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ऊंची विकास दर का मायाजाल

Thu, 12 Feb 2015 09:22 PM IST
देविंदर शर्मा
देविंदर शर्मा Updated Thu, 12 Feb 2015 09:22 PM IST
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illusion of high growth rate.

यह एक अंधी दौड़ है। चीन के साथ लंबे समय से चली आ रही इस तथाकथित आर्थिक प्रतिस्पर्धा में भारत लगातार अपनी ऊंची आर्थिक विकास दर का प्रदर्शन करने के लिए बेचैन रहा है। दूसरी ओर चीन है, जिसने अपनी रफ्तार धीमी करते हुए ज्यादा टिकाऊ विकास दर हासिल करने का वायदा किया है। जबकि भारत की दौड़ खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही। गौरतलब है कि आधार वर्ष को बदलते हुए भारत ने कामयाबी के साथ विकास दर को वर्तमान 4.7 फीसदी से बढ़ाकर 6.9 प्रतिशत पर पहुंचा दिया है, और इसके साथ उसके सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की विकास दर में तकरीबन 50 फीसदी का इजाफा किया है। अपने इस कदम के साथ भारत, नाईजीरिया और घाना जैसे देशों की सूची में शामिल हो गया है, जिन्होंने अपने जीडीपी अनुमानों को संशोधित करते हुए इनमें क्रमशः 90 और 60 फीसदी तक की बढ़ोतरी की है।

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हालांकि 18 खरब डॉलर के कुल मूल्य वाली भारतीय अर्थव्यवस्था पर इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। इसका यह मतलब भी नहीं है कि लोगों की जेब में ज्यादा पैसा पहुंचने लगेगा। मगर जीडीपी की ऊंची विकास दर निवेशकों और नीति नियंताओं को 'फील गुड' जैसा एहसास जरूर देती है। मगर इस जमीनी सच्चाई को समझना बेहद जरूरी है कि जीडीपी में आया यह उछाल आंकड़ों की बाजीगरी के सिवाय कुछ नहीं है। दरअसल इसकी वजह महज इतनी है कि आधार वर्ष को 2004-05 से 2011-12 कर दिया गया है।
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एक ऐसे देश में, जहां ऊंची विकास दर का गलत ढंग से विश्लेषण करते हुए इसे विकास, रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन की दिशा में मील का पत्थर समझने की प्रवृत्ति बेहद आम है, उच्च विकास दर का ऐसा मायाजाल बुनना वाकई हैरत में डालने वाला है। ऐसी स्थिति खासकर तब और दिलचस्प बन जाती है, जब जीडीपी के आंकड़ों को लेकर मीडिया आए दिन शोरगुल मचाता रहता है और ज्यादातर विश्लेषकों को मालूम ही नहीं होता कि उच्च विकास दर का सीधा जुड़ाव ज्यादा नौकरियों से नहीं होता। शायद इन्हीं वजहों से वित्त मंत्री पर भी लगातार ऊंची विकास दर दिखाने का दबाव बना रहता है। कोई पसंद करे या नहीं, सच्चाई यही है कि तमाम व्यवहारिक उद्देश्यों के मद्देनजर आर्थिक मोर्चे पर जीडीपी को सरकार के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड माना जाता है।
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अलबत्ता स्मार्टफोन और एलईडी टेलीविजन को जीडीपी आकलनों में शामिल करके विकास दर को बढ़ाने के सिवाय भी घरेलू अर्थव्यवस्था में योगदान को मापने के दूसरे नए तरीके हैं। अब इंग्लैंड को ही लें, जिसने 'विविध वस्तुएं और सेवाएं' वर्ग में वेश्यावृत्ति और दवाओं के अवैध व्यापार से होने वाली आय को भी शामिल करने का फैसला किया है। इससे इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था में इस वर्ग का कुल योगदान तकरीबन कृषि के बराबर हो गया है। इस प्रवृत्ति को वैश्विक स्तर पर अपनाए जाने पर इंग्लैंड के राष्ट्रीय आंकड़ा कार्यालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार जो ग्रीस का कहना है, 'अर्थव्यवस्थाओं के विकास के साथ-साथ उन ढंगों का भी विकास होता है, जिनके जरिये हम उन्हें मापते हैं। पूरी दुनिया में यही हो रहा है। हम यूरोप के अपने दूसरे साथियों और विश्व के दूसरे देशों के साथ इस एजेंडे पर काम कर रहे हैं।'

