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यशोगान सुनकर द्रवित हुईं कैकेयी
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 31 May 2013 08:52 PM IST
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भगवान श्रीराम को माता कैकेयी के दुराग्रह के कारण ही पिता दशरथ के आदेश पर वन जाना पड़ा था। कैकेयी के आचरण से आहत भरत जी ने अपनी मां के प्रति अनेक बार दुर्वचनों का प्रयोग किया, किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने एक पल के लिए भी कैकेयी के प्रति मन में दुर्भावना नहीं आने दी।
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श्रीराम वनवास पूरी कर अयोध्या लौटे, तो कैकेयी को आशंका थी कि श्रीराम उनकी उपेक्षा कर नाराजगी प्रकट करेंगे, किंतु श्रीराम सबसे पहले मां कैकेयी के महल में पहुंचे। उन्होंने चरण स्पर्श करने के बाद कहा, माता, मैं आपका बहुत आभारी हूं।
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यदि आप वन में न भेजतीं, तो प्रजा को यह पता ही नहीं चलता कि हमारे पिता कितने पुत्र स्नेही थे। हम चारों भाई पिता के कैसे आज्ञापालक हैं और भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न कैसे मेरे आज्ञापालक आदर्श बंधु हैं।
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अगर मुझे वन न भेजा जाता, तो मेरी भेंट हनुमान जी जैसे सर्वगुण संपन्न भक्त से कदापि न हो पाती। मैं सुग्रीव जैसे सखा से नहीं मिल पाता और विभीषण जैसा सत्यनिष्ठ व धर्मपरायण सहयोगी कैसे पाता। फिर सीता की सेवा व सहयोग भावना को भी मैं प्रत्यक्ष कैसे देख पाता।
श्रीराम ने आगे कहा, माता, आपने अपने ऊपर कलंक लेकर मुझे पग-पग पर लाभान्वित किया। आप परम धन्य हैं, यशस्विनी हैं। श्रीराम के मुख से अपना यशोगान सुनकर कैकेयी की आंखों से अश्रु टपक पड़े।