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मुद्दा: बाघों का संरक्षण करना है तो...भावनाएं नहीं, रेडियो कॉलर जैसी वैज्ञानिक तैयारी जरूरी

Tue, 30 Dec 2025 08:01 AM IST
विजय त्रिपाठी विजय त्रिपाठी
Updated Tue, 30 Dec 2025 08:01 AM IST
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सार
बाघ संरक्षण भावनाओं से नहीं, वैज्ञानिक तैयारी से होता है। रेडियो कॉलर को बढ़ावा देकर भविष्य में अमृतपुर जैसी घटनाओं को रोका जा सकता है।
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Katarniaghat Tiger Reserve incident Tiger conservation requires scientific preparation not just emotions
जंगल में घूमते बाघ (फाइल फोटो)

विस्तार

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के कतर्नियाघाट टाइगर रिजर्व की जद में बसे अमृतपुर गांव में पिछले महीने एक सर्द सुबह पिंजरे में कैद बाघ के शावक की किस्मत शायद अलग होती, अगर वहां के रेंजर के पास एक अदद रेडियो कॉलर होता। वन विभाग ने करीब दो साल के इस शावक को गांव वालों के लिए खतरा मानते हुए कानपुर चिड़ियाघर भेज कर उसकी आगे की जिंदगी उम्र कैद में बदल दी। इस पूरे घटनाक्रम ने बाघ संरक्षण की सरकारी मुहिम पर सवालिया निशान लगा दिया है।


दरअसल, कतर्नियाघाट के मुर्तिहा वन रेंज के इस गांव में खेत में काम कर रहे लोगों पर हमला कर इस शावक ने एक किसान को मौत के घाट उतार दिया था। वन विभाग की टीम ने पग चिह्नों से समझा कि यह बाघ नहीं, तेंदुआ है। तेंदुए वाला पिंजरा लगा दिया गया और जो जीव कैद हुआ, वह स्वस्थ नर बाघ निकला। यह दृश्य ग्रामीणों के लिए रोमांचकारी और भयावह, दोनों था। इस शावक को एक बड़े पिंजरे में कैद कर कानपुर चिड़ियाघर भेज दिया गया। यह सफर इतना दुखद रहा कि वन अधिकारियों को भी द्रवित कर गया। बताया गया कि उसकी जंगल में पुनर्वापसी से मानव-पशु संघर्ष बढ़ सकता था।


विशेषज्ञों और वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि अगर वन विभाग के पास रेडियो कॉलर होता, तो इसे सुरक्षित तरीके से जंगल में वापस उसके प्राकृतिक वास में छोड़ा जा सकता था। कतर्नियाघाट और दुधवा टाइगर रिजर्व को मिलाकर सिर्फ दो ही रेडियो कॉलर सरकार द्वारा वन विभाग को उपलब्ध कराए गए हैं और दोनों ही पहले से सक्रिय हैं। ये रेडियो कॉलर भारत में भी बनने लगे हैं और सस्ते भी पड़ते हैं। जीपीएस से लैस इनके अंदर मौजूद बैटरी ट्रांसमीटर को चलाती है।

बाघों की गतिविधियों को समझने का सबसे प्रभावी माध्यम रेडियो कॉलर को माना जाता है। इससे पता चलता है कि बाघ किस दिशा और इलाके में जा रहा है, क्या वह मानव बस्तियों की ओर बढ़ रहा है, उसका शिकार-व्यवहार कैसा है। इन जानकारियों के आधार पर ही वन विभाग वैज्ञानिक प्रबंधन और टकराव कम करने की रणनीति बनाता है। रेडियो कॉलर की कमी का मतलब है अंधेरे में काम करना। कतर्नियाघाट में यही हुआ। प्रजनन काल शुरू होने पर वर्चस्व की लड़ाई से बचाने के लिए उस शावक की मां ने उसे सुरक्षित जगह पहुंचाना चाहा, पर जंगल छोड़कर खेतों में भटका यह बाघ वैज्ञानिक पद्धति से मॉनिटर नहीं हो सका। वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि इसे संसाधनों की कमी के कारण उम्र कैद की सजा मिल गई।

कतर्नियाघाट और दुधवा क्षेत्र में मानव-बाघ संघर्ष के मामले पिछले कुछ वर्षों में बढ़े हैं। बाघों की संख्या में वृद्धि, जंगल का दायरा कम होना, जंगल की सीमा से सटी गन्ने की फसलों का विस्तार और शिकार की कमी के चलते बाघ अक्सर गांवों की ओर चले आते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि रेडियो कॉलर बाघों के कदमों को समय रहते पहचान लेती है और टकराव को रोक सकती है। इस बाघ की मूवमेंट पहले से सही ढंग से ट्रैक करके उसे जंगल में सुरक्षित दूरी पर रखा जाता। बाघों की आबादी बढ़ना सकारात्मक संकेत है, पर उनके संरक्षण की तैयारी अपेक्षाकृत बेहद कमजोर है। वनकर्मियों की संख्या कम है, वैज्ञानिक उपकरण सीमित हैं, मॉनिटरिंग सिस्टम अधूरा, व बजट अनुपातहीन है। विशेषज्ञों का कहना है कि बाघों को बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है, उन्हें सुरक्षित रखना। काश सरकार इस बात को समझे।

हालांकि वन विभाग के कार्यवाहक प्रमुख मुख्य वन संरक्षक बी प्रभाकरन की दलील है कि यह बाघ एक आदमी को मार चुका था। रेडियो कॉलर लगाने के बावजूद बाघों का आबादी वाले इलाकों में आने के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं। इसलिए इस बाघ को चिड़ियाघर भेजने का निर्णय लिया गया। लेकिन इस दलील में इसलिए दम नहीं है कि ऐसे हालात में पकड़े गए बाघ रेडियो कॉलर लगाकर वन में छोड़े जा चुके हैं। पांच मार्च, 2018 को पीलीभीत वन प्रभाग के चंदूपुर माधोटांडा क्षेत्र से एक नर बाघ को पकड़ कर दुधवा नेशनल पार्क में रेडियो कॉलर से लैस कर छोड़ा गया था। 13 नवंबर, 2024 को नार्थ खीरी के मझगई रेंज से पिंजरे में कैद बाघ को कतर्नियाघाट प्रभाग के मुर्तिहा वन रेंज और छह मार्च, 2025 को लखनऊ के रहमानखेड़ा में पिंजरे में कैद हुए बाघ को रेडियो कॉलर से लैस कर दुधवा नेशनल पार्क में छोड़ा गया था।

अमृतपुर के बाघ को कानपुर भेजना शायद मजबूरी रही हो, लेकिन अगर रेडियो कॉलर होता, तो यह बाघ आज भी कतर्नियाघाट के घने जंगलों में अपनी नई टेरिटरी बना रहा होता। तकनीकी कमी ने उसे उम्र कैद का जीवन दे दिया। यह घटना वन विभाग के लिए एक चेतावनी है। बाघ संरक्षण भावनाओं से नहीं, वैज्ञानिक तैयारी से होता है। उम्मीद है कि इस घटना के बाद कतर्नियाघाट में रेडियो कॉलरिंग को बढ़ावा दिया जाएगा।
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