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खैबर पख्तूनख्वा आपातकाल: पाकिस्तान के हाल कैसे बयां करें, क्या कभी स्थिर सियासी व्यवस्था वाला देश बन सकेगा?
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पड़ोसी देश में किल्लत
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घर में नहीं दाने, अम्मा चलीं भुनाने-यह कहावत पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति का सटीक वर्णन करती है, जो गंभीर घरेलू दिवालियापन, महंगाई और बुनियादी चीजों की कमी से जूझ रहा है, फिर भी, महंगी रक्षा खरीद और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक दांवपेचों पर भारी निवेश कर रहा है। पाकिस्तान की सभी सरकारों ने बाहरी मामलों में जरूरत से ज्यादा दखल दिया, जबकि आंतरिक मामलों में वे जरूरी काम नहीं कर पाईं। 'पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर पीस स्टडीज' (पिप्स) के एक नए अध्ययन से पता चला है कि पाकिस्तान में असुरक्षा पिछले एक दशक के सबसे उच्च स्तर पर पहुंच गई है।
मौजूदा राजनीतिक उथल-पुथल इसका कारण भी है और परिणाम भी। संघीय सरकार ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आपातकाल की घोषणा करके गवर्नर शासन लागू कर दिया है। वहां 'पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ' (पीटीआई) की सरकार थी। मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी और विधानसभा अध्यक्ष बाबर सलीम स्वाती सहित पार्टी के कई शीर्ष प्रांतीय नेता हिरासत में हैं। आठ अक्तूबर को पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के साथ एक समझौता किया। इस समझौते से पाकिस्तान को अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए 1.2 अरब डॉलर की अतिरिक्त राशि मिल सकती है।
द इकोनॉमिस्ट पत्रिका के अनुसार, पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां और गंभीर हो गई हैं। यह स्थिति तब है, जब देश के सेना प्रमुख, आसिम मुनीर, अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को एक मजबूत और प्रभावशाली देश के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी), बलूच अलगाववादी समूहों और अन्य चरमपंथी संगठनों के हमलों में वृद्धि हुई है। इससे खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांतों पर विशेष दबाव पड़ा है, जो लगातार गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
पिप्स अध्ययन के अनुसार, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच चल रहे सुरक्षा तनाव बढ़ती अस्थिरता के मुख्य कारणों में से एक हैं। इसके चलते चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत चल रही परियोजनाएं खतरे में पड़ गई हैं। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि हिंसा का जारी रहना पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती है। पाकिस्तानी धार्मिक विद्वानों और राजनीतिक हस्तियों ने सरकार से आग्रह किया है कि पाकिस्तान की सुरक्षा समस्याओं के लिए अफगानिस्तान को दोष न दिया जाए। इसके बजाय, इस्लामाबाद को देश की आंतरिक सुरक्षा समस्याओं को सुलझाने पर ध्यान देना चाहिए। गौरतलब है कि पाकिस्तान के मौजूदा हालात में भारत की भूमिका न के बराबर है। दोनों देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे से भिड़ते हैं और एक-दूसरे के बारे में बात तो करते हैं, लेकिन आपस में संवाद नहीं करते।
