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शरणार्थियों की चिंता या राजनीतिक चाल

Thu, 31 Jul 2014 07:52 PM IST
बिनोद रिंगानिया
बिनोद रिंगानिया Updated Thu, 31 Jul 2014 07:52 PM IST
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In intrest of refugee or just politics

इसे असम की राजनीति में तूफान का आना ही कहा जाएगा कि राज्य सरकार ने बांग्लादेश से धार्मिक आधार पर होने वाले अत्याचार के कारण भागकर आने वाले लोगों को शरणार्थी का दर्जा देते हुए उन्हें सारी नागरिक सुविधाएं देने का केंद्र से अनुरोध किया है। जबकि असम के प्रभावशाली छात्र संगठन के साथ केंद्र सरकार के 15 अगस्त, 1985 को हुए एक समझौते के अनुसार सिर्फ उन्हीं लोगों को भारतीय नागरिकता देने पर सहमति हुई थी, जो 24 मार्च 1971 तक सीमा के उस पार से असम में आए थे। उसके बाद आने वालों को उनकी धार्मिक पहचान को ध्यान में रखे बिना विदेशी मानकर उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई किए जाने का प्रावधान उस समझौते में था।

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लेकिन बांग्लादेश से हिंदू बंगाली, गारो, विष्णुप्रिया मणिपुरी और बरुवा बौद्ध समुदायों के लोग असम सहित अन्य राज्यों में आकर बसते रहे हैं। जब-जब असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़ने और वापस सीमा पार भेजने की बात उठती है, तब-तब इन्हीं किस्मत के मारे लोगों पर गाज गिरती है। अपने पुरखों की जमीन से विच्छिन्न होने के कारण एक तो ये लोग ऐसे ही संबलहीन होते हैं, तिस पर प्रशासन की मार उन पर पड़ती है। यदि कोई उन शिविरों में जाए, जहां शिनाख्त हो चुके बांग्लादेशी घुसपैठिये वापस बांग्लादेश भेजे जाने का इंतजार करते हैं, तो उसकी आंखों में आंसू आ जाएंगे। रोजी-रोटी की तलाश नहीं, बल्कि असहिष्णु समाज की हिंसा के बीच जान बचाने की चिंता ही इन्हें अपने पुरखों की जमीन छोड़ने पर मजबूर करती है।
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यदि ये लोग भारत के पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में प्रवेश करें, तो स्थानीय आबादी में घुल-मिल सकते हैं। इस तरह ये कानून के लंबे हाथों से बचे भी रह सकते हैं। पर असम में बढ़ती मुस्लिम आबादी के कारण बांग्लादेशियों के खिलाफ घृणा की भावना है। इसे ही कानूनी और सेक्यूलर रूप देने के लिए अधिकांश संगठनों ने यह लाइन अख्तियार कर रखी है कि अवैध बांग्लादेशी अवैध बांग्लादेशी ही हैं, भले उसका धर्म कुछ भी हो। यह स्थिति गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान से भिन्न है, जहां पाकिस्तान से आने वाले गुजराती और सिंधी शरणार्थियों को नागरिकता देकर इस मुद्दे को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया था। पूर्वोत्तर की समस्या यह है कि त्रिपुरा को छोड़ दूसरे राज्यों में बांग्लाभाषियों का स्वागत नहीं किया जाता। उल्टे उन्हें स्थानीय भाषा व संस्कृति के लिए खतरे के रूप में देखा जाता है। संसाधनों पर पड़ने वाले बोझ की बात तो है ही। विभाजन के समय से ही असम के राजनेताओं ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणाथिर्यों को बसाने का विरोध शुरू कर दिया था।
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कहा जा रहा है कि तरुण गोगोई सरकार का केंद्र को भेजा गया ताजा अनुरोध वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है। क्योंकि केंद्र की भाजपा नीत गठबंधन सरकार बांग्लादेश से आए हिंदुओं के प्रति नरम है और चुनाव के दौरान भाजपा ने उन्हें पूर्ण नागरिकता देने का आश्वासन दिया था। अब तरुण गोगोई की कांग्रेस सरकार ने भाजपा द्वारा कोई कदम उठाने से पहले ही यह पत्ता फेंक दिया है, ताकि लगे कि वह हिंदू बंगालियों के प्रति ज्यादा सहानुभूतिशील है।


असम सरकार का यह अनुरोध अगर मानवीयता की कसौटी पर खरा उतरता है, तो इसका समर्थन किया जाना चाहिए। हालांकि इसका भी ध्यान रखना होगा कि शरणार्थियों का सारा बोझ असम जैसे छोटे राज्य पर ही न पड़े।

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