बढ़ेगी भारत-अमेरिका की साझेदारी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी निवेशकों के साथ उनकी मुलाकात से दोनों देशों के बीच कारोबार बढ़ने की नई इबारत लिखी गई है। इससे भारत और अमेरिका, दोनों देशों के लिए रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे। गौरतलब है कि भारत और अमेरिका के बीच कारोबार अब करीब 115 अरब डॉलर सालाना तक पहुंच चुका है। यद्यपि पिछले पांच वर्षों में भारत-अमेरिकी कारोबार धीमी गति से बढ़ा है। भारत से निर्यात भी मंद गति से बढ़े हैं। लेकिन अब दोनों ही देशों के बीच कारोबारी साझेदारी बढ़ने का नया परिदृश्य दिखाई दे रहा है। चूंकि विपरीत आर्थिक हालात के बीच अब अमेरिका को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में वह अपने आर्थिक हितों को नहीं भूल सकता। भारत में अमेरिकी सामान के आयात पर जो कुछ अवरोध हैं, उन्हें हटाने और व्यापार घाटे में कमी लाने की बात खुद ट्रंप ने रखी। ऐसे ही भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेखांकित किया कि अमेरिका के लिए भारत से आईटी सहयोग कितना अहम है और अमेरिका को भारत की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए जरूर गौर करना चाहिए। लेकिन यह भी सच है कि एच-1बी वीजा के संबंध में सहूलियत का कोई उल्लेख दोनों देशों की साझा घोषणा में नहीं दिखाई पड़ा।
अब अमेरिका के लिए अन्य देशों की तुलना में भारत में आर्थिक एवं कारोबारी लाभ ज्यादा हैं। भारत न केवल मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में तेजी से आगे बढ़ने की संभावना रखता है, बल्कि इस क्षेत्र में दुनिया का नया कारखाना भी बन सकता है। भारत मेंे निवेश के लिए कई चमकीले क्षेत्र खुले हुए हैं। भारत के बुनियादी ढांचे और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए घरेलू वित्तीय संसाधनों की भारी कमी है। ऐसे में नए वित्तीय स्रोतों के मद्देनजर भारत में अमेरिका से एफडीआई स्वागत योग्य है। खासतौर से डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और सभी के लिए ब्रॉडबैंड उपलब्ध कराने जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए आने वाले वक्त में भारत को अरबों डॉलर के निवेश की दरकार है। परिवहन उपकरण, पर्यावरणीय तकनीक, ऊर्जा, आईटी, इलेक्ट्रॉनिक्स और वित्तीय सेवा क्षेत्र में अमेरिका से और अधिक विदेशी निवेश आकर्षित करना होगा। सैटेलाइट कम्युनिकेशंस के लिए भी बड़ी मात्रा में एफडीआई की जरूरत है। पिछले 15 वर्षों में टेलीकॉम सेक्टर में एफडीआई से अर्थव्यवस्था को भारी लाभ हुआ है। चूंकि सैटकॉम का मूल स्वरूप भी दूरसंचार से मेल खाता है, ऐसे में सैटकॉम में भी टेलीकॉम जैसी ही क्रांति के लिए अमेरिका से भारी एफडीआई की दरकार है।
ट्रंप और अमेरिकी निवेशकों के समक्ष यह बात रेखांकित हुई है कि भारत एक मजबूत आर्थिक ताकत और बड़े वैश्विक बाजार के रूप में उभर रहा है। अमेरिका एक ऐसा बाजार खोज रहा है, जो उसके लोगों को रोजगार दिला सके। अमेरिका भारत के लिए निवेश और तकनीक का महत्वपूर्ण स्रोत होने के साथ महत्वपूर्ण कारोबारी साझेदार भी है।
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, तो भारत दुनिया में सबसे तेज आर्थिक विकास दर वाला बड़ा देश है। ऐसे में, उम्मीद करनी चाहिए कि मोदी और ट्रंप की अहम मुलाकात के बाद भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक और कारोबार का नया उत्साहजनक परिदृश्य आगे दिखेगा।