अगर यही कसौटी सभी देशों ने अपना ली, तो कहीं ऐसा न हो कि किसी देश की आर्थिक प्रगति का आकलन वेश्यावृत्ति और दवाओं के अवैध व्यापार में ज्यादा नौकरियों के सृजन से होने लगे। कुछ समय पहले वरिष्ठ पत्रकार एम जे अकबर ने अपने एक कॉलम में यह दिखाने की कोशिश की थी, कि आज के दौर में आर्थिक विकास को किस चश्मे से देखा जा रहा है। उन्होंने तत्कालीन रूसी वित्त मंत्री का जिक्र किया, जिन्होंने देश की गिरती विकास दर को संभालने के लिए अपने देशवासियों से ज्यादा से ज्यादा वोदका पीने की अपील की। इस तरह से समझें, तो अगर आप ज्यादा पेड़ काटेंगे, तो जीडीपी का कांटा ऊपर जाएगा। अब यह आपको तय करना है कि पेड़ चाहिए, या उन्हें काटकर जीडीपी को बढ़ाना आपका मकसद है।

शायद आपको धक्का लगे, मगर यह सच है कि हम पर्यावरण और पृथ्वी को जितना अधिक नुकसान पहुंचाएंगे, विकास दर उतनी ही ऊंची होती जाएगी। ऐसे ही, अगर बायो तकनीकी कंपनियों को आपके भोजन और पर्यावरण में जहर घोलने की अनुमति दी जाए, तो स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ेगा, और जीडीपी भी बढ़ेगी। आपका घर अगर समुद्र के तट पर हो, और उस समुद्र में तेल फैला दिया जाए, तो आप इसे आर्थिक अवसर की तरह देखेंगे या पर्यावरणीय आपदा की तरह? ह्यूस्टन की एक तेल पाइपलाइन कंपनी ने कनाडा के नेशनल एनर्जी बोर्ड के सामने लिखित तौर पर स्वीकारा कि समुद्र में तेल का फैलाव अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा होता है। इस कंपनी के मुताबिक समुद्र से तेल की सफाई से पीड़ित समुदाय, क्षेत्र विशेष और सफाई की सेवाएं उपलब्ध कराने वालों के लिए व्यापार और रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। सीएनबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रीय आंकड़ों में इन्हीं भूलों की वजह से दुनिया के तकरीबन 70 शहरों और छोटे देशों ने पिछले वर्ष जीडीपी के जरिये अर्थव्यवस्था को मापने का रास्ता छोड़ दिया है। रिपोर्ट में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कथन का उल्लेख है। वह कहते हैं, 'अपने नायकों की तलाश में अब हम जीडीपी विकास दर के सहारे नहीं रह सकते।'


सच्चाई यह भी है कि जीडीपी से जुड़े आंकड़े इतने ही अचूक होते तो भारत में 2004-05 से 2013-14 के दौरान, जब विकास दर औसतन सात प्रतिशत से अधिक रही थी, दस वर्षों में महज 1.5 करोड़ रोजगार ही सृजित किए जा सके, जबकि हर वर्ष 1.2 करोड़ रोजगारों की जरूरत थी। साफ है, जीडीपी जितना ज्यादा होगा, नौकरियां उतनी अधिक होंगी, इस सोच के पीछे छिपा झूठ अब बेनकाब हो चुका है।

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