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बाजवा का रुख :पाकिस्तान के झांसे में न आए भारत

प्रशांत दीक्षित Published by: प्रशांत दीक्षित Updated Wed, 21 Apr 2021 02:58 AM IST
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पाक प्रधानमंत्री इमरान खान और सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा
पाक प्रधानमंत्री इमरान खान और सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा - फोटो : social media
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निस्संदेह वैश्विक समुदाय ने तब काफी राहत महसूस की, जब पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने को बढ़ावा दिया और कहा कि दोनों देश अतीत को भूलकर आगे बढ़ें, जिसका बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी बराबरी से समर्थन किया। पाकिस्तान नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर एकतरफा संघर्ष विराम का प्रस्ताव लेकर आया, जिसका भारतीय सशस्त्र बलों ने दिल से और अक्षरशः पालन किया। भारत ने उचित शब्दों के साथ जवाब दिया और इमरान खान को बांग्लादेश ले जाने वाले विमान को भारतीय हवाई क्षेत्र से गुजरने की अनुमति दी गई थी। 
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फरवरी 2019 में भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों द्वारा बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी प्रशिक्षण ठिकानों पर हमले के बाद इस प्रस्ताव की सहजता विशेष रूप से काफी चौंकाने वाली थी। और बालाकोट में भारतीय सेनाओं का हवाई हमला पुलवामा आतंकी हमले की प्रतिक्रिया में था, जिसमें 40 सीआरपीएफ जवान मारे गए थे और जैश-ए-मोहम्मद ने उस आतंकी हमले का दावा किया था। अब हम जानते हैं कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राजनीतिक नेतृत्व ने दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में भूमिका निभाई है और यहां तक कि कथित रूप से इस उद्देश्य के लिए उन्होंने नई दिल्ली का दौरा भी किया था। कुछ दिनों पहले भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी एक ही समय आबु धाबी में थे, लेकिन दोनों के बीच कोई द्विपक्षीय वार्ता नहीं हुई। इसके कारणों पर दोनों देशों ने आधिकारिक रूप से अभी टिप्पणी करना मुनासिब नहीं समझा, शायद चुप रहने में समझदारी समझी गई।


हालांकि एक और मामला है, जिसने पाकिस्तान को नरम रुख अपनाने के लिए प्रेरित किया है, क्योंकि यूएई ने अपना एक अरब डॉलर वापस मांगा था, जिससे पाकिस्तान सरकार के अधिकारी दहशत में थे। इस पूरी राशि को लौटाने की अंतिम समय सीमा  12 मार्च थी, जो अब भी बकाया है। तो क्या यूएई की यह योजना अपने धन वसूली की योजना थी, जो स्पष्ट रूप से पाकिस्तान द्वारा प्रेरित है? क्योंकि यूएई का भारत के साथ अच्छा रिश्ता है। अथवा फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) के दबाव से बचने के लिए पाकिस्तान ने यह रुख अख्तियार किया है? यूएई खाड़ी सहयोग परिषद का ताकतवर सदस्य है और यह संगठन काफी प्रभावशाली है। और ऐसे पड़ाव पर भारत की चुप्पी बड़ी मददगार साबित हो सकती है। इसलिए, हमें एफएटीएफ से जुड़ी कुछ समवर्ती घटनाओं पर नजर डालनी चाहिए, जिन्होंने पाकिस्तान को बहुत प्रभावित किया और उसे अपने रणनीतिक रुख में बदलाव के लिए प्रेरित किया। 

हम जानते हैं कि पाकिस्तान जून, 2018 से एफएटीएफ की ग्रे सूची में शामिल है और उसे फरवरी, 2020 में अंतिम चेतावनी दी गई थी कि उसी वर्ष जून तक 27 कार्रवाई बिंदुओं को पूरा करे। एफएटीएफ की समीक्षा किसी भी समय होने वाली है। एफएटीएफ की ग्रे सूची में तीन बार डाले जाने के कारण पाकिस्तान को कुल 38 अरब डॉलर की आर्थिक हानि हुई है। और वह इस सूची में रहना अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी। अब तक वह चीन, तुर्की और मलयेशिया के समर्थन से बचा हुआ है। और फिर भारत के लिए एक मित्रवत भाव की तुलना में सबसे महत्वपूर्ण क्या हो सकता है, जो पाकिस्तान संचालित आतंकी गुटों की आतंकवादी कार्रवाइयों से सर्वाधिक परेशान रहा है? 

