पूर्वोत्तर की पीड़ा की एकमात्र प्रतीक इरोम
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पूर्वोत्तर भारत में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर ऐक्ट (अफ्स्पा) यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के विरोध में इरोम शर्मीला ने सोलह साल से जारी अपने आमरण को अनशन को खत्म करने की घोषणा कर दी है। मगर, अभी यह बहुत साफ नहीं है कि उनकी आगे की रणनीति क्या होगी या फिर उनके इस फैसले के पीछे क्या निहितार्थ हो सकते हैं। वर्ष 2000 में इरोम शर्मीला ने उस वक्त अफ्स्पा के विरोध में अपना संघर्ष शुरू किया, जब एक बस स्टॉप पर असम रायफल्स के जवानों की फायरिंग में एक 62 वर्षीय महिला और और राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार प्राप्त 18 वर्षीय एक लड़के की मौत हो गई थी। ऐसी घटनाएं इस बात का प्रतीक हैं कि पूर्वोत्तर में अफ्स्पा का किस तरह दुरुपयोग किया जाता है। अगर हम अपने ही नागरिकों पर सैन्य बल का प्रयोग करेंगे, तो लोगों का भरोसा कम होगा और यह खाई बढ़ती रहेगी।
पूर्वोत्तर भारत का एक बड़ा हिस्सा अफ्स्पा के दायरे में शामिल है, जहां लोग सेना की बंदूकों के साये में रहने के लिए मजबूर हैं। यह कानून न केवल अमानवीय है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। इसीलिए इरोम ने इसके खिलाफ अपना विरोध शुरू किया। मौजूदा हालात को देखते हुए यही लगता है कि इसे निरस्त किए जाने के आसार कम ही हैं। सवाल यह है कि क्या पूर्वोत्तर में हालात ऐसे ही बने रहेंगे? दरअसल, स्थानीय लोगों की इस ऐक्ट के खिलाफ जो भावना है, इरोम ने उसे बड़ी मजबूती से उसे प्रतिफलित किया था। अफ्स्पा के प्रभाव को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर पहुंचाने में उनकी भूमिका अहम रही है। उनके अनशन का ही नतीजा है कि देशभर में अफ्स्पा को लेकर एक बहस शुरू हुई। यहां तक कि यूरोपियन कमीशन ने भी केंदर सरकार को इसे रद्द करने के लिए कहा। इरोम ने इस कानून के खिलाफ लंबा संघर्ष किया, इसके बावजूद जमीनी स्तर पर जो बदलाव होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। ऐक्ट में संशोधन तो नहीं हुआ, पर उनके इस एकल आंदोलन के कारण सरकार और सैन्य बलों की प्रतिक्रिया में नियंत्रण जरूर हुआ है।
बहुत से लोग इरोम के इस फैसले से हैरान होंगे। मगर, उन्होंने एक महिला होने के बावजूद अहिंसात्मक तरीके से जो उपलब्धि हासिल की है, वह शायद कई आंदोलन मिलकर प्राप्त नहीं कर सकते। उनकी भी अपनी जिंदगी है। अब अगर वह शादी करना चाहती हैं, परिवार चाहती हैं, तो यह उनका निजी फैसला है। उन पर ही सब थोप देना सही नहीं है। यह अलोकतांत्रिक भी है। अब वह राजनीति में आकर अफ्स्पा के विरोध में संघर्ष जारी रखेंगी। ऐसे में लोगों ने कयास लगाना शुरू कर दिया है कि इरोम आखिर कौन सी पार्टी का दाम थाम सकती हैं! फिलहाल तो यही लगता है कि वह स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेंगी। कयास इस बात के भी लगाए जा रहे हैं कि क्या सरकार के साथ उनका कोई समझौता हुआ है? फिलहाल इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। पर, इतना तो मानना ही होगा कि राजनीति में आने के बाद आंदोलनों की धार कुंद हो जाती है। इरोम अफ्स्पा के खिलाफ संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक थीं। ऐसे में लोगों के मन में सवाल है कि अब क्या होगा? लेकिन हमें पूरा संघर्ष सिर्फ एक व्यक्ति के कंधे पर नहीं छोड़ देना चाहिए। वह जो कर सकती थी, कर चुकी हैं।
तेजपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं राजनीतिक विश्लेषक