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क्या गुलाम नबी आजाद भाजपा में जाने के लिए तैयार हैं?

Tue, 09 Mar 2021 04:24 AM IST
नीरजा चौधरी नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Published by: नीरजा चौधरी Updated Tue, 09 Mar 2021 04:24 AM IST
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Is Ghulam Nabi Azad ready to join BJP?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद - फोटो : PTI

जब संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुलाम नबी आजाद के बारे में बोलते हुए भावुक हो गए, तब कई लोग हैरान हो गए थे। प्रधानमंत्री राज्यसभा में आजाद का कार्यकाल खत्म होने के अवसर पर बोल रहे थे। राजनीति के घाघ खिलाड़ी आजाद ने भी भावनात्मक रूप से इसका जवाब दिया। विगत 27 फरवरी को कांग्रेस के असंतुष्ट समूह (जिसे जी-23 कहा जाता है) के छह अन्य सदस्यों के साथ आजाद ने एक स्थानीय स्वयंसेवी संगठन के आमंत्रण पर जम्मू में एक बैठक की। उन्होंने कांग्रेस के कमजोर पड़ने पर एक बार फिर से ध्यान केंद्रित किया, जो निरंतर जारी है। अगले दिन एक कदम और आगे बढ़ते हुए आजाद ने मोदी की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि कुछ दूसरे लोगों के विपरीत मोदी ने कभी अपनी असलियत नहीं छिपाई और उन्होंने चाय बेचने व बर्तन साफ करने से अपनी विनम्र शुरुआत की।


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आजाद की प्रशंसा में जो मोदी ने जो कहा था, उसका मतलब स्पष्ट था। वह न केवल कांग्रेस की परेशानी का फायदा उठा रहे थे, बल्कि देश की सबसे पुरानी पार्टी को बता रहे थे कि भले ही हम विरोधी हैं, लेकिन आप अपने नेता की जितनी प्रशंसा करते हैं, उससे ज्यादा हम उनकी कद्र करते हैं। साफ है कि गुलाम नबी आजाद जी-23 के नेता बनकर उभरे हैं। जम्मू की बैठक ने भी इसे रेखांकित किया है। वह वरिष्ठतम नेता हैं और संजय गांधी के उभार के दिनों में उन्होंने युवा कांग्रेस से अपनी सियासी पारी की शुरुआत की थी। बाद में केंद्र में मंत्री बनने के अलावा वह जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री भी बने। कमलनाथ के साथ वह शायद आज कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में हैं। मोदी ने तुरंत ही स्वतंत्रता के 75वें वर्ष के समारोह का पर्यवेक्षण करने वाली समिति में उन्हें रख लिया, मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी समेत विभिन्न क्षेत्रों के 250 से ज्यादा लोग इस समिति में शामिल हैं।

क्या गुलाम नबी आजाद भाजपा में जाने के लिए तैयार हैं? कांग्रेस ने उन्हें फिर से राज्यसभा में नहीं भेजा, जबकि कयास लगाए जा रहे थे कि पार्टी उन्हें केरल से उच्च सदन में ले आएगी। लेकिन पार्टी ने पहले ही राज्यसभा में आजाद की जगह मल्लिकार्जुन खड़गे को नेता विपक्ष नियुक्त कर दिया। आजाद हालांकि जम्मू में पार्टी कार्यकर्ताओं को बता चुके हैं कि भाजपा में जाने या पार्टी छोड़ने का उनका कोई इरादा नहीं है। निस्संदेह असंतुष्ट गुट पार्टी में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए दबाव की राजनीति करेंगे। आलाकमान ने पहले ही उनमें से कइयों से पिंड छुड़ा लिया है। असंतुष्टों के मुख्य निशाने पर राहुल गांधी हैं। वे पूर्णकालिक पार्टी अध्यक्ष चाहते हैं, जो दिखें भी। 

