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आरक्षण: कन्नड़ कार्ड खेलती कर्नाटक सरकार… सांविधानिक व्यवस्था के बगैर कांग्रेस सरकार का फैसला चौंकाने वाला

Mon, 22 Jul 2024 06:57 AM IST
virag gupta विराग गुप्ता
Updated Mon, 22 Jul 2024 06:57 AM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1994 के फैसले में राज्यों में माटी पुत्रों के आरक्षण को संविधान के अनुच्छेद 16 (2) के खिलाफ बताया था। विपक्ष के नेता संविधान और न्याय की बात कर रहे हैं, तो फिर उन्हीं की पार्टी की सरकार सांविधानिक व्यवस्था के बगैर निजी क्षेत्र में आरक्षण कैसे लागू कर सकती है?
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Karnataka Politics Congress Govt Siddaramaiah Private Sector Quota Constitutional Provision
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया (फाइल) - फोटो : ANI

विस्तार

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 की समाप्ति से पूरे देश में एकीकरण का माहौल बना था। लेकिन कर्नाटक, हरियाणा और झारखंड जैसे राज्यों में निजी क्षेत्र की ग्रुप सी और डी वर्ग की नौकरियों में स्थानीय लोगों को आरक्षण देने का कानून बनने से राष्ट्रीय एकता के साथ आर्थिक विकास की रफ्तार गड़बड़ा सकती है। आरक्षण की राजनीति के पैंतरे को अंतरराष्ट्रीय नजरिये से समझना जरूरी है। बांग्लादेश में आरक्षण की आग बढ़ने से भारतीयों का पलायन बढ़ रहा है। उसी तर्ज पर कर्नाटक में सिद्धरमैया सरकार कन्नड़ कार्ड खेल रही है। सरकारी खजाने से रेवड़ियां बांटने को अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक माना जा रहा है। लेकिन निवास को मनमाफिक तरीके से निर्धारित करने के कानूनों से अर्थव्यवस्था के साथ संविधान और संघीय व्यवस्था भी चरमरा सकती है।


संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार, नागरिकता, आईटी, कंपनी कानून और आरक्षण जैसे विषय पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। भाषा के आधार पर राज्यों के गठन के बाद महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पंजाब जैसे कई राज्यों में माटी पुत्रों को रोजगार में प्राथमिकता देने की पहल नेताओं ने की। लेकिन शिक्षा, डिजिटल और संचार के प्रसार से राज्यों में उपराष्ट्रवाद के आंदोलन कमजोर होते गए। देश की राजधानी दिल्ली है, लेकिन वित्तीय राजधानी के तौर पर मुंबई और आईटी राजधानी के तौर पर बंगलूरू, हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहरों का विकास हुआ। इन शहरों के विकास में सभी राज्यों के निवासियों के साथ केंद्रीय करों का बहुत बड़ा योगदान है।


कर्नाटक के प्रस्तावित कानून से ई-कॉमर्स, स्टार्टअप, आईटी, आईटीईएस और जीसीसी सेक्टर की कंपनियां सबसे ज्यादा प्रभावित होंगी। इसलिए भाषा या क्षेत्र के आधार पर निजी क्षेत्र में आरक्षण गलत और असांविधानिक है। भ्रष्टाचार और नेतृत्व परिवर्तन की चुनौतियों से जूझ रही सिद्धरमैया सरकार आरक्षण बिल को नए सिरे से विधानसभा में पारित कराने की कोशिश कर सकती है। इसलिए मंत्रिमंडल की नई मंजूरी के बाद यदि विधानसभा में बिल को पारित किया जाए, तो उस बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए राज्यपाल भेज सकते हैं।

सियासत से हटकर निजी क्षेत्र में आरक्षण के सांविधानिक पहलुओं की पड़ताल बेहद जरूरी है। संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार, नागरिकता से जुड़े मामलों में सिर्फ केंद्र सरकार और संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद-14 में समानता और अनुच्छेद-19 में व्यापार की स्वतंत्रता के बारे में प्रावधान हैं।

