरण, रक्षा आदि में किया जाएगा, पर विशेषज्ञों का मानना है कि भूमि अधिग्रहण के ज्यादातर मामले इसकी परिधि में आ जाएंगे और मनमानी करने की पूरी छूट मिल जाएगी।
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देश की कुल 10 करोड़ 80 लाख हेक्टेयर जमीन पर खेती होती है। अधिग्रहण के कारण खेती का रकबा लगातार सिकुड़ता गया है। विगत चार दशकों में इस रकबे में 18.5 प्रतिशत की कमी आ चुकी है। वर्ष 1960-61 में प्रति व्यक्ति 2.63 हेक्टेयर खेती योग्य जमीन उपलब्ध थी, जो 2008 में घटकर 0.8 हेक्टेयर रह गई।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां और देशी कॉरपोरेट घराने किसानों को निशाने पर रख मुनाफा कमाना चाहते हैं। भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव भी उसी मकसद को पूरा करता नजर आ रहा है। सरकार का तर्क है कि इससे किसानों को सस्ते मूल्य पर आवास उपलब्ध कराया जाएगा और उनका विकास होगा, लेकिन यहां पूछा जाना चाहिए कि क्या यह कानून किसानों की आत्महत्या को रोकने में कारगर साबित होगा। यदि सरकार की मंशा साफ है, तो जमीन अधिग्रहण से होने वाले सामाजिक और पर्यावरणीय नुकसान को किसके हित में नजर अंदाज किया जा रहा है। अभी हाल ही में झारखंड चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री ने आदिवासियों की जमीनें अधिग्रहित न करने की जो बातें की थीं, उसका क्या होगा? देश में बंद पड़े तमाम कारखानों के नाम करोड़ों एकड़ जमीन बेकार पड़ी है, सबसे पहले तो उन्हीं का उपयोग किया जाना चाहिए।
देखा जाए तो नए कानून के दूरगामी और किसानों पर विनाशकारी प्रभाव होंगे। यह सिर्फ किसानों के खिलाफ ही नहीं है, बल्कि इससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा पैदा होगा। यह कानून किसानों को मजदूर बनने पर मजबूर करेगा। जाहिर है, इसका भी लाभ कॉरपोरेट जगत को ही होगा। सरकार को अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए, अन्यथा किसानों को तबाह कर मेक इन इंडिया का नारा साकार नहीं हो पाएगा।