नए शक्ति संतुलन में भारत
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नवंबर में एशिया की नई भू-राजनीति पूरे शवाब पर रही। एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपेक) के शिखर सम्मेलन के बाद म्यांमार में भारत-एशियाई देशों की बैठक, फिर पूर्वी एशियाई शिखर सम्मेलन और फिर ब्रिसबेन में जी-20 देशों का सम्मेलन हुआ। इन बैठकों से अलग चीन, भारत, अमेरिका और जापान के नेताओं की महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठकें हुईं। उधर चीन और दक्षिण कोरिया के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर सहमति बनी, तो बीजिंग एवं ऑस्ट्रेलिया ने भी एक समझौते पर हस्ताक्षर किया। इस दौरान चीन ने हालांकि खुद को मुख्य खिलाड़ी के रूप में पेश किया, लेकिन ज्यादा लोकप्रियता नरेंद्र मोदी को मिली। उभरते चीनी एवं अमेरिकी गुटों के बीच भारत ने खुद को स्विंग स्टेट के रूप में पेश किया। यह शब्द अमेरिकी राजनीति से आया है, जिसका मतलब होता है, ऐसा राज्य, जो रिपब्लिकन या डेमोक्रेट किसी के पक्ष में जा सकता है।
शी जिनपिंग ने बीजिंग के एपेक सम्मेलन में एक बड़ी शक्ति के रूप में चीन के उभरने की रूपरेखा प्रस्तुत की। सौ अरब डॉलर के न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना एवं एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक शुरू करने के लिए सौ अरब डॉलर की सहायता देने के साथ चीन वैश्विक वित्त की नई दुनिया बनाने के लिए तैयार है। यह चीनी अर्थव्यवस्था से अपनी शक्ति प्राप्त करेगा, जिसके बारे में शी ने कहा कि अब वह मध्य से उच्च गति से विकास करेगा और उसका मुख्य ध्यान निर्यात के बजाय घरेलू खपत पर रहेगा।
दुनिया के लिए चीन का संदेश यह था कि पांच वर्षों में वह सौ खरब डॉलर का आयात करेगा, 12 खरब डॉलर का विदेशों में प्रत्यक्ष निवेश करेगा, सिल्क रोड की पहल के लिए 40 अरब डॉलर खर्च करेगा और 50 करोड़ पर्यटक भी भेजेगा। यानी उसका सांकेतिक संदेश था कि चीन की पार्टी में आपका स्वागत है। मगर यदि आप अलग रहते हैं, तो आपकी बला से।
यह सब कुछ एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त व्यापार क्षेत्र (एफटीएएपी) की महत्वाकांक्षी योजना का हिस्सा था, जिसके लिए चीन ने एपेक के 21 सदस्यों का समर्थन हासिल कर लिया है। जो हम देख रहे हैं, वह चीनी अर्थव्यवस्था की तीसरी वृद्धि है, जिसका उद्देश्य स्पष्ट तौर पर चीनी नेतृत्व में एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की करीबी एकजुटता भी है। इस विस्तृत क्षेत्र में चीन कम लागत वाली वस्तुओं के निर्माता से चीनी डिजाइन एवं निर्मित माल का उत्पादक बनना चाहता है।
हालांकि इसके राजनीतिक पहलू भी हैं। मसलन, चीन बेशक आसियान एवं जापान के खिलाफ समुद्री क्षेत्र में असाधारण दावे करता है, लेकिन उनकी भावनाओं को शांत करने के लिए आर्थिक मरहम भी लगाना चाहता है। मानवीय मामलों में यह सर्वज्ञात है कि राष्ट्रीय गौरव अक्सर आर्थिक लाभ की तुलना में ज्यादा महत्व रखता है। नतीजतन कई आसियान देश इस क्षेत्र में सैन्य संतुलन के लिए अमेरिका के साथ तालमेल बिठाते हैं।
