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कांग्रेस में नेतृत्व के सवाल पर फिर मंथन शुरू, राहुल के अलावा और क्या विकल्प?

Wed, 18 Nov 2020 05:10 AM IST
रशीद किदवई रशीद किदवई
रशीद किदवई Published by: रशीद किदवई Updated Wed, 18 Nov 2020 05:10 AM IST
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Lack of thought in Congress, start churning again on leadership question, what are the options
सोनिया गांधी और राहुल गांधी - फोटो : पीटीआई

बिहार विधानसभा और मध्य प्रदेश के उपचुनाव में कांग्रेस की पराजय के बाद पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी की मदद के लिए गठित विशेष समिति की मंगलवार शाम को एक बैठक हुई, जिसमें राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने पर विचार विमर्श हुआ। लेकिन इस बैठक से सोनिया गांधी ने खुद को अलग कर लिया। इसकी दो वजहें बताई जाती हैं- एक तो यह कि वह स्वयं पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष हैं और दूसरा इस बैठक में राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने के मुद्दे पर चर्चा होनी थी। चूंकि वह राहुल गांधी की मां भी हैं, इसलिए पैनल की बैठक पर इसका कोई प्रभाव न पड़े और पैनल अपने विवेक से फैसले ले सके, इसलिए उन्होंने इस बैठक से खुद को अलग रखा। यानी कांग्रेस में एक बार फिर नेतृत्व के सवाल पर मंथन शुरू हो गया है।


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अब पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए तात्कालिक रूप से यह जरूरी हो गया है कि या तो वह स्वयं पार्टी की बागडोर संभालें अथवा किसी और के हाथ में पार्टी की कमान सौंप दें। एक तीसरी संभावना भी है, जो कांग्रेस की संस्कृति के मद्देनजर सही जान पड़ती है कि कठपुतली की तरह किसी व्यक्ति को पार्टी अध्यक्ष बना दिया जाए, जो तीनों गांधी-सोनिया, राहुल और प्रियंका की इच्छानुसार पार्टी को चलाए। ये सभी तीनों संभावनाएं खतरों और अंतर्निहित कमजोरियों से भरी हुई हैं। यदि राहुल वास्तव में साहस करते हैं और कांग्रेस प्रमुख के रूप में कार्यभार संभालने को तैयार होते हैं, तो उन्हें सर्वसम्मति से चुने जाने के लिए संगठनात्मक चुनावों से होकर गुजरना होगा। कांग्रेस के भीतर राहुल के नामांकन को चुनौती देने की दूर-दूर तक संभावना नहीं है, क्योंकि मध्यम श्रेणी के पार्टी नेता को भी राज्य कांग्रेस इकाई के प्रतिनिधियों से बने इलेक्ट्रल कॉलेज में गांधी परिवार की पकड़ के बारे में अच्छी तरह से पता है। चूंकि सभी राज्य इकाई प्रमुखों को राहुल और सोनिया द्वारा चुना गया है, इसलिए इस बात की बहुत कम संभावना है कि कोई भी पदाधिकारी या प्रदेश कांग्रेस कमेटी का प्रतिनिधि उनके प्रति निष्ठावान न हो, खासकर यह जानते हुए कि कांग्रेस का राजनीतिक नेतृत्व गांधी परिवार के साथ मजबूती से जुड़ा है।

दूसरी संभावना है कि राहुल और गांधी परिवार के अन्य सदस्य खुद को इस प्रतिस्पर्धा से बाहर रखें और कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष तरीके से होने दें, जो आदर्श है। वर्षों से राहुल और कांग्रेस एक दूसरे पर निर्भर हो गए हैं। ध्यान देने वाली बात है कि 2014 के बाद गांधी परिवार कमजोर हुआ है। उनकी एसपीजी सुरक्षा वापस ले ली गई है और नेशनल हेराल्ड से लेकर राजीव गांधी फाउंडेशन तक के मामले आयकर, ईडी और अन्य एजेंसियों की नजर में हैं। 2019 में जब राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था, तो पार्टी ने गंभीरता पूर्वक एक गैर-गांधी को पार्टी प्रमुख बनाने के बारे में विचार किया था।  

