दिखने लगी है मोदी की छाप
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अभी सरकार का औपचारिक गठन नहीं हुआ है, लेकिन शपथ ग्रहण समारोह में भारत के भावी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवाज शरीफ और हामिद करजई सहित दक्षेस देशों के नेताओं को बुलाकर अपने विरोधियों को अवाक कर दिया। यह ऐसा कदम है, जिसकी कोई नरेंद्र मोदी से स्वाभाविक अपेक्षा नहीं कर सकता था। उनके विरोधियों ने उनकी छवि पाकिस्तान से बदला लेने वाले मुस्लिम विरोधी नेता की बना दी है। मगर उन्होंने शरीफ, करजई के साथ ही बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हसीना बेगम को भी बुलाया है। सेक्यूलर खेमे को सन्न कर देने वाले इस कदम की उमर अब्दुल्ला और मीरवाइज जैसों को भी तारीफ करनी पड़ी है।
वास्तव में मोदी सरकार का मजबूत पक्ष अर्थव्यवस्था और विदेश नीति ही रहने वाला है। मोदी के आने का संकेत मिलते ही जहां रुपये में मजबूती शुरू हो गई, वहीं जापान, चीन, कोरिया तथा पूर्वी एशिया के देशों ने भी उत्साह दिखाया है। निश्चय ही मोदी सरकार में भारत और जापान के रिश्ते एक नई ऊंचाई छुएंगे। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में लोकतांत्रिक जापान भारत का सर्वोत्तम मित्र कहा जा सकता है। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने सबसे पहले मोदी से बात की और उन्हें जापान आने का निमंत्रण दिया। वैसे मोदी जुलाई में ब्रिक्स की बैठक में हिस्सा लेने ब्राजील जाएंगे। वह ब्राजील जाने का मार्ग जापान होकर चुन सकते हैं। इस तरह उनकी पहली विदेश यात्रा जापान की हो सकती है।
बदलते हुए सामरिक समीकरण समुद्री क्षेत्र को अधिक से अधिक महत्व देते जा रहे हैं। हिंद महासागर, दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर भविष्य की सामरिक नीति के मुख्य आधार बने हैं, जो भारत सहित पूर्वी देशों की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करते हैं। इसीलिए ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका को मिलाकर बना ब्रिक्स संगठन अब ब्रेटनवुड संस्थानों जैसे विश्व बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। मोदी सरकार को ब्रिक्स तथा आसियान की ओर अधिक ध्यान केंद्रित करना होगा।
दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भारत और चीन के साथ संबंधों का है। यद्यपि चीन के साथ हमारा सीमा विवाद है, लेकिन नरेंद्र मोदी का यही मानना है कि विवादों को वाजपेयी नीति के अंतर्गत वार्ता के माध्यम से सुलझाने की प्रक्रिया जारी रखनी चाहिए और अन्य विवाद रहित क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाते रहना चाहिए। भारत और चीन के मध्य व्यापार का वर्तमान स्तर 2015 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। चीन चाहे भारत का शत्रु हो या मित्र, लेकिन वह भारत का सबसे बड़ा पड़ोसी है, जो दुनिया की सुपर सैन्य और आर्थिक शक्ति भी है। उसके साथ वार्ता और सहयोग का क्रम जारी रखना भारत के लिए एक परिपक्व विदेश नीति का हिस्सा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि चीन के किसी भी दबाव में हमें आना होगा, जैसा कि यूपीए सरकार की स्थिति रही थी।
नरेंद्र मोदी भारत के ऐसे पहले नेता हैं, जिन्होंने अरुणाचल प्रदेश जाकर वहां की जनसभा में चीन के विस्तारवादी रवैये को खुलकर चुनौती दी थी। अब तक भारत के किसी नेता ने इस प्रकार की भाषा का भी उपयोग नहीं किया था। चीन की पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में बड़ी उपस्थिति और पाकिस्तानी कब्जे में भारतीय कश्मीर के गिलगित क्षेत्र में चीनी सैनिकों का सक्रिय होना जहां भारत को अस्वीकार्य है, वहीं बांग्लादेश और श्रीलंका में चीन की बढ़ती सक्रियता हमारे लिए चिंता का विषय है। पाकिस्तान को चीन से सैन्य सहायता भी जारी है। इस परिस्थिति में भारत के लिए चीन के बरक्स अपनी ताकत बढ़ाने और पूर्वी क्षेत्र के सभी लोकतांत्रिक देशों के साथ अपनी दोस्ती और सामरिक समझौते को मजबूत करना आवश्यक होगा। हालांकि चीन भी भारत से मित्रता बढ़ाने का संकेत दे रहा है, और उसने भी मोदी के बयान को नकारात्मक नहीं लिया। विश्व में किसी विदेशी भाषा से (अंग्रेजी के अलावा) मोदी की विकास दृष्टि तथा जीवन पर लिखी मेरी पहली पुस्तक भी चीनी भाषा में ही आ रही है।
भारत के अन्य घनिष्ठ और निष्ठावान मित्र रूस और इस्राइल हैं। पिछले दस वर्षों में मुस्लिम वोट बैंक के भय से मनमोहन सिंह सरकार ने इस्राइल के किसी बड़े नेता को आमंत्रित नहीं किया। यह अच्छा कदम होगा कि मोदी सरकार इस्राइल के किसी वरिष्ठ नेता को आमंत्रित करे। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन भारत के अभिन्न मित्र हैं। अब भी हमारी 80 फीसदी से अधिक रक्षा आपूर्ति अथवा युद्धक विमान पनडुब्बियां, हथियार, युद्धपोत रूस से ही आते हैं। लोगों की इच्छा भी है कि नरेंद्र मोदी पुतिन जैसे मजबूत राष्ट्रीय नेता बनें। यूपीए सरकार का पुतिन के साथ उतना उत्साहवर्धक सहयोग नहीं दिखा, जितना उसका झुकाव अमेरिका के प्रति था। इस असंतुलन को भी ठीक करने की जरूरत होगी।
जहां तक अमेरिका और यूरोप का प्रश्न है, इनके साथ परंपरागत मैत्री संबंध जारी ही रखे जाएंगे, लेकिन मनमोहन सिंह सरकार की तरह दबाव में नहीं। यदि मोदी सरकार अमेरिका के साथ बिना किसी पूर्वाग्रह के भविष्य के सामरिक सहयोग के लिए रास्ता तय करेगी, तो अमेरिका से भी अपेक्षा होगी कि वह अपनी एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था वाली दादागिरी नीति छोड़े।
नेपाल, भूटान, श्रीलंका हमारे मैत्री संबंधों के रडार पर बहुत प्रमुख स्थान रखते हैं। ऐसा लगता है कि नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला और भूटान के राजा मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में आएंगे। यह विश्वास है कि आने वाला समय मोदी की विदेश नीति की सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित करेगा।