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साझेदार हैं भारत और अमेरिका
मारूफ रजा
Updated Wed, 26 Nov 2014 10:50 AM IST
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अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्योते को स्वीकार कर आगामी गणतंत्र दिवस समारोह में मेहमान बनने की सहमति प्रदान कर दी है। यह पहली बार हो रहा है कि गणतंत्र दिवस समारोह में कोई अमेरिकी राष्ट्रपति हमारा मुख्य अतिथि होगा। जाहिर है, मोदी भारत-अमेरिकी रिश्ते को उस शीर्ष पर ले जाना चाहते हैं, जिसकी कोशिश उनके पूर्ववर्ती अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह भी कर रहे थे, लेकिन वे उतने सफल नहीं हुए।
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बराक ओबामा की दूसरी भारत यात्रा से भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूती मिलेगी। जिसका असर पड़ोसी देशों, मसलन, चीन, पाकिस्तान आदि देशों के साथ भारत के रिश्तों पर भी पड़ने की संभावना है। नई विश्व व्यवस्था में जिस तरह से नए रिश्ते बन रहे हैं, उसमें भारत और अमेरिका का एक-दूसरे के और करीब आना महत्वपूर्ण है। गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी ने उन ओबामा के साथ नजदीकी रिश्ते कायम किए हैं, जिन्होंने कभी कहा था, 'मैं समझता हूं कि अमेरिका और भारत के रिश्ते 21वीं सदी की निर्णायक साझेदारी साबित होगी।' इस बयान में सबसे प्रमुख शब्द 'साझेदारी' है, हालांकि यह किस हद तक संभव है, फिलहाल यह जांच का विषय हो सकता है।
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हालांकि अमेरिका की तरह भारत भी एक 'विचार' है और दोनों देशों का साझा आदर्श लोकतंत्र है, लेकिन भारत विभिन्न कारणों से अमेरिका का 'सहयोगी' बनने का इच्छुक नहीं है, बल्कि उसका 'साझेदार' बनना चाहता है। 'सहयोगी' एक ऐसा शब्द है, जिसे अमेरिकी काफी पसंद करते हैं। एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि भारत उत्साहपूर्वक अपनी स्वतंत्रता की रक्षा पर जोर देता है, खासकर विदेश नीति के मामलों में। महाशक्ति देश होने के नाते भारी दबदबे के साथ अमेरिका अपने करीबी सहयोगियों पर भी अपनी नीति थोपता है, जैसे ब्रिटेन पर। हालांकि तात्कालिक स्तर पर अमेरिका के सामने विदेश नीति से संबंधित दो समस्याएं मौजूद हैं- पहला, इस्लामिक स्टेट और उसके खलीफा का विनाश और दूसरा, अफगानिस्तान से सम्मानजनक विदाई। भारत इनमें से किसी भी मसले पर खुलकर अमेरिका के साथ जाना नहीं चाहता है। पश्चिम एशिया में भारत गुप्त रूप से अमेरिका की मदद कर सकता है, लेकिन जहां तक अफगानिस्तान की बात है, तो भारत वहां पर अपने सैनिकों को उतारना नहीं चाहेगा।
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भारतीय उप-महाद्वीप में इन दोनों देशों के सामने प्रमुख चुनौती पाकिस्तान द्वारा आतंकी समूहों के उपयोग को रोकना है, जिसे पाकिस्तान ने अपनी सामरिक संपत्ति के रूप में पाला-पोसा है। हालांकि भारत अमेरिका से और ज्यादा की अपेक्षा नहीं कर सकता, क्योंकि पाकिस्तान अब भी अमेरिका का सहयोगी है। हिंद महासागर में भले ही अमेरिका और भारत चीन की बढ़ती ताकत और महत्वाकांक्षाओं का मुकाबला करना चाहते हैं, पर भारत चीन से सीधे टकराव मोल नहीं लेना चाहेगा। अमेरिका को उम्मीद है कि भारत के परमाणु जवाबदेही कानून में सुधार करके अमेरिकी कंपनियों की पहुंच आसान बनाई जाएगी और तब सौ अरब डॉलर का मौजूदा द्विपक्षीय व्यापार कई गुना बढ़ जाएगा। अब भी अमेरिका का सबसे बड़ा आकर्षण भारत का रक्षा बाजार है, जो दुनिया में सबसे बड़ा है।