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अपनी रक्षा तैयारी हम क्यों न करें
हिमांशु मिश्र
Updated Fri, 19 Jul 2013 09:26 PM IST
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वर्षों इंतजार के बाद भारत ने चीन की ओर से मिलने वाली संभावित सामरिक चुनौतियों के प्रति गंभीर रुख अपनाया है। चीन सीमा पर तैनाती के लिए माउंटेन स्ट्राइक कोर के गठन का फैसला इसी ओर इशारा करता है।
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मगर इसके जरिये क्या हम चीन पर दबाव बना पाएंगे? ऐसे ही सवालों पर पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह से हिमांशु मिश्र ने बातचीत की-
- सरकार ने माउंटेन स्ट्राइक कोर के गठन को हरी झंडी दे दी है। जल्दी ही चीन की सीमा पर पचास हजार सैनिक तैनात होंगे। सरकार के इस फैसले पर आप क्या कहेंगे?
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चलिए, चीन के साथ युद्ध के पचास साल बाद जाग तो गए। मगर यह कदम चीन की मैराथन दौड़ की तुलना में सौ मीटर के दौड़ की तैयारी की तरह है। फिर इसमें भी अभी कई अगर-मगर हैं। सवाल यह है कि भारी खर्च के कारण सरकार बाद में अपना यह कदम पीछे तो नहीं खींच लेगी। फिर चुनाव आने वाले हैं। अगर चुनाव में इस सरकार को जनादेश नहीं मिला, तो क्या नई सरकार का भी इस योजना के प्रति ऐसा ही रुख रहेगा? हालांकि इससे सरकार ने यह संकेत देने की कोशिश तो जरूर की है कि उसने सीमा रक्षा के लिए अपनी ओर से पहल शुरू कर दी है।
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- हमारी यह रणनीति चीन पर दबाव डालने में कितनी सफल होगी?
हमारे यहां समस्या यह है कि सरकारें दूरगामी सोच नहीं रखतीं। हम ज्यादा से ज्यादा अगले पांच वर्षों के बारे में सोचते हैं, जबकि चीन अगले सौ साल के बारे में। आप सौ मीटर रेस की तैयारी में जुटे हैं, तो चीन मीलों दौड़ते रहने की तैयारी में जुटा है। इस दिशा में उसने दशकों पहले सोचना शुरू कर दिया था। आज उसने सीमा की दूसरी तरफ मजबूत सामरिक आधारभूत ढांचा तैयार कर लिया है। ल्हासा तक रेल लाइन बिछ गई, जिसके जरिये वह चौबीस घंटे में सेना के कई बटालियन सीमा पर भेज सकता है। हमारे लिए संतोष की बात यह है कि भारत ने अब इस दिशा में सोचना शुरू कर दिया है।
- चीन से मुकाबले के लिए कैसी रणनीति अपनानी चाहिए?
आज के दौर में कूटनीतिक और द्विपक्षीय संबंधों में मजबूती लाना, व्यापारिक सहयोग बढ़ाना जरूरी है। मगर सामरिक ताकत बढ़ाना भी जरूरी है। हम चीन या किसी और देश के खिलाफ लड़ाई छेड़ने नहीं जा रहे। पर दुनिया को यह संदेश देना ही होगा कि हमारा देश किसी भी चुनौतियों से निपटने में पूरी तरह से सक्षम है। इसलिए भारत को चीन से अपने संबंध मजबूत बनाने के साथ अपनी सामरिक जरूरतों से समझौता नहीं करना चाहिए।
-आज देश के लिए चीन कितना बड़ा खतरा है?
मेरा मानना है कि दोनों देशों के बीच एक और युद्ध की दूर-दूर तक आशंका नहीं है। चीन को पता है कि भारत भी परमाणु शक्ति है। चूंकि आर्थिक मोर्चे पर दोनों देश तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, इसलिए चीन भारत के आर्थिक हितों के रास्ते में तरह-तरह से रोड़े अटकाएगा। जिन पड़ोसी देशों से हमारे मतभेद हैं, उन्हें हमारे खिलाफ उकसाएगा। ऐसा वह पिछले काफी समय से कर भी रहा है। फिर भी मेरा मानना यह है कि दोनों देश अगर मिलकर आगे बढ़ेंगे, तो इससे दोनों को लाभ हासिल होगा।
-द्विपक्षीय बातचीत का दौर चलने के बावजूद भारत ने रक्षा तैयारी का फैसला लिया है। क्या इससे यह साबित नहीं होता कि अविश्वास के बादल अभी छंटे नहीं हैं?
हम अपनी रक्षा की तैयारी क्यों न करें? और इसे केवल इसी रूप में क्यों देखा जाए कि हमारी तैयारी चीन के खिलाफ है? किसी भी देश को अपनी सुरक्षा का पर्याप्त और फूलप्रूफ ढांचा तैयार करने का हक है। हमारी सरकार ने अगर इस दिशा में सोचना शुरू किया है, तो इसे देश की रक्षा तैयारियां करने के रूप में ही देखा जाना चाहिए।