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मनुष्य प्रजाति: प्रश्न करने की प्रच्छन्न परंपरा

Sun, 03 Oct 2021 03:14 AM IST
gautam chatterjee गौतम चटर्जी
Updated Sun, 03 Oct 2021 03:14 AM IST
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सार
भारतीय विद्या वांग्मय में प्रतिप्रश्न और प्रतिवचन की प्रच्छन्न परंपरा रही है। कई बार आशीर्वाद या दान के फलस्वरूप भी प्रश्न स्वीकार किए जाते हैं। यम से तीसरा वरदान बालक नचिकेता ने प्रश्न रूप में ही मांगा था। यम ने प्रतिप्रश्न नहीं किया था।
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Human species: disguised or hidden tradition of questioning
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : Pixabay

विस्तार

मनुष्य प्रश्न क्यों करता है, इस पर आज अगर प्रताप नारायण मिश्र, श्याम सुंदर दास या हजारी प्रसाद द्विवेदी होते, तो श्रेष्ठ लिखते। वे शायद यहां से शुरू करते कि बालक प्रश्न क्यों करता है या सभी प्रजातियों में मनुष्य ही प्रश्न क्यों करता है। लेकिन मनुष्य प्रश्न स्तरीय या स्तरहीन क्यों या कैसे करता है, इस पर तो हम बात कर ही सकते हैं। ऐसे दौर में तो अवश्य ही, जब प्रश्न करना ही प्रश्नांकित होता गया है। जिद्दू कृष्णमूर्ति कहा करते थे कि यदि प्रश्न सही किया जाए, तो उत्तर भी सही मिलता है। कई बार तो उत्तर से दिख जाता है कि प्रश्न निरर्थक था। रेडियो के दौर में जावेद अख्तर ने एक बार अमिताभ बच्चन से पूछा था कि अगर एक बार फिर मुगल-ए-आजम बने, तो वह कौन-सी भूमिका निभाना चाहेंगे। 



अमिताभ ने उत्तर दिया था कि अगर एक बार फिल्म अच्छी बन गई, तो उसे दोबारा बनाने की जरूरत क्या है? इसके काफी समय बाद एक अंग्रेजी अखबार द्वारा आयोजित स्टेज शो में श्याम बेनेगल से पहला ही प्रश्न शबाना आजमी ने पूछा कि अंकुर फिल्म उन्होंने 1973 में बनाई थी, उसे यदि वह इस दौर में बनाएं, तो उसमें कहां और क्या परिवर्तन करेंगे? उत्तर में बेनेगल ने प्रतिप्रश्न किया कि वह दोबारा अंकुर बनाएंगे ही क्यों?


भारतीय विद्या वांग्मय में प्रतिप्रश्न और प्रतिवचन की प्रच्छन्न परंपरा रही है। कई बार आशीर्वाद या दान के फलस्वरूप भी प्रश्न स्वीकार किए जाते हैं। यम से तीसरा वरदान बालक नचिकेता ने प्रश्न रूप में ही मांगा था। यम ने प्रतिप्रश्न नहीं किया था। उन्होंने प्रथम दोनों वरदान पर प्रतिवचन दिया था कि ऐसा ही हो। भारतीय परंपरा में संवाद की शिष्टता प्रश्न से ही बनाई गई है। सम्यक प्रश्न से ही संवाद की स्थिति बन सकती है, इस संस्कार को शिक्षा का दर्जा दिया गया है। इसी कारण प्राच्य विद्या के सारे ग्रंथ संवाद शैली में रचे गए हैं। यम-नचिकेता संवाद, याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद, जनक-अष्टावक्र संवाद, उर्वशी-पुरुरवा संवाद, कृष्ण-अर्जुन संवाद, यक्ष-युधिष्ठिर संवाद आदि। 

वैदिक ग्रंथों में भी पूर्व और उत्तर पक्ष की व्यवस्था दी गई है। ऐसे सभी संवादों में अनिवार्य रूप से प्रथम व्यक्ति ने प्रश्न किया है और अन्य ने उत्तर दिया है। उत्तर देने से ही वह ग्रंथ बना है। गीता के शांकर भाