फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   independent voice in closed society

बंद समाज में स्वतंत्र आवाज

Fri, 19 Jul 2013 09:32 PM IST
रमण कुमार सिंह
रमण कुमार सिंह Updated Fri, 19 Jul 2013 09:32 PM IST
विज्ञापन
independent voice in closed society

एक ऐसे समाज में जहां महिलाओं का घर से बाहर निकलना, पुरुषों के साथ काम करना, यहां तक कि साइकिल चलाना और मतदान करना भी मना हो, वहां यदि एक लड़की की चाहत को कोई महिला निर्देशिका फिल्म के परदे पर साकार करती है और उस फिल्म की दुनिया भर में प्रशंसा होती है, तो सचमुच यह हैरानी की बात है।

विज्ञापन


और यह प्रेरणाप्रद शख्सियत हैं, सऊदी अरब की पहली महिला फिल्म निर्देशक हायफा अल-मंसूर, जिनकी पहली फीचर फिल्म वाजदा की दुनिया भर में चर्चा हो रही है। औरत विरोधी समाज में अपनी पहचान बनाने की चाहत ने ही उन्हें माहौल के खिलाफ रचनात्मक पहल करने के लिए प्रेरित किया। वाजदा साइकिल के लिए संघर्ष करने वाली एक स्कूली बच्ची की कहानी है। यह फिल्म न सिर्फ उस मुल्क की हकीकत बयान करती है, बल्कि वहां की सांस्कृतिक विरासत को भी रेखांकित करती है।
विज्ञापन


एक संकीर्ण और पारंपरिक समाज में जन्मी हायफा बचपन से ही फिल्में देखने की शौकीन थीं। वह सऊदी कवि अब्दुल रहमान मंसूर की बारह संतानों में से एक हैं। पिता उन्हें घर में फिल्में दिखाया करते थे। भले ही हाइफा के आसपास का माहौल काफी दकियानूस था, लेकिन माता-पिता ने उदार माहौल में उनकी परवरिश की।
विज्ञापन
विज्ञापन


पिता के प्रोत्साहन से ही हायफा ने काहिरा स्थित अमेरिकी विश्वविद्यालय से साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन किया और फिर यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी से फिल्म निर्देशन में मास्टर डिग्री हासिल की। पढ़ाई के बाद सऊदी अरब लौटकर हायफा ने एक तेल कंपनी में नौकरी कर ली, लेकिन उसमें उसका मन नहीं रमा। अंततः उन्होंने अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर फिल्म निर्देशन करने की ठानी। लेकिन सऊदी अरब जैसे बंद समाज में हायफा के लिए फिल्म-निर्देशक बनना कम चुनौतीपूर्ण नहीं रहा।


कलाकारों के चयन से लेकर फिल्म की शूटिंग तक में उन्हें कई परेशानियां झेलनी पड़ीं, कई बार जान से मार देने की धमकी भरे खत भी मिले, लेकिन औरतों के वजूद को साबित करने का जुनून ही था कि उन्होंने हार नहीं मानी। इससे पहले भी उन्होंने कुछ डॉक्यूमेंटरी बनाई हैं, जिनमें से एक गोल्डन डैगर अवार्ड पानेवाली वुमेन विदाउट शैडोज खाड़ी की उन औरत के ऊपर है, जिन्होंने बुर्का पहनने से इनकार कर दिया। आज जहां कुछ लोग उसके दुश्मन बने बैठे हैं, वहीं बहुत सारी महिलाएं उसे अपना आदर्श मानती हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed