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फिर सिर उठातीं खालिस्तानी ताकतें

Fri, 24 Jul 2020 02:24 AM IST
ravindar dubey रवींद्र दुबे
Updated Fri, 24 Jul 2020 02:24 AM IST
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Khalistani forces raise their heads again
खालिस्तान की मांग - फोटो : अमर उजाला

कोविड-19 के प्रकोप के चलते हुई घरबंदी में इन दिनों एक सवाल काफी जोरों से उभर रहा है कि सिख उग्रवाद की असली वजह खालिस्तान आंदोलन जड़मूल से खत्म हो गया है या नहीं। ताजातरीन घटनाएं तो इसी तरफ इंगित करती हैं कि सिखों द्वारा स्वतंत्र राज्य की मांग करने वाला यह आंदोलन एकाएक फिर से सिर उठा रहा है।


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कनाडा और बेल्जियम के नंबरों से अनेकों भारतीयों को किसी गुरपतवंत सिंह पन्नू के नाम से फोन आते हैं, जिनमें एक रेकॉर्डेड संदेश होता है कि दिल्ली में सिखों की जो नस्लकुशी हुई है, उसका बदला जरूर लिया जाएगा और दिल्ली पर खालिस्तान का झंडा फहराया जाएगा। और हां, इन कॉल्स का कोई निर्धारित समय नहीं होता। ये कभी भी आते हैं। ऐसा ही एक कॉल विगत 19 जुलाई को आया।

इन गतिविधियों ने भारतीय खुफिया एजेंसियों की नींदें हराम कर रखी हैं। गृह मंत्रालय के जानकार सूत्रों के अनुसार, न तो कभी सिख उग्रवाद का पूरी तरह से सफाया हुआ और न ही खालिस्तानी गतिविधियों पर विराम लगा। देश के बाहर खालिस्तान आंदोलन हमेशा जारी रहा।

हां, नब्बे के दशक में पाकिस्तानी दुर्दांत खुफिया एजेंसी आईएसाई ने जो ऑपरेशन के-2 चलाया था, उसकी गतिविधियां कम जरूर हुई थीं, पर पूरी तरह नहीं। सूत्रों का कहना यह भी है कि अब इस ऑपरेशन को फिर से हवा दी जा रही है। दिल्ली, हरियाणा व पंजाब में आ रही इस तरह की भड़काऊ ऑडियो कॉल की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपी गई है।

इंडियन वर्ल्ड फोरम का कहना है कि पन्नू सिखों के पुराने जख्मों को कुरेद कर जहर फैला रहा है। बताया जाता है कि पन्नू सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय रहता है। खुफिया विभाग की जानकारी के अनुसार, आईएसआई के इशारे पर खालिस्तानी आतंकी दिल्ली में बड़ी वारदात कर या करा सकते हैं। इस कारण 15 अगस्त को लेकर काफी सतर्कता बरती जा रही है।

खालिस्तानी आंदोलनकारियों ने दुनिया भर के सिखों का एक जनमत संग्रह भी नवंबर में कराने की योजना बनाई थी। कोविड-19 के चलते अब इसे 2022 तक मुल्तवी कर दिया गया है। इस सिलसिले में यसटूखालिस्तान. ऑर्ग नामक एक वेबसाइट भी शुरू की गई है।

यह सब सिख्स फॉर जस्टिस नामक अनिवासी भारतीय सिखों के अमेरिका स्थित एक संगठन के तत्वावधान में हो रहा है। इसी तरह की एक वेबसाइट कनाडा से भी शुरू की गई है, जिसका नाम है दिल्लीबनेगाखालिस्तान.सीए। गौरतलब है कि पंजाब के बाद सबसे ज्यादा सिख कनाडा में हैं। 

खालिस्तान की मांग दोहराने के पीछे की वजह 1984 में भारत के कुछ शहरों, खासकर दिल्ली, में हुए नरसंहार को बताया जा रहा है। उस नरसंहार के जिम्मेदार चंद कांग्रेसी नेताओं पर कोई कानूनी कारवाई नहीं हुई थी। आज 36 साल बाद यह बात तब दोहराई जा रही है, जब देश में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार है और 1984 के आरोपियों पर अगर कोई कार्रवाई हुई है, तो इसी सरकार के दौर में।

इतने वर्षों में उस कांड के कई गवाह मर चुके हैं और इस वजह से अब कोई कानूनी कारवाई हो पाना बहुत मुश्किल है। फिर भी निहित स्वार्थ इस बात को बेवजह हवा देकर मौजूदा सरकार को परेशानी में डालने की कोशिशों में लगे हुए हैं।

खालिस्तानी कुछ भी मानें, लेकिन पंजाबियों और सिखों की एक बड़ी संख्या मानती है कि भारत ही उनका देश है। पिछले दिनों तालिबान ने अफगानिस्तान में एक सिख धर्मावलंबी को गिरफ्तार कर लिया था, तब भारत ने ही मध्यस्थता कर उसे छुड़वाया था। इसी तरह पाकिस्तान में एक सिख लड़की के साथ कुछ ज्यादती की गई थी, तब भारत ने ही दबाब बनाकर उसे राहत दिलवाई थी।

भारत में सिख उग्रवाद की समस्या बीती सदी के अस्सी के दशक में उपजी थी, जब जनता पार्टी की सरकार के ढह जाने के बाद कांग्रेस दोबारा सत्ता में आई थी। उस समय ज्ञानी जैल सिंह गृह मंत्री थे और पंजाब में भी दरबारा सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी।

केंद्र सरकार की कुछ ऐतिहासिक भूलों के चलते संत जरनैल सिंह भिंडरावाले का पंजाब के राजनीतिक क्षितिज पर उदय हुआ था और फिर दिखाई दिया था सिख उग्रवाद का कुरूप चेहरा, जिसने हालात काबू होते-होते 20,000 से ज्यादा लोगों की बलि ले ली थी।

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