लगता है कि यह एक पहेली है, भारत जिसका सामना कर रहा है। क्या वह 26/11 मुंबई हमले के दोषियों, 2016 में पठानकोट एयर बेस पर हमला करने वाले समूह के मास्टरमाइंड, और फिर उरी में भारतीय सैन्य कैंप समेत अन्य आतंकी हमलों के जिम्मेदारों को लाने की अपनी लंबी बकाया मांगों की अनदेखी कर दे। नहीं भूलना चाहिए कि 1993 में मुंबई लोकल ट्रेन में आतंकी हमले करने वाले भारतीय नागरिक को आईएसआई के संरक्षण में बालाकोट जैसे आतंकी प्रशिक्षण केंद्र में सशस्त्र प्रशिक्षण दिया गया था। आईएसआई द्वारा तैयार किए गए छद्म संगठन ने विस्फोटक और हथियार प्रदान किए और ट्रेन पर बम फेंकने वाले को भारतीय तटों पर तस्करों की नौका के मार्फत विस्फोटक सामग्री प्राप्त करने में सहायता प्रदान की। इस तरह की नौका का इस्तेमाल 26/11 मुंबई हमले में भी किया गया था, हालांकि इसमें पाकिस्तानी सेना द्वारा प्रशिक्षित पाक नागरिकों ने नौकाओं को मुंबई तक पहुंचने का निर्देश दिया था।

जमात उद दावा के प्रमुख हाफिज सईद के नेतृत्व वाले लश्करे तैयबा को 2008 के मुंबई हमले के लिए जिम्मेदार माना गया। आतंकी फंडिंग के लिए हाफिज सईद को दस साल की सजा मिली, लेकिन मुंबई हमले के लिए नहीं। मुंबई हमले के साजिशकर्ता और लश्करे तैयबा के कमांडर जकीउर रहमान लखवी, जिसने मुंबई हमले को संचालित किया था, उसे जनवरी, 2001 में पाकिस्तान की आतंकवाद विरोधी एक अदालत ने आतंकी फंडिंग के लिए 15 वर्षों के जेल की सजा सुनाई, लेकिन मुंबई हमले में उसकी संलिप्तता के लिए नहीं। विडंबना यह है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 अल कायदा प्रतिबंध समिति ने व्यक्तिगत खर्चों को पूरा करने के लिए लखवी को 1.5 लाख पाकिस्तान रुपये के मासिक भुगतान की अनुमति दी। और यह उसकी गिरफ्तारी और सुनवाई से दस दिन पहले हुआ। आश्चर्यजनक रूप से उनकी सुनवाई और सजा एक दिन में समाप्त हो गई। इसलिए भारत के इस आकलन में दम है कि पाकिस्तान के इस प्रस्ताव के दूरगामी लक्ष्य हैं और एफएटीएफ
से राहत का लाभ लेने के लिए इसे पाकिस्तानी सेना के इशारे पर पेश किया गया है।

इन खुलासों के बावजूद इस बात का कोई आश्वासन नहीं है कि पाकिस्तान में आतंकी बुनियादी ढांचा ध्वस्त हो चुका है। इसकी पहुंच अफगानिस्तान सहित सभी क्षेत्रों में है, जहां भारत के प्रमुख भूमिका निभाने की संभावना है। यह सरल स्पष्टीकरण कि एकमात्र विवाद का मुद्दा कश्मीर का समाधान है, जिसे हल करने की आवश्यकता है, से स्पष्ट है कि अब उसके हाथ में कोई मुद्दा नहीं रह गया है। इस मामले में मूल बात यह है कि भारत के साथ पाकिस्तान द्वारा समर्थन करने का रणनीतिक सिद्धांत जारी रहेगा। 
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