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बोफोर्स से अलग है यह घोटाला

Mon, 18 Feb 2013 11:42 PM IST
बी रमन
बी रमन Updated Mon, 18 Feb 2013 11:42 PM IST
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italian chopper deal scam is different from bofors scam

वायुसेना के लिए अतिविशिष्ट लोगों को सेवाएं देने के लिए 12 अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टरों के सौदे को अनुमति दी गई थी, ताकि उनका उपयोग स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) की सुरक्षा प्राप्त लोगों और बगैर ऐसी सुरक्षा वाले अतिविशिष्ट लोगों की यात्राओं में हो सके। इसमें वायुसेना उपलब्ध बेहतरीन हेलीकॉप्टरों की खरीद, उनके रख-रखाव और चालक दल की व्यवस्था करने के लिए जिम्मेदार थी।

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वहीं एसपीजी की यह जिम्मेदारी थी कि वह खरीद से पहले हेलीकॉप्टरों के लिए जरूरी न्यूनतम सुरक्षा और आरामदेह यात्रा संबंधी जरूरतों के संदर्भ में वायुसेना का मार्गदर्शन करे। यह सुनने में आ रहा है कि तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दिवंगत ब्रजेश मिश्रा ने यह उल्लेख किया था कि हेलीकॉप्टरों की न्यूनतम जरूरतों के बारे में एसपीजी की सलाह पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया था। उनका यह कहना बिल्कुल सही था। इसलिए यह कहना बेतुका होगा कि उनका यह कदम 2010 में हुई अंतिम खरीद से जुड़ी धांधलियों का प्रारंभ बिंदु था।
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हालिया हेलीकॉप्टर घोटाले ने 1980 के दशक के बोफोर्स घोटाले की याद ताजा कर दी, जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे। 1987 में जब पहली बार बोफोर्स घोटाले के ब्योरे सामने आए, तब यह जाहिर हुआ कि राजीव गांधी से निकटता रखने वाले भारतीय और यूरोपीय लोगों के एक छोटे से समूह को इस खरीद ठेके से फायदा पहुंचा था।
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सच से पर्दा हटाने के बजाय राजीव गांधी की सरकार ने उसे छिपाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। सीबीआई और संयुक्त संसदीय समिति की जांच के बहाने दरअसल, सरकार ने अवैधता को ढकने की ही कोशिश की।

यह मानना पड़ेगा कि सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी ऐसे गैर-कानूनी सौदों के पीछे का सच सामने आ ही जाता है। और इसकी वजह है प्रिंट मीडिया के प्रतिभाशाली पत्रकारों द्वारा की गई कुछ स्वतंत्र पड़तालें। लेकिन इसके बावजूद ऐसे कामों में लिप्त रहने वाले लोग सरकार की मिलीभगत के चलते कानून के शिकंजे से बचते आए हैं।  

राजीव गांधी के कार्यकाल में सीबीआई को तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा। इसकी वजह यह थी कि वह एक छानबीन करने वाली एजेंसी होने के बजाय सरकार की गलतियों पर पर्दा डालने की भूमिका निभा रही थी। यह वह समय था, जब सीबीआई सरकार के हाथों की कठपुतली मानी जाने लगी थी।

हालांकि बोफोर्स सौदे से जुड़े व्यापक भ्रष्टाचार के बावजूद सेना के बोफोर्स तोपों को प्राप्त करने के फैसले पर उंगली नहीं उठाई जा सकती, क्योंकि इन्हीं तोपों ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार भगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह ध्यान में रखना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि वेस्टलैंड हेलीकॉप्टरों के लिए हुए समझौते को भी रद्द करने की जबर्दस्त मांगें हो रही हैं।

इस मामले में हमें पहले प्राप्त हो चुके तीन हेलीकॉप्टरों के निष्पादन और अतिविशिष्ट व्यक्तियों को सुरक्षा देने के लिए इनकी उपयुक्तता के मद्देनजर एक ऐसा निर्णय लेना चाहिए जो व्यावसायिक हो, न कि केवल अपने अहं को तुष्ट करने वाला। चूंकि पहले से ही खरीद की प्रक्रिया को टलते हुए एक दशक से ज्यादा बीत चुका है, सौदे के रद्द होने की वजह से इसका और ज्यादा टलना मुनासिब नहीं होगा।
 
इसी के साथ, सार्वजनिक और राजनीतिक मत को यह पुख्ता करना होगा कि सच को छिपाने में सीबीआई का जैसा इस्तमाल बोफोर्स मामले में हुआ, वैसा यहां न हो। इस मामले में अन्ना हजारे के ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ और अरविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी’ के साथ हमारे मीडिया तंत्र को भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

अपनी जांच को लेकर जब तक सीबीआई सरकार के नियंत्रण में काम करती है, उससे किसी प्रकार की उम्मीद रखना बेमानी होगा। हेलीकॉप्टर घोटाले की जांच कर रही सीबीआई टीम को दिन-प्रतिदिन के मामलों के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित की गई विधि विशेषज्ञों की विशेष टीम के अधीन करना चाहिए, ताकि वह निष्पक्ष तरीके से जांच कर सके।

बोफोर्स घोटाले में सीबीआई की टीम को जिस संयुक्त संसदीय समिति के अधीन रखा गया था, उसके ज्यादातर सदस्य कांग्रेस के ही थे। और यही वजह थी कि सीबीआई अपेक्षित भूमिका नहीं निभा पाई।

हेलीकॉप्टर सौदा घोटाले में तीन तरह के लोगों के समूह शामिल लगते हैं। इनमें से पहले हैं, कुछ भारतीय नागरिक, जिनमें एक पूर्व वायुसेनाध्यक्ष के संबंधियों के नाम सामने आए हैं। संभव है कि कुछ और लोग भी इसमें जुड़े हों। बोफोर्स कांड में देश में और देश से बाहर रहने वाले जिन भारतीयों का नाम आया, वे मुकदमेबाजी से बचे रहे, क्योंकि उनके सिर पर तत्कालीन सरकार का हाथ था। यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हालिया घोटाले में ऐसा न हो सके।

अन्य दो तरह के समूह यूरोप के हैं, जिन्होंने घोटाले में मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इटली की कंपनी फिनमेकानिका के वरिष्ठ अधिकारी भी इसमें शामिल हैं। इनकी सच्चाई को सामने लाने में सीबीआई की कामयाबी इटली, स्विट्जरलैंड और अन्य यूरोपीय सरकारों के सहयोग पर निर्भर करेगी। इसलिए यहां भारत का कूटनीतिक दबाव निर्णायक साबित होगा।


बोफोर्स घोटाले में स्विट्जरलैंड और स्वीडन की सरकारें सहयोग देने को तैयार थीं, लेकिन राजीव गांधी की तत्कालीन सरकार सच को सामने लाने से हिचक रही थी। लिहाजा हालिया मामले में सार्वजनिक और राजनीतिक मत को यह सुनिश्चित करना होगा कि वर्तमान सरकार ऐसा न कर सके।

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