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बाजार: उनका क्या, जो इमोशन भी पहुंचाते हैं... लेकिन हमारे दर से बगैर करुणा जाते हैं

Wed, 21 Jan 2026 07:03 AM IST
लव गौर नन्दितेश निलयस स्पीकर, लेखक एवं एथिक्स प्रशिक्षक
नन्दितेश निलयस स्पीकर, लेखक एवं एथिक्स प्रशिक्षक Published by: लव गौर Updated Wed, 21 Jan 2026 07:03 AM IST
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सार
हम सभी को सब कुछ तुरंत चाहिए और कंपनियों के लिए तो दस मिनट की डिलीवरी और पांच सितारा रेटिंग व्यापार करने का अवसर है। ऐसे में, क्या इन सबके पीछे रोजाना रोजी-रोटी के सर्कस में मोटरसाइकिल पर करतब दिखाते भारत के गिग वर्कर्स के प्रति सहानुभूति दिखाना हमारा नैतिक कर्तव्य नहीं है?
 
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Is not it our moral duty to show empathy towards gig workers
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

आइए इस लेख की शुरुआत पहले एक प्रश्न से करते हैं! और वह यह कि हम तबाही के बाद ही कार्रवाई क्यों करते हैं? हम किसी आपदा के बाद ही प्रतिक्रिया क्यों देते हैं? जब समस्याएं गंभीर और गहरी हो जाती हैं, तभी उनमें क्यों झांकते हैं? लापरवाही या दूसरे कारणों से किसी की मौत क्यों होती है; और फिर उसके बाद ही हंगामा क्यों होता है? एक आम आदमी की जिंदगी का क्या? अगर लोकतंत्र आम लोगों के लिए है, तो यह शक्तिशाली का ही साथ क्यों देता है?


अब गिग वर्कर्स की समस्याएं ही ले लीजिए। भारत के गिग वर्कर्स को प्रतिदिन गति व समयसीमा के बिजनेस मॉडल को सफल बनाने के लिए रोजी-रोटी के सर्कस में मोटरसाइकिल पर करतब दिखाना पड़ता है। ग्राहकों की संतुष्टि और फाइव स्टार की रेटिंग तो उनके कार्य और प्रचार का अहम हिस्सा हैं ही, लेकिन उनके कार्य के जोखिम, कम और अनिश्चित सैलरी, लंबे घंटे काम करना, स्वास्थ्य समस्याएं, सामाजिक सुरक्षा की कमी, नौकरी की असुरक्षा आदि का क्या? इससे उन्हें आर्थिक-मानसिक तनाव, शारीरिक बीमारियों और शोषण का सामना करना पड़ता है, जिसके कारण हाल ही में बड़े पैमाने पर हड़तालें हुई हैं, जिनमें उचित सैलरी, बेहतर सुरक्षा और सम्मान व अच्छी चिकित्सा सेवा की मांग की गई है। जब तक उन लोगों ने एक आवाज में अपनी समस्या नहीं उठाई, किसी को यह यकीन नहीं हुआ कि दस मिनट में आता हुआ सामान या आधे घंटे में पहुंचता पिज्जा किसी व्यक्ति के लिए जीवन-मरण का विषय भी हो सकता है। सब को सब कुछ तुरंत चाहिए और कंपनियों के लिए तो यह समयसीमा यूएसपी बनी और एक व्यापार करने का अवसर भी। लेकिन बाइक पर भागते उन लाखों व्यक्तियों के लिए नौकरी के साथ हर पल का जोखिम बना रहा, खासकर जब सड़क दुर्घटनाएं आम होती जा रही हैं।


पर दिल्ली को सुध कहां? आदत-सी बन गई है कि पहले कोई दुर्घटना होगी, फिर समाधान का प्रयास करेंगे। हम कार्रवाई करते हैं, पर सिर्फ संकट के समय। एक समाज के लिए जीने के मूल्य के तौर पर सहानुभूति, करुणा और देखभाल का क्या? सहानुभूति इतनी चुनिंदा क्यों है, सामूहिक मूल्य क्यों नहीं? एलन मस्क ने जोर देकर कहा है, ‘मेरा मानना है कि हमें इन्सानियत और आने वाले भविष्य की सच में परवाह करनी चाहिए। लेकिन इसके लिए सतही नहीं, बल्कि दिल से और गहरी सहानुभूति जरूरी है।’ पर सवाल यह है कि सहानुभूति आती कहां से है? कोविड के बाद से, इन्सान ज्यादा कमजोर और चिंतित लग रहा है और सहानुभूति के लिए एक अच्छी मानसिकता की जरूरत होती है। अमेरिकी भविष्यवेत्ता जेम्स कैसियो ने अपने लेख फेसिंग द एज ऑफ केओस  में एक नए युग की वकालत की, जिसके लिए उन्होंने एक एक्रोनिम (संक्षिप्त रूप) का इस्तेमाल किया-वह युग, जिसमें इन्सानियत ने कोविड से लड़ने के लिए मास्क पहनकर कदम रखा। वह एक्रोनियम वूका और फिर बानी बना। वूका की अस्थिर दुनिया जब बानी मॉडल को अपनाने आई, तब तक वह बहुत बेचैन और अस्थिर हो चुकी थी। इसलिए उस सहानुभूति व संवेदनशीलता के लिए बानी मॉडल सिर्फ सिस्टम और संस्थानों को नहीं, बल्कि इन्सानी दुनिया को समझने और संबोधित करने की वकालत करता है। बानी की दुनिया मानती है कि इन्सान कमजोर और अधीर हो चला है। वह ऊपर से मजबूत दिखता है, लेकिन अंदर से खोखला होता जा रहा है और एक कमजोर नींव पर टिका है। इसलिए अगर मस्क गहरी सहानुभूति की बात करते हैं, तो वह सही हैं।

