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लालू की राह पर ममता!

Tue, 23 Sep 2014 07:18 PM IST
subrat mukherjee सुब्रत मुखर्जी
Updated Tue, 23 Sep 2014 07:18 PM IST
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Is Mamata on the way of Lalu!

पश्चिम बंगाल की विद्रोही तेवर वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 1970 के दशक में उस वक्त चर्चा में आई थीं, जब उन्होंने युवक कांग्रेस की कार्यकर्ता रहते जेपी के आंदोलन का विरोध किया था। मगर उन्हें असली ख्याति मिली 1984 में, जब उन्होंने हिंदू महासभा के नेता एन सी चटर्जी के बेटे और वकील सोमनाथ चटर्जी को जाधवपुर क्षेत्र से लोकसभा चुनाव में पराजित किया था। लोग कह रहे थे कि कैसे एक विशाल बंगले में रहने वाले एक कम्युनिस्ट सोमनाथ चटर्जी को स्लम में रहने वाली 'बुर्जुआ' ममता चुनौती दे रही है। चटर्जी के पास कारों का काफिला था, नौकर-चाकर थे यहां तक कि कई पालतू कुत्ते भी। दूसरी ओर ममता को मोहल्ले के सार्वजनिक नल से पानी लाना पड़ता था।


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ममता की यह छवि उनके आगामी राजनीतिक जीवन में भी बनी रही। उस वक्त भी, जब यूपीए के पहले कार्यकाल में वह लोकसभा में अपनी पार्टी की एकमात्र प्रतिनिधि थीं। 2011 में उन्होंने जब अपने दम पर माकपा को पश्चिम बंगाल की सत्ता से बेदखल किया था, तो पूरे देश में उन्हें जुझारू नेता के रूप में देखा गया। अपने चार दशक लंबे राजनीतिक करियर में उनकी सादगी और ईमानदारी ही उनकी पूंजी बनी रही है। एक तरह की बेफिक्री और एकला चलो रे के उनके अंदाज ने उनकी शख्सियत को गढ़ा है।

मगर, जब से शारदा चिटफंड घोटाले में उनकी तृणमूल कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं के नाम सामने आए हैं, तब से उनकी कथित भूमिका को लेकर संदेह के बादल मंडरा रहे हैं। बात यहां तक आ गई है कि पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अधीर चौधरी ने उनका इस्तीफा तक मांगा है। तृणमूल कांग्रेस के सचिव मुकुल रॉय ने खुद को ममता से दूर कर लिया है।

शारदा घोटाला जब सामने आया था, तब ममता ने विरोधाभासी प्रतिक्रिया दी थी। एक ओर तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से जोर देकर कहा था कि वह और उनका कोई भी विश्वस्त या कोई मंत्री इसमें शामिल नहीं है। उन्होंने बौखला कर कहा था कि वह या उनके परिवहन मंत्री मदन मित्रा चोर नहीं हैं! दूसरी ओर उन्होंने अपनी ओर से भरसक कोशिश की कि इस घोटाले की जांच का जिम्मा सीबीआई को न दिया जाए। जबकि विपक्ष में रहते वह ऐसे किसी भी मामले की सीबीआई जांच की पुरजोर मांग करती रही हैं। उनका यह रवैया इस घोटाले की जद में आए त्रिपुरा, असम और ओडिशा के मुख्यमंत्रियों से बिल्कुल उलट है, जिन्होंने बिना झिझक सीबीआई जांच की मंजूरी दी। ममता ने न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग कर इस जांच को रोकने की, बल्कि विशेष जांच समिति गठित कर और प्रत्येक प्रभावित को 10,000 रुपये तक का भुगतान कर पूरे मामले को ही निपटाने की कोशिश की।

ममता ने शुरू में तो शारदा घोटाले के मुख्य आरोपी सुदीप्तो सेन को जानने से ही इन्कार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि उनका नाम उन्होंने पहली बार 14 अप्रैल, 2013 को बांग्ला नववर्ष के मौके पर हुए एक कार्यक्रम में सुना था। लेकिन अब इस बात के दस्तावेजी प्रमाण सामने आ चुके हैं कि 2011 में सेन से उनकी मुलाकात हुई थी। यही नहीं, युनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया के प्रबंध निदेशक ने अक्तूबर, 2012 में ही उनके वित्त मंत्री को इस घोटाले के बारे में आगाह किया था। बैंक के प्रबंध निदेशक ने उन्हें न केवल ग्रामीण इलाके में शारदा चिटफंड की फैलती गतिविधियों के बारे में बताया था, बल्कि उन्हें इससे भी अवगत कराया था कि किस तरह केंद्र सरकार की छोटी बचत योजनाओं में निवेश कम हो रहा है।

इन आरोपों के अलावा अब सीबीआई जांच से खुलासा हुआ है कि ममता बनर्जी जब रेल मंत्री थीं, तब पांच वर्ष के अपरिहार्य अनुभव और टेंडर के बिना शारदा को एक आकर्षक ठेका दिया गया था। यदि यह सच है तो यह उनके लिए ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। जाहिर है, सीबीआई जांच उन्हें लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव और मायावती की कतार में ला खड़ा करेगी।

यदि अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक दिग्गजों से तुलना करें, तो वही ऐसी नेता थीं, जिन तक सीबीआई जांच की आंच नहीं पहुंची थी। अब ऐसा लगता है कि सर्वोच्च अदालत के आदेश और उसकी निगरानी में हो रही सीबीआई जांच से उनकी छवि दागदार हो जाएगी और उन्हें लालू, मुलायम, मायावती, जयललिता, करुणानिधि, शिबू सोरेन, अजित सिंह और ओम प्रकाश चौटाला के साथ खड़ा कर दिया जाएगा। यह सब जानते हैं कि कैसे नरसिंह राव की अल्पमत सरकार झारखंड घूसकांड और जैन हवाला मामले का सुनियोजित तरीके से इस्तेमाल कर सत्ता में बनी रही। अतीत में देखा गया है कि कैसे सीबीआई जांच के भय से अनेक नेता संसद में सत्तारूढ़ दल को असहज स्थिति में डालने से बचते रहे हैं। यह अजीब लगता है कि कैसे पिछली यूपीए-दो सरकार के समय उत्तर प्रदेश की दो परस्पर विरोधी पार्टियां सरकार को समर्थन दे रही थीं। जयललिता ने श्रीलंका के तमिलों के लिए आंसू बहाने और प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने के अलावा कुछ खास नहीं किया। तमिलनाडु का मुख्यमंत्री रहते करुणानिधि भी यही करते थे।

ममता की स्थिति इन सबसे अलग है। लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने सारी सीमाएं लांघकर कहा था कि यदि नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में घुसने की कोशिश की, तो वह उन्हें जेल भिजवा देंगी, बावजूद इसके कि वह यह जानती थीं कि वह ऐसा नहीं कर सकतीं। शारदा घोटाले के सामने आने के बाद उनका राजनीतिक भविष्य अधर में है। कई लोग सोचते हैं कि उनकी नियति लालू प्रसाद जैसी हो सकती है, जिन्हें चारा घोटाला में संलिप्त होने के कारण चुनावी राजनीति तक से बाहर होना पड़ गया।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक हैं)

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