चीन और अमेरिका के बीच हम प्रतिस्पर्धा और सहयोग भी देखते हैं। एफटीएएपी के साथ अमेरिका और चीन के बीच बीजिंग में हुए तीन महत्वपूर्ण समझौतों से भी इसका पता चलता है। पहला द्विपक्षीय समझौता जलवायु परिवर्तन पर था, जो वैश्विक जलवायु संधि के लिए वार्ता को बढ़ा सकता है। दो अन्य सैन्य समझौते पर अभी बातचीत चल रही है, जिसमें से एक, एक-दूसरे को अभ्यास की सूचना देने, महत्वपूर्ण रिपोर्ट और सैन्य फेरबदल से संबंधित है, तो दूसरे में आकाश और समुद्र में मुठभेड़ों से संबंधित आचार संहिता शामिल है।
लेकिन चीन की सबसे बड़ी उपलब्धि जापान के साथ हुआ उसका चार सूत्री समझौता है, जो एपेक सम्मेलन से बाहर हुआ। समझौते में जापान ने चीन के साथ हुए युद्ध के संदर्भ में 'इतिहास से सीधे सामना करते हुए भविष्य की तरफ देखने की जरूरत' को स्वीकार किया है। उसने माना है कि दोनों पक्षों का सेनकाकू/दियाउ द्वीप को लेकर अलग-अलग मत है। हो सकता है, जापान द्वीपों पर विवाद की बात को पूरी तरह से स्वीकार न करे, लेकिन वह इसके करीब पहुंच गया है।
इन तमाम घटनाक्रमों का भारत के लिए क्या महत्व है? पहला, लंबे समय तक बढ़ते तनाव के बाद अमेरिका और जापान जैसे देश उभरते चीन के साथ अपने संबंधों को नया रूप देना चाहते हैं। दूसरी बात, चीन अमेरिका के खिलाफ खुद को विकल्प के तौर पर खड़ा कर रहा है। 'नए किस्म के इस शक्ति संतुलन' में चीन अमेरिका के साथ बिना टकराव वाला और सहयोगी रिश्ता चाहता है, लेकिन यह अमेरिका पर निर्भर करता है कि वह चीन को एशिया प्रशांत क्षेत्र में बराबर के साझेदार के रूप में स्वीकार करता है या नहीं। जाहिर है, भविष्य में वह चीन के पैर उखाड़ना जरूर चाहेगा।
इन सबके बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक महत्वपूर्ण काम किया है। उन्होंने भारत को एक स्विंग स्टेट के रूप में पेश करने की कोशिश की है। अमेरिका और जापान के लिए भी, जिनके अतीत में चीन के साथ तनावपूर्ण रिश्ते रहे हैं, समझदारी इसी में है कि वे चीन के उभार को बर्दाश्त करें। ऐसे में कोई वजह नहीं है कि भारत चीन को बर्दाश्त न करे।
व्यापार, वित्त, समुद्री सुरक्षा, परमाणु अप्रसार और मानवाधिकार के क्षेत्र में भारत मौटे तौर पर पश्चिमी देशों के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन चीन की कई पहल को लेकर भारत में गर्मजोशी है। भारत ब्रिक्स एवं एआईआईबी का सदस्य है, जिससे वाशिंगटन खुश नहीं है। लेकिन जापान और वियतनाम के साथ भारत के रिश्ते बेहतर हैं, जिनके चीन से अच्छे संबंध नहीं हैं। जब एक ज्यादा न्यायसंगत विश्व व्यवस्था की बात होती है, तो भारत चीन के साथ होता है, लेकिन भारत-चीन सीमा विवाद, पाकिस्तान के साथ उसके संबंध और दक्षिण एशिया में भारत को पीछे धकेलने की उसकी प्रतिस्पर्धी कोशिशों को लेकर बीजिंग के साथ इसके गहरे मतभेद हैं।
(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली के प्रतिष्ठित फेलो हैं, जो पिछले दिनों बीजिंग में थे)