{"_id":"5eb1b90a8ebc3e90224c102f","slug":"india-lckdown-madhurendra-sinha-opinion-fall-in-price-of-oil-shining-gold","type":"story","status":"publish","title_hn":"गिरता तेल; चमकता सोना","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
गिरता तेल; चमकता सोना
Wed, 06 May 2020 12:36 AM IST
संजीव कुमार झा
मधुरेन्द्र सिन्हा, आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ
मधुरेन्द्र सिन्हा, आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Wed, 06 May 2020 12:36 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : amar ujala
ऐसा दुनिया के इतिहास में पहली बार हुआ कि कच्चे तेल की कीमतें शून्य से भी नीचे चली जाएं। इसी 21 अप्रैल को अमेरिका में ऐसा ही हुआ, जब तेल की वायदा कीमतें माइनस में चली गईं। दरअसल उसके पहले की रात को वर्ल्ड टेक्सस इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) की, जो एक तरह का कच्चा तेल है, कीमतें निगेटिव जोन में चली गईं। 18 डॉलर प्रति बैरल के भाव बिक रहा तेल -38 डॉलर पर चला गया। इसका असर दुनिया भर के बाजारों पर पड़ा और इनके भाव जमीन छूने लगे।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
कोरोना वायरस के कारण विश्व में तेल की मांग घटती चली गई और कीमतें तेजी से गिरने लगीं। दुनिया के सबसे बड़े दो खरीदार देश- अमेरिका और चीन ने तेल की खरीदारी तो बिल्कुल कम कर दी और कई देशों ने तो बिल्कुल बंद कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि अमेरिका में कच्चे तेल के भंडार भर गए और तेल रखने की जगह तक नहीं रही। हालत यह हो गई कि कच्चे तेल को रखने के लिए विशाल ऑयल टैंकरों की मदद लेनी पड़ी और एक टैंकर तो 16 करोड़ बैरल तेल लेकर समुद्र में घूम रहा है।
दरअसल अमेरिका ने स्वावलंबी बनने के लिए पिछले कुछ वर्षों से तेल का उत्पादन बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया है और इसके लिए उसने आधुनिकतम शेल टेक्नोलॉजी का सहारा लिया, जिससे वह चट्टानों और पथरीली जगहों से भी तेल निकालता है। अमेरिका के पास इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा कच्चे तेल का भंडार है, सऊदी अरब से भी ज्यादा। लेकिन कोरोना वायरस के कारण तेल की मांग खत्म हो गई और उसके भंडार लबालब भर गए, जिससे तेल का बाजार धराशायी हो गया।
इससे उसके अरबों डॉलर के विशाल तेल उद्योग पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं, क्योंकि कोई नहीं जानता कि कोराना वायरस कब जाएगा। जिन निवेशकों ने तेल के कारोबार में धन लगाया था, उनके छक्के छूटने लग गए और कई तो दिवालियापन के कगार पर चले गए।
अंदाजा है कि इस साल तेल उत्पादक कंपनियों को कम से कम एक खरब डॉलर का घाटा उठाना पड़ा। हालांकि अब बाजार में भारी उठापटक के बाद तेल की कीमतें कुछ बढ़ी हैं और 20 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ठहर गई हैं, फिर भी स्थिरता नहीं दिख रही है। तेल का उत्पादन बहुत घट गया है और अब सभी इंतजार कर रहे हैं अर्थव्यवस्थाओं के खुलने का।