इसके अलावा वे संगठन में सभी स्तरों पर चुनाव की मांग कर रहे हैं। उन्होंने बिना किसी जवाबदेही के पर्दे के पीछे से राहुल गांधी द्वारा लिए जा रहे फैसलों का विरोध किया है। तकनीकी तौर पर राहुल गांधी मात्र कांग्रेस सांसद हैं, पर व्यवहार पार्टी अध्यक्ष की तरह करते हैं। पिछले दिनों कृषि कानूनों पर लोकसभा में उन्होंने रणनीतिक रूप से राज्यसभा (जहां गुलाम नबी आजाद तब नेता थे) से अलग लाइन ली थी। जाहिर है कि पार्टी में जब चुनाव होंगे, तब राहुल गांधी अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ेंगे। आगामी 15 से 30 मई के बीच कभी भी चुनाव हो सकता है।

आजाद और उनकी टीम ने विधानसभा चुनाव की शुरुआत में फिर से विवाद छेड़ दिया। अगर कांग्रेस केरल, असम, पुडुचेरी, प. बंगाल और तमिलनाडु में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती, जहां उसके मामूली प्रदर्शन की ही उम्मीद है, तो फिर राहुल के नेतृत्व पर सवाल उठेंगे। अध्यक्ष पद पर राहुल का चुनाव निर्विरोध नहीं होगा। ऐसा नहीं है कि जो भी उनके खिलाफ लड़ेगा, वह जीत  जाएगा। पर अगर वह 20 से 30 फीसदी वोट पा लेता है, तो असंतुष्ट गुट राहुल पर लगाम लगाएगा। अध्यक्ष पद के लिए प्रतिस्पर्धा से ही राहुल की स्थिति कमजोर हो जाएगी।  इससे संगठन चुनाव का औचित्य भी साबित होगा। यह देखना शेष है कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रतिनिधियों में से कितने को जी-23 अपने पाले में ला पाएगा। जी-7 में से कुछ (जैसा कि राहुल ने उनका मजाक उड़ाया था) जो जम्मू गए थे, वे अप्रासंगिक नहीं हुए हैं, जैसे भूपिंदर सिंह हुड्डा, जो हरियाणा में पार्टी के एक बड़े हिस्से को नियंत्रित करते हैं। 

मनीष तिवारी कैप्टन अमरिंदर सिंह के करीबी हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में आलाकमान मनीष तिवारी को लोकसभा का टिकट देने के पक्ष में नहीं था, पर कैप्टन ने न केवल उन्हें टिकट दिलवाया, बल्कि आनंदपुर साहिब सीट से उनकी जीत भी सुनिश्चित की। अगर अमरिंदर सिंह राहुल की मदद करते हैं, तो इसके बदले वह कुछ मांगेंगे भी। ऐसा ही मध्य प्रदेश में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के साथ है। इनमें से सभी राज्य के नेताओं और तथाकथित असंतुष्टों के साथ सत्ता का बंटवारा करेंगे। फिलहाल कुछ भी कहना जल्दबाजी है, लेकिन जी-23 फिलहाल स्थिति का अंदाजा लगा रहा है कि यह उसके अनुकूल है या नहीं। गुलाम नबी आजाद के राजनीतिक रुख का एक कारण जम्मू भी हो सकता है। वह डोडा के हैं, जो जम्मू का मुस्लिम बहुल इलाका है। 

अपने बारे में प्रधानमंत्री की भावुक बातों और स्वयं प्रधानमंत्री की प्रशंसा कर उन्होंने हिसाब लगाया होगा कि जम्मू के हिंदू उनके प्रति नरम हो सकते हैं। वैसे भी अपनी उदारवादी छवि का उन्होंने आनंद उठाया है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि आजाद ने अनुच्छेद 370 निरस्त करने के बारे में कम और जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने के बारे में ज्यादा बातें कीं। यह एक ऐसी मांग है, जो जम्मू के हिंदुओं समेत पूरे राज्य में गूंजती है। पश्चिम बंगाल में इंडियन सेक्यूलर फ्रंट के साथ कांग्रेस के गठबंधन की आनंद शर्मा की आलोचना भी एक अलग छवि हासिल करने के लिए की गई। 2021 के भारत में कई कांग्रेसी ऐसी छवि हासिल करने की जरूरत महसूस करते हैं, जो हिंदू विरोधी न हो और जहां धर्मनिरपेक्षता अल्पसंख्यकवाद के बराबर नहीं हो। जी-23 ने अपना अगला निशाना साधने के लिए उचित ही जम्मू को चुना है, जहां आजाद भी अपनी भूमिका तलाश सकते हैं और जहां शीघ्र ही चुनाव होने वाले हैं। 

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