कमजोर तबके से ताल्लुक रखने वाले पार्टी के वरिष्ठ नेता मुकुल वासनिक का नाम लगभग तय हो गया था, लेकिन अंतिम क्षण में उनका चुनाव स्थगित हो गया, तब पी चिदंबरम एवं अन्य लोगों ने अंतरिम अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी को आगे पद पर बने रहने के लिए कहा। तर्क यह दिया गया कि वासनिक हर चीज यानी मुद्दों से लेकर नियुक्ति तक के लिए सोनिया, राहुल एवं प्रियंका का मुंह देखेंगे। कांग्रेस के भीतर विद्रोही या असंतुष्ट खेमा वास्तविकता को समझने में असमर्थ है। उसका लक्ष्य वास्तव में वाजिब सुधार के बजाय राहुल को कमजोर करना है। इसलिए एक भी ऐसा नेता नहीं दिखाई देता है, जो खुद को पार्टी अध्यक्ष का उम्मीदवार घोषित करे। न ही हमें कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव सहित कांग्रेस के संगठनात्मक चुनावों की घोषणा के लिए कोई आह्वान दिखाई देता है, या कम से कम कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव करने वाले पीसीसी प्रतिनिधियों की सूची का प्रकाशन होता है। उनका एक सीमित एजेंडा है कि कांग्रेस सचिवालय में जगह बनाएं या कांग्रेस कार्य समिति में कोई पद मिल जाए।

कांग्रेस के असंतुष्ट गुट यह आरोप लगाते हैं कि कांग्रेस का संचालन ठीक ढंग से नहीं हो रहा है। ऐसे में कांग्रेस के संविधान के अनुसार बताई गई प्रक्रिया से इसका समाधान तलाशा जा सकता है। अगर राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनना चाहते हैं, तो चुनाव के जरिये दूसरे किसी व्यक्ति को कांग्रेस अध्यक्ष चुना जा सकता है। लेकिन इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि अगर गांधी परिवार से अलग कोई व्यक्ति पार्टी अध्यक्ष बनता है, तो क्या उससे कांग्रेस पार्टी की दशा-दिशा बदलेगी। क्या मुकुल वासनिक, शशि थरूर या कपिल सिब्बल अथवा कोई अन्य व्यक्ति कांग्रेस का अध्यक्ष बनता है, तो क्या कांग्रेस का मतदाता वापस लौटेगा? क्या वे नेहरू-गांधी परिवार से ज्यादा मतदाताओं को आकर्षित कर पाएंगे? 

दूसरी बात है मुद्दों की। कांग्रेस का इतिहास ऐसा रहा है कि एक ही मुद्दे पर अलग-अलग विचार रहे हैं, जबकि वामपंथी या दक्षिणपंथी दलों में एक ही विचार होता है और उसी का सभी राज्य या क्षेत्रीय इकाई अनुसरण करते हैं। अब कश्मीर में अनुच्छेद 370 की बात ले लीजिए। वहां नेशनल कांफ्रेस, पीडीपी एवं अन्य दलों ने अनुच्छेद 370 को फिर से लागू करने के लिए गुपकार एलायंस बनाया है, जिसे भाजपा देश विरोधी कदम बता रही है। कांग्रेस की कश्मीर घाटी की इकाई (यहां जम्मू की बात नहीं हो रही) भी चाहती है कि अनुच्छेद 370 लागू हो और जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा मिले। विचारधारा की अनुपस्थिति कांग्रेस की आज सबसे बड़ी कमजोरी हो गई है। बिहार में ओवैसी की पार्टी की जीत से यही साबित हुआ। मुस्लिम मतदाता भी अब कांग्रेस को विकल्प के रूप में नहीं देखते हैं। तो अगर दक्षिणपंथी सोच हिंदू और मुस्लिम, दोनों में हावी हो रहा है, तो कांग्रेस के लिए कोई जगह नहीं दिखती है। ऐसे बहुत से प्रश्न हैं, जिनका कांग्रेस के पास कोई उत्तर नहीं है। इसलिए सिर्फ नेतृत्व का सवाल हल होने से काम नहीं चलने वाला है। समस्या यह है कि वह जब जनता के पास जाएगी, तो उसके मुद्दे क्या होंगे। कांग्रेस से जुड़े रहे दिवंगत कवि श्रीकांत वर्मा  ने लिखा था, कोसल अधिक दिनों तक टिक नहीं सकता/ कोसल में विचारों की कमी है!

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