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भारतीय क्लासिक आएगा दुनिया के सामने

Sat, 03 Jan 2015 09:19 PM IST
जेनिफर स्कूयसलर
जेनिफर स्कूयसलर Updated Sat, 03 Jan 2015 09:19 PM IST
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वर्ष 1911 में जब लोएब क्लासिकल लाइब्रेरी की स्थापना की गई थी, तो इसकी काफी सराहना की गई थी, क्योंकि यह आम पाठकों तक रोमन और ग्रीक क्लासिक को पहुंचाने का जरिया बनी। पाठकों की सुगमता के लिए इसे सरल अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया था और साथ ही मूल पाठ भी दिया गया था। इसके 522 खंडों में पॉकेट साइज संस्करण भी निकाले गए, जो कि काफी लोकप्रिय हुए। लोएब का प्रकाशन करने वाला हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस अब भारत के क्लासिकल साहित्य का प्रकाशन करना चाहता है। इसे एक बड़ा जटिल बौद्धिक प्रोजेक्ट बताया जा रहा है।

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द मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया के नाम से अगले हफ्ते इसके पांच द्विभाषी खंड जारी किए जाएंगे, जिनमें न केवल संस्कृत के पाठ, बल्कि बांग्ला, हिंदी, कन्नड़, मराठी, फारसी, प्राकृत, तमिल, तेलुगू, उर्दू और अन्य भाषाओं के भी साहित्य समाहित होंगे। इस शताब्दी तक इस शृंखला की 500 किताबें प्रकाशित करने की योजना है, जिसमें कविताओं के साथ ही गद्य, इतिहास और दर्शन जैसे विषय तथा बौद्ध, मुस्लिम और हिंदू धर्म के ग्रंथ भी शामिल होंगे। इनमें ऐसे ग्रंथ भी शामिल होंगे, जो अभी सामान्य पाठकों के लिए उपलब्ध नहीं हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में साउथ एशियन स्टडी के प्रोफेसर और लाइब्रेरी के जनरल एडिटर शेल्डन पोलक कहते हैं, द मूर्ति ऐसी चीजें लेकर आएगा, जिसे न तो दुनिया ने और न ही भारत ने पहले कभी देखा। हम विश्वसनीय, आसानी से पढ़ी जा सकने वाली सटीक और किताबें लेकर आ रहे हैं, जिनके जरिये वास्तव में औपनिवेशिक काल से पहले के भारत के बारे में जाना जा सकेगा। साहित्य की यह विरासत आकार के मामले में भयावह लग सकती है। ग्रीक और रोमन का उपलब्ध क्लासिक आकार के मामले में छोटा था, लेकिन जैसा कि विलियम डेलरिम्पल ने कहा, भारत का बहुभाषी क्लासिकल साहित्य, जिसमें हजारों ग्रंथ शामिल हैं, केवल मूल पाठ के रूप में उपलब्ध है और यदि उसे जल्द संरक्षित या अनुदित नहीं किया गया तो नष्ट हो जाएगा। पोलक बताते हैं कि इन किताबों का कवर आकर्षक गुलाबी रंग का होगा। कुछ विद्वानों को लगता है कि यह प्रोजेक्ट बिल्कुल सही समय में काम कर रहा है, क्योंकि ठीक इसी समय भारत की सत्तारूढ़ भाजपा के हिंदू राष्ट्रवादी संस्कृत के कुछ चुनींदा धार्मिक क्लासिक के आधार पर भारत की पहचान को एकतरफा तरीके से आगे बढ़ाने में लगे हैं।
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बंगलुरू की स्वतंत्र स्कॉलर और अनुवादक आर्शिया सत्तार कहती हैं, यह शृंखला हिंदू धर्म से संबंधित ग्रंथों को हमारे एकमात्र क्लासिक बताने वाले मिथक को तोड़ देगी।
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इसी महीने जयपुर लिटररी फेस्टिवल में इस मूर्ति लाइब्रेरी की किताबें जारी की जाएंगी। भाषा और राष्ट्रीय पहचान के लिए लंबे समय से जारी बहस के बीच वाकई यह महत्वपूर्ण कदम होगा। पिछले महीने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा था कि संस्कृत के धार्मिक ग्रंथ भगवद्गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाए। इसी तरह नवंबर के महीने में स्कूलों में संस्कृत की पढ़ाई को अनिवार्य करने का सुझाव आया था, जिसका काफी विरोध हुआ। इस बीच, तमिल, कन्नड़, तेलुगू और मलयालम जैसी भाषाओं को क्लासिक का दर्जा देने की मांग भी उठ रही है।

भारत जब 1947 में स्वतंत्र हुआ था, उस समय उसके ऐसी पीढ़ी थी, जिसने प्रथम श्रेणी का क्लासिक दिया। लेकिन आज, जैसा कि अनेक विद्वान मानते हैं कि इसके विश्वविद्यालय, कुछ ही विद्वान पैदा कर पा रहे हैं, जो सही मायने में मूर्ति जैसी परियोजना पर काम कर सकें।


उल्लेखनीय है कि न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा 2005 में शुरू की गई क्ले संस्कृत लाइब्रेरी ने 56 खंडों के प्रकाशन के बाद इसके दानदाता जॉन क्ले के निधन के बाद बंद हो गई। क्ले लाइब्रेरी के बंद होने के बाद पोलक ने सोचा कि इसका दायरा संस्कृत से बढ़ाया जाए। नए दानदाता की तलाश में वह भारत आए। उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक्जीक्यूटिव एडिटर शर्मिला सेन से भी इस पर बात की। सेन ने उन्हें इन्फोसिस के संस्थापक एन आर नारायण मूर्ति के पुत्र रोहन मूर्ति से मिलवाया। हार्वर्ड से कंप्यूटर साइंस की डिग्री लेने वाले 26 वर्षीय रोहन मूर्ति ने इस नई लाइब्रेरी के लिए 52 लाख डॉलर दान दिया। इसका डिजिटल संस्करण भी तैयार किया जाएगा। इस शृंखला के तहत जारी होने वाली शुरुआती किताबों से बहुत से भारतीय परिचित होंगे। इनमें 16 वीं सदी के हिंदी के महान कवि सूरदास की 400 कविताएं सूर'स ओसियन शामिल है। इसके अलावा 18 वीं सदी के पंजाबी कवि बुल्लेशाह के सूफी गीत भी पहले संस्करण में शामिल होंगे।

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