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इतिहास में ज्योति बसु
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पश्चिम बंगाल के अस्थिर और हिंसक माहौल में ज्योति बसु ने जिस तरह धैर्यपूर्ण लंबी राजनीतिक पारी खेली, वह ज्यादातर भारतीयों के लिए रहस्य ही था। अपने देश में कम्युनिस्ट आंदोलन तीन तरह से फैला-एक तो इसमें कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य थे, जो अपनी वाम विचारधारा के कारण जाने जाते थे।
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ई.एम.एस नंबूदिरीपाद और सरोज मुखर्जी इस धारा से थे। दूसरी धारा मुख्यतः बंगाल में विकसित हुई थी, जिसमें क्रांतिकारी संगठनों को त्याग देने वालों ने वाम वैचारिकता अपना ली। 1946 के चुनाव में कम्युनिस्टों को तीन सीटें मिली थीं, जिनमें से दो इसी धारा से थे। ऐसे में, ज्योति बसु ने तीसरी सीट जीतकर न सिर्फ सनसनी फैलाई, बल्कि बत्तीस की उम्र में विधानसभा में पार्टी नेता बनकर भी उन्होंने अपना महत्व जताया था। कम्युनिस्टों की तीसरी धारा में वे लोग थे, जो ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के संसर्ग में आकर वामपंथी बने।
आजादी के बाद पश्चिम बंगाल की स्थिति दूसरे राज्यों की तुलना में दयनीय थी। 1942 के अकाल में वहां लगभग साठ लाख लोग मर गए थे। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापानी हमले के भय से अनेक लोग राज्य से बाहर भाग गए थे। फिर विभाजन ने राज्य को ऐसा सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक झटका दिया, जिससे वह अब तक उबर नहीं पाया है। बांग्लादेश से शरणार्थियों के लगातार आगमन ने राज्य में वंचितों का एक विशाल वर्ग तैयार किया, जिस कारण वहां कम्युनिस्ट राजनीति लगातार प्रासंगिक बनी रही। शहरी इलाकों में उसका एक बड़ा जनाधार बन गया था। खाद्य संकट और बेरोजगारी को माकपा ने भुनाया और अपनी वक्तृत्व कला के कारण ज्योति बसु घर-घर में पहचाने जाने लगे।
1957 में वह विधानसभा में नेता विपक्ष बने और कम्युनिस्ट पार्टी जब अप्रत्याशित रूप से दोफाड़ हुई, तब उन्होंने माकपा में जाने का फैसला लिया। अंग्रेजी भाषा पर पकड़ और संसदीय राजनीति के ज्ञान के मामले में माकपा में दूसरा कोई नेता उनके आसपास नहीं था। तुलनात्मक रूप से बांग्ला भाषा में उनकी पैठ कम थी। 1967 के चुनाव में कांग्रेस-विरोध की लहर चली, तो पश्चिम बंगाल में अजय मुखर्जी के नेतृत्व में गैरकांग्रेसी सरकार बनी और ज्योति बसु उपमुख्यमंत्री बने।
चूंकि माकपा ने आपातकाल का विरोध किया था, इसलिए सिद्धार्थ शंकर राय की कांग्रेस सरकार ने ज्यादातर माकपाइयों को जेलों में ठूंस दिया। पर आपातकाल के बाद हुए चुनाव में वाम मोर्चे को न सिर्फ जीत मिली, बल्कि माकपा अकेले दम पर सरकार बनाने की स्थिति में थी। इसमें प्रमोद दासगुप्त का खास योगदान था। ज्योति बसु के लंबे मुख्यमंत्री काल का दौर यहीं से शुरू हुआ। शुरुआत में वाम मोर्चे ने ऑपरेशन बर्गा के तहत भूमि सुधार का व्यापक कार्यक्रम शुरू किया, जिसका श्रेय बिनय चौधुरी को जाता है। नतीजतन ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस का जनाधार खत्म हो गया। बिजली उत्पादन के क्षेत्र में भी वाम मोर्चा सरकार का कामकाज सराहनीय था।
1978 में आई भीषण बाढ़ का ज्योति बसु सरकार ने इतनी अच्छी तरह मुकाबला किया कि बाढ़ के बाद विस्थापित सभी लोग घर लौटने में सक्षम हुए। पर प्रमोद दासगुप्त की मौत के बाद ज्योति बसु को पार्टी में चुनौती देने वाला कोई नहीं रहा, और यहीं से वाम मोर्चे की निरंकुशता का दौर शुरू हुआ। ज्योति बसु ने संयुक्त उपक्रम लगाकर राज्य की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की कोशिश की थी, पर अंदरूनी विरोध के कारण वैसा नहीं हो पाया। आर्थिक उदारीकरण के बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल के लिए नई औद्योगिक नीति बनाई थी, जिसमें विदेशी पूंजी का स्वागत किया गया था, लेकिन राज्य में पूंजी निवेश के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। 1995 में उनके सामने प्रधानमंत्री बनने का अवसर था, लेकिन वह इस पर कुछ बोलते, इससे पहले माकपा ने उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। हताश ज्योति बसु ने उसे पार्टी की ऐतिहासिक भूल बताया।
ज्योति बसु ने अपने नेतृत्व में पश्चिम बंगाल को तीन दशक तक राजनीतिक स्थिरता दी। पर उस लंबे कार्यकाल को गंवा दिए गए मौके के तौर पर ही जाना जाएगा, क्योंकि उस दौरान ढांचागत विकास, उद्योग-धंधे और शिक्षा के क्षेत्र में अवनति ही दिखी। स्वास्थ्य मोर्चे पर हताशा, शिक्षा के क्षेत्र में अंग्रेजी को हटाने की गलती और उच्च शिक्षा में उदासीनता तो देखी ही गई, कोलकाता को छोड़कर किसी और दूसरे शहर को खड़ा करने की चेष्टा भी नहीं की गई।
विडंबना ही है कि जो व्यक्ति सुखद बदलाव की पटकथा लिख सकता था, उसने यथास्थिति बनाए रखने को ही अपना कर्तव्य मान लिया। बसु मान बैठे थे कि जब तक विपक्ष बंटा रहेगा, तब तक लाल दुर्ग में दरार नहीं पड़ेगी। पर जीवन के आखिरी दिनों में वह संयुक्त विपक्ष को उभरते देख रहे थे। वाम मोर्चे का यह हश्र इसलिए हुआ कि उसमें बदलाव की इच्छा भीतर से पैदा नहीं हो पाई। दूसरे, जब भी कोई प्रत्याशी हारता, तो वह अपनी गलती ढूंढने के बजाय मतदाताओं को भाषण पिलाता था कि उसने उसके प्रत्याशी को हराकर गलती की है।
कम्युनिस्ट नेताओं की गलती, अत्याचार, यहां तक कि भ्रष्टाचार के आरोपों की भी पड़ताल नहीं की जाती थी। बसु के बेटे पर त्रिपुरा के मुख्यमंत्री नृपेन चक्रवर्ती ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था, लेकिन जांच के बजाय केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हंे ही ठिकाने लगा दिया। अपने कद्दावर व्यक्तित्व के अनुरूप ज्योति बसु ने अगर सक्रियता दिखाई होती, तो उनका इतिहास अलग तरह से लिखा जाता।