शंकराचार्य ने ऐसी बात कह दी वह आत्महत्या भूल गया

शिवकुमार गोयल Updated Sat, 23 Nov 2013 12:27 PM IST
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आदि शंकराचार्य अनूठी प्रतिभासंपन्न आध्यात्मिक विभूति थे। उन्होंने उपनिषदों का भाष्य किया और अनेक प्रेरणादायक पुस्तकों की रचना की।
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हिमालय यात्रा के दौरान एक निराश गृहस्थ ने उनसे पूछा, सांसारिक दुखों के कारण मैं आत्महत्या कर लेना चाहता हूं।
श्री शंकराचार्य ने कहा, यह मानव जीवन असीम पुण्यों के कारण मिलता है। निराश होने के बजाय केवल अपनी दृष्टि बदल दो, दुख और निराशा से मुक्ति मिल जाएगी। उन्होंने आगे बताया, कामनाएं अशांति का मुख्य कारण हैं।
कामनाओं को छोड़ते ही अधिकांश समस्याएं स्वतः हल हो जाएंगी। धर्मानुसार संयमित व सात्विक जीवन बितानेवाला कभी दुखी नहीं हो सकता।

साधन पंचकम में उन्होंने लिखा भी है, शांत्यादि परिचीयताम यानी सहनशीलता और शांति ऐसे गुण हैं, जो अनेक दुखों से दूर रखते हैं। इसके साथ ही गर्व और अहंकार का सदा परित्याग करना चाहिए। धन से कई बातों का भले ही समाधान होता है, किंतु उससे शांति की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा है कि काल किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। इसलिए वृद्धावस्था में जीने की आशा रखना, भगवत भजन में मन न लगना, सांसारिक प्रपंचों में फंसे रहना मूढ़ता का ही परिचायक है। ज्ञानी और विवेकी वह है, जो भगवान की भक्ति में लगा रहता है।
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