खाड़ी युद्ध में मध्यस्थ की भूमिका निभाने से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को कोई खास फायदा नहीं हुआ है। खाड़ी देशों से ऊर्जा आयात, विदेशों से मिलने वाली रकम (रेमिटेंस) और क्षेत्रीय फंडिंग पर निर्भरता के कारण, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर इस युद्ध के बुरे प्रभावों का खतरा बना हुआ है।
पाकिस्तानी राष्ट्रवाद, पहचान की तलाश और जनसांख्यिकीय चुनौतियों ने पाकिस्तानी समाज और राजनीति में दरारों को और गहरा ही किया है। 1947 से ही, पाकिस्तानियों के बीच इस पर बहस होती रही है कि उनका देश 'मुस्लिम-बहुसंख्यक' राष्ट्र है या 'इस्लामिक' राष्ट्र। यह विभाजन राजनीति, समाज, शिक्षा पाठ्यक्रम, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति—हर जगह दिखाई देता है।
अमेरिका स्थित हडसन इंस्टीट्यूट (जून 2026) के एक विश्लेषण के अनुसार, पाकिस्तान को सबसे बड़ा डर 1971 जैसी स्थिति के दोहराए जाने का है, जब पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बन गया था। बलूच और पश्तून अलगाववाद, साथ ही मुहाजिर और सिंधी राष्ट्रवाद को पाकिस्तान की सुरक्षा और अखंडता के लिए खतरा माना जाता है। पाकिस्तान इस्लामी संगठनों और उग्रवादी समूहों को समर्थन देता है, ताकि क्षेत्रीय विदेश नीति के लक्ष्यों और घरेलू राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके। पाकिस्तानियों को उन आतंकवादियों से नुकसान उठाना पड़ा है, जिन्हें अफगानिस्तान और भारत को निशाना बनाने के लिए पाला-पोसा गया था। हाल के वर्षों में देश के भीतर आतंकवाद से जुड़ी मौतों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। काबुल में अफगान तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद, उसी विचारधारा वाले टीटीपी के हमलों में भी तेजी आई है।
पाकिस्तान के दक्षिण एशियाई पड़ोसी देश (बांग्लादेश और श्रीलंका) मानव विकास और लैंगिक सूचकांकों में उससे बेहतर स्थिति में हैं। पाकिस्तान ने भारत के साथ सैन्य प्रतिस्पर्धा को प्राथमिकता देते हुए अपने ही लोगों के हितों की अनदेखी की है। सैन्यीकरण के कारण यह देश मानव पूंजी का निर्माण करने, अर्थव्यवस्था को बढ़ाने और राजनीतिक व्यवस्था को स्थिर करने में विफल रहा है।
कार्नेगी एंडोमेंट का कहना है कि मुनीर की कमान में, सेना ने एक कमजोर नागरिक सरकार के जरिये देश में अपना दबदबा मजबूत कर लिया है। सेना ने ऐसा पीएमएल-एन और पीपीपी जैसे प्रतिद्वंद्वियों के बीच तालमेल बिठाकर किया है। इसके साथ ही मीडिया पर नियंत्रण और सेंसरशिप, इंटरनेट पर लगाम, और लगातार कठोर दमन की कार्रवाई भी की गई है। सेना के भीतर मतभेदों को इस तरह संभाला जा रहा है, जिससे आंतरिक विरोध का खतरा बढ़ सकता है। पिछले तीन वर्षों में सेना के नियंत्रण वाली सरकार के सामने मुख्य चुनौती देश के हालात पर अपनी पकड़ मजबूत करना रही है। इसकी कार्यप्रणाली का मूल आधार 'कठोर राज्य' का दृष्टिकोण है, जिसमें आंतरिक सुरक्षा और राजनीतिक प्रबंधन के लिए एक सख्त, सैन्य-आधारित ढांचा अपनाया जाता है और राजनीतिक दमन एवं संविधान में बदलाव का सहारा लिया जाता है, ताकि राजनीतिक असहमति तथा जन-लामबंदी को सीमित किया जा सके।
हालांकि मुनीर ने सफलतापूर्वक अपनी सत्ता मजबूत कर ली है, लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार देश के भीतर अपनी स्वीकार्यता बनाने के लिए—या अभिजात वर्ग के समर्थन और उन पर अपनी निर्भरता बनाए रखने के लिए—अंतरराष्ट्रीय सद्भावना पर दांव लगा रही है। कार्नेगी अध्ययन कई सवाल खड़े करता है। भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से जूझ रहे पाकिस्तान का एक आधुनिक और स्थिर राजनीतिक व्यवस्था वाले देश के रूप में उबर पाना मुश्किल लगता है।