लेकिन इतना तय है कि तेल की कीमतें अब पुराने स्तर पर अगले कई वर्षों तक नहीं जाएंगी। यानी तेल उद्योग का भविष्य अनिश्चित है। इसका एक कारण यह भी है कि भारत समेत कई देश फॉसिल ऑयल यानी खुदाई से प्राप्त तेल से छुटकारा पाने के लिए काम कर रहे हैं। वे ऊर्जा के अन्य स्रोतों, जैसे सौर ऊर्जा पर काफी निवेश कर रहे हैं। टेक्नोलॉजी में तेजी से हो रहे बदलाव के कारण इसके उत्पादन में बढ़ोतरी होगी। भारत ने 2022 तक 100 गीगाबाइट सौर ऊर्जा के उत्पादन का लक्ष्य रखा है, जो उसे काफी हद तक आत्मनिर्भर बना देगा।
इससे कच्चे तेल पर हमारी निर्भरता काफी कम हो जाएगी। सोने की चमक से सभी चकाचौंध कहावत है कि सोना संकट का साथी है और सदियों से लोग इस पर भरोसा करते आए हैं। जब भी कोई विश्वव्यापी संकट होता है, जैसे महायुद्ध या महामारी वगैरह, तो निवेशक सोने की ओर दौड़ते हैं और उसकी खरीदारी करते हैं। इससे सारी दुनिया में इसकी कीमतें बढ़ जाती हैं और लोगों का विश्वास भी। इस समय भी ऐसा ही हो रहा है। कोरोना का कहर सारी दुनिया में है और अर्थव्यवस्थाएं हैं कि ढह रही हैं।
भविष्य में क्या होगा, कोई नहीं जानता। यही कारण रहा कि पिछले सवा साल में ही सोने के दाम लगभग डेढ़ गुना बढ़ गए। पहली जनवरी को सोना 3,998 रुपये प्रति ग्राम पर था, जबकि पहली मई को यह 4,590 रुपये प्रति ग्राम पर जा पहुंचा है। सिर्फ मार्च से अबतक सोने की कीमतों में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है। इसकी कीमतों में इतनी तेजी हाल के वर्षों में कभी नहीं देखी गई। यह बताता है कि सोने पर लोगों का कितना विश्वास है और यह कितनी तेजी से अपनी चमक बिखेरता है। यह ध्यान देने वाली बात है कि इस समय देश में सोने और स्वर्णाभूषणों के शोरूम बंद हैं और तब यह हालत है।
यानी घरेलू मांग नहीं के बराबर है और इसकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजारों से तय हो रही हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में सोने का उत्पादन नगण्य है और हमें सोना आयात करना होता है। और सच यह भी है कि हम दुनिया के दूसरे सबसे बड़े खरीदार हैं। हर साल हम औसतन 800 टन सोना आयात करते हैं, जिसका असर हमारे व्यापार घाटे पर पड़ता है। अब चूंकि पिछले दिनों डॉलर के मुकाबले हमारी मुद्रा भी गिरती रही है, इसलिए सोने की कीमतें ऊपर जा रही हैं।
क्या सोने की यह अभूतपूर्व तेजी यहीं रुक जाएगी, यह सवाल बार-बार पूछा जा रहा है। बाजार के विश्लेषकों का मानना है कि अभी कोरोना वायरस का असर अर्थव्यवस्थाओं पर खत्म नहीं हुआ है और भविष्य धुंधला है, तो ऐसे में सोने के दाम आने वाले हफ्तों में कम से कम पांच प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं। यानी सोना ऐसा रिकॉर्ड बनाने जा रहा है, जिसके बारे में न कभी सोचा गया था और न सुना गया था, क्योंकि सोना अब गहनों के लिए नहीं, भविष्य की सुरक्षा के लिए खरीदा जा रहा है और उसमें सारी दुनिया के लोग शामिल हैं। अभी दुनिया महामारी की चपेट में है।
करोड़ों कारखाने बंद हैं और करोड़ों लोग बेरोजगार भी हैं। दुनिया भर की तमाम अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा रही हैं। कई तो बर्बादी के कगार पर हैं। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका तथा यूरोप की हालत पतली है और वहां की सरकारें भी लाचार दिख रही हैं। ऐसे में कच्चे तेल की मांग कम से कम रहेगी, लेकिन दूसरी ओर सोने के प्रति आकर्षण बना रहेगा।