अनुसूचित जाति व जनजाति, महिला, ओबीसी, दिव्यांग जैसे वंचित वर्ग को आरक्षण देने के लिए संविधान में अपवाद स्वरूप प्रावधान किए गए हैं। सरकार द्वारा दी गई रियायती भूमि पर बनाए गए स्कूलों और अस्पतालों में गरीबों और आर्थिक रूप से कमजोर (ईडब्ल्यूएस) वर्ग के लोगों को सस्ती शिक्षा और इलाज के लिए प्रावधान हो सकते हैं। लेकिन निजी क्षेत्र में क्षेत्र या भाषा के आधार पर आरक्षण के लिए कोई सांविधानिक व्यवस्था नहीं है। इस बारे में संविधान के अनुच्छेद 16 (3) और 35 ए के तहत राज्यों के बजाय सिर्फ संसद को ही कानून बनाने की शक्ति हासिल है।

वर्ष 1992 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, सरकारी क्षेत्र में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी निर्धारित की गई है। ऐसे में राज्यों में निजी क्षेत्र में उससे ज्यादा आरक्षण कैसे दिया जा सकता है? हाईकोर्ट के जजों ने आंध्र प्रदेश के कानून को असांविधानिक बताया था। हरियाणा के कानून को तो हाईकोर्ट ने पिछले साल रद्द ही कर दिया था। झारखंड का कानून भी हाईकोर्ट की वजह से आगे नहीं बढ़ पाया। सरकारी खर्चे पर मुकदमेबाजी बढ़ने से दोहरा नुकसान होता है। बड़े वकीलों को फीस देने के नाम पर सरकारी खजाने को भारी नुकसान होने के साथ इससे आम लोगों के मुकदमों की सुनवाई और फैसलों में विलंब होता है।

बिहार जैसे पिछड़े राज्य केंद्र सरकार से बजट में विशेष पैकेज की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ बंगलूरू और गुरुग्राम जैसे विकसित शहरों को राज्य सरकारें सियासी जागीर मानते हुए न केवल सांविधानिक व्यवस्था, बल्कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को भी तबाह करने पर उतारू हैं। वर्ष 2011 की जनसंख्या के अनुसार, बंगलूरू की 96 लाख की आबादी में 50 फीसदी दूसरे राज्यों से आए हुए लोग हैं।

भारतीय गणतंत्र में नागरिक सर्वोपरि हैं, जिन्हें पूरे देश में रोजगार और व्यापार की सांविधानिक आजादी है। निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने के नाम पर राज्यों में इंस्पेक्टर राज का बढ़ना उदारीकरण और वैश्विक अर्थव्यवस्था के खिलाफ है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, व्यापार और वाणिज्य को बाधित करने का कानून बनाने की इजाजत किसी भी राज्य को नहीं दी जा सकती। कर्नाटक का यह बिल अगर कानून बन गया, तो टेक इंडस्ट्री और अर्थव्यवस्था की गाड़ी पटरी से उतरने पर विदेशी निवेशकों का भारत की ग्रोथ स्टोरी से भरोसा डगमगा सकता है।

कई राज्यों में अनुसूचित जनजातियों और मूल निवासियों के आरक्षण के लिए संविधान में प्रावधान है। वर्ष 1957 में बनाए गए सार्वजनिक रोजगार (निवास के संबंध में आवश्यकता) अधिनियम के अनुसार, क्षेत्र के आधार पर नौकरियों में भेदभाव नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1994 के फैसले में राज्यों में माटी पुत्रों के आरक्षण को संविधान के अनुच्छेद 16 (2) के खिलाफ बताया था। इसलिए निवास और भाषा के आधार पर आरक्षण का कोई भी कानून अदालत से निरस्त हो जाएगा। देश में साम्राज्यवादी कानूनों से मुक्ति का अभियान चल रहा है। दूसरी तरफ, रोजगार और गर्वर्नेंस बढ़ाने में विफल सरकारें क्षेत्र, जाति, भाषा और धर्म के आधार पर आरक्षण के झुनझुने से 'बांटो और राज करो' की ब्रिटिश तरकीब का बेशर्मी से इस्तेमाल कर रही हैं। विपक्ष के नेता राहुल गांधी संविधान, न्याय और भारत जोड़ने की बात कर रहे हैं, तो फिर उन्हीं की पार्टी की सरकार सांविधानिक व्यवस्था के बगैर निजी क्षेत्र में आरक्षण कैसे लागू कर सकती है?
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