हम आज ऐसी जिंदगी जी रहे हैं, जो खरीद-फरोख्त, ब्रांड और दिखावे से बंधी हुई है और इसलिए सहानुभूति खत्म होती जा रही है। ऐसे में, कोई अपने पिज्जा व बर्गर की ओर देखेगा या उस युवक की ओर, जो आधे घंटे में सब कुछ हमारे दरवाजे पर लाकर हमें देता है। इस तरह की उपभोक्तावादी और तनाव भरी जिंदगी धीरे-धीरे प्रदूषण की तरह फैल रही है और इन्सान अपने दुख व समस्याओं को संभालने की ताकत खोता जा रहा है। नतीजा यह है कि लोग सोच-समझकर फैसले लेने के बजाय जल्दबाजी में निर्णय लेने लगे हैं। हम ज्यादा आत्मकेंद्रित व उदासीन होते जा रहे हैं और अपनी समस्याओं से परेशान हैं। जब तक समस्या हमारे दरवाजे पर दस्तक नहीं देती, तब तक अलग तथा दूर रहने की प्रवृत्ति से हम सभी घिरे हैं। इसलिए चाहे सार्वजनिक जीवन हो या घर, इन्सान एक तरह की सूखी और उबाऊ जिंदगी जी रहा है। अगर कोई धमाका होता है या पुल गिरता है, या इन्सानी गलती से हादसों और अस्पतालों में लोग मरते हैं, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। हां, जब कोई खास व्यक्ति उनमें होता है या मृतकों की संख्या ज्यादा होती है, तब सिस्टम की आंखें खुलती हैं।

जेम्स कैसियो इसे एक समझ से बाहर की स्थिति कहते हैं-एक ऐसी स्थिति, जहां दुनिया का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति कमजोर, बेचैन, अनिर्णायक और हैरान हो रहा है। तो क्या किया जाना चाहिए? क्या हमें उस सहानुभूति और लचीलेपन की ओर लौटना चाहिए, जो न केवल अपने, बल्कि सभी के जीवन को शामिल करता है, जहां इन्सानियत ज्यादा मानवीय बनती है, और जो यह दिखाता है कि जीवन का असली मूल्य इन्सानियत के सार्वभौमिक विकास में है? ऐसी सहानुभूति और लचीलापन जिसने जापान को बमों के बजाय खुशी, नैतिकता और तकनीक चुनने का कारण दिया। जैसा कि सही ही देखा गया है कि इस दुनिया की नाजुक और अस्थिर स्थितियों में, किसी व्यक्ति की चिंता और निष्क्रियता की स्थिति को सहानुभूति, करुणा और सतर्कता से नरम किया जा सकता है, न केवल दूसरों के प्रति, बल्कि खुद के प्रति भी। गिग वर्कर्स के साथ-साथ उस हर मुश्किल में पड़े व्यक्ति को संस्थागत संवेदनशीलता की जरूरत है और जुलूस, विरोध या दुर्घटना के बाद ही उस समस्या पर कार्रवाई न की जाए। संसदीय लोकतंत्र के मूल में लोक का दुख-दर्द समाहित होता है। संवेदनशीलता के साथ-साथ हर उद्योगपति या अन्य संस्थानों को यह समझना चाहिए कि उनके कर्मचारी सैलरी पाने से इन्सानी सुख-दुख से दूर नहीं हो जाते।

हर नया साल, त्योहारी सीजन, जन्मदिन, और अन्य उत्सवों के दिन, ब्लिंकिट, जेप्टो, जोमैटो, डोमिनोज, केएफसी, पिज्जाहट के बिना जश्न नहीं हो पाते। उन गिग वर्कर्स के लिए बस उनके कस्टमर की रेटिंग ही मानो जश्न के दिन होते हैं। पर ऐसा नहीं है। अगर हम और आप उन्हें समानुभूति से समझें, तो उनको एक गिलास पानी तो पूछ ही सकते हैं। एक चॉकलेट के साथ उनको हैप्पी न्यू ईयर तो कह ही सकते हैं। अगर हमारे अंदर अब भी कुछ इन्सानियत बची है, तो फिर हम बार-बार उस समानुभूति को समझने में चूकते क्यों हैं?                edit@amarujala.com
 
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