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संतुलित विकास की कुंजी

Wed, 14 Feb 2018 06:59 PM IST
सुरेंद्र बांसल
सुरेंद्र बांसल Updated Wed, 14 Feb 2018 06:59 PM IST
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Key to balanced development
सुरेंद्र बांसल

हमारा वैदिक काल पर्यावरण के गूढ़ रहस्यों को समझने का हरियाला काल था। पृथ्वी को माता, आकाश को पिता, जल को देवता जैसे संबोधन उसी स्वर्ण काल की देन हैं। उस काल में धरती को बचाने की हजारों प्रार्थनाएं संकलित की गईं, लेकिन वैदिक काल के ऋषियों ने प्रार्थनाओं को सिर्फ पुस्तकों तक ही सीमित नहीं रखा, उन्होंने इन प्रार्थनाओं को धरती के भीतर रोपा भी। आज धरती मां का दुख सर्वविदित है। उसे संभाले रखने वाले तत्व- जल, वनस्पति, आकाश और वायु विकास की चिमनियों से निकलने वाले धुएं के कारण हांफ रहे हैं। भूमंडलीकरण की लालची जीभ ने इन सभी तत्वों को बाजार में सुंदर पैकिंग में भर व्यापार की वस्तु के रूप में पेश कर दिया है। इन चारों के कम होने से पांचवें अंग यानी अग्नि ने आज पूरी धरती को भीतर-बाहर से घेर लिया है, जिसके कारण धरती तपने लगी है। इसीलिए 'पृथ्वी दिवसों' की आड़ में संयुक्त राष्ट्र जैसे धरती के दूर के रिश्तेदार आईसीयू में डायलिसिस पर लेटी धरती को शीशों के कमरों से झांकते रहते हैं। धरती के ताप की चिंता में दुबले हो रहे थर्मामीटर लेकर बैठे संयुक्त राष्ट्र ने पिछले दिनों 'सहस्राब्दि का पर्यावरण आकलन' छापा।


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इस आकलन के अनुसार, विश्व की प्रमुख नदियों में पानी की मात्रा निरंतर घट रही है। अफ्रीका की नील, चीन की यलो, उत्तरी अमेरिका की कोलराडो नदियों से लेकर भारत की प्रमुख नदियां भी हमारी आस्थाओं की तरह निरंतर सूखती जा रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार धरती की शक्ति बढ़ाने वाले समस्त प्राकृतिक तत्व भी अस्त-व्यस्त हो चले हैं। धरती के गर्भ का गिरता जल स्तर लगातार जीवन मूल्यों की तरह रसातल में उतरता जा रहा है। संसार के 15 प्रतिशत पक्षी, 30 प्रतिशत स्तनधारी जीव लगभग विलुप्त हो गए हैं। पृथ्वी का हरियाला तंत्र बिगड़ने के कारण बीमारियों के प्रकोप भी लगातार बढ़ रहे हैं। इसलिए विश्व के कुछ अमीर देश पूरे संसार की वनस्पतियों पर नजर गड़ाए हैं। कुछ ऐसे ही बिगड़ैल अमीर राष्ट्र विकासशील राष्ट्रों की बेबस राज्य सरकारों को मामूली लालच देकर स्थानीय संसाधनों की छीना-झपटी में लगे हैं।

आज धरती की प्रत्येक परत में यानी परत-दर-परत विकार बढ़ते जा रहे हैं। अजीबो-गरीब कीटनाशक, तरह-तरह की रासायनिक खादें धरती मां की रगों तथा जोड़ों में जहर बन घुल चुकी हैं। आज हममें से ज्यादातर लोगों के शरीर में खून के साथ-साथ पेस्टीसाइड की मात्रा लगातार बढ़ रही है। विकास की इसी होड़ में बड़ी कंपनियों के उच्चाधिकारी तथा नेतागण मस्त दिखते हैं, शेष पूरी जनता त्रस्त है। पश्चिमी दृष्टि प्रकृति के प्रत्येक सौंदर्य को मात्र उपभोग की वस्तु मानती है। 'पर्यावरण आकलन' की आड़ में संयुक्त राष्ट्र ने तो द डे आफ्टर फिल्म दिखा तो दी, लेकिन इसका इलाज क्या है, कैसे उतरेगा धरती का ताप, किन-किन उपायों से धरती की काया पुनः कंचन -कुंदन हो सकती है, इसके बारे में कोई ठोस दलील नहीं सुझाई? आज धरती का माथा कहे जाने वाले ग्लेशियरों तक का तापमान 30-32 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है।

पृथ्वी की चिंता करने वालों को 'भारतीय पर्यावरण दृष्टि' को ठीक से समझने की आवश्यकता है। जिन लोगों ने सदियों से कुछ नहीं सोचा, वे भी कह रहे हैं कि हम विचारधारा की जंग लड़ रहे हैं। इसी जंग के कारण हमारी धरती माता के बदन में बम, रासायनिक पदार्थ, सीमेंट, पॉलीथिन, पेस्टीसाइड और न जाने क्या-क्या पदार्थ धंसाए जा रहे हैं। क्या प्रकृति से लड़कर शांति का कोई झंडा फहराया जा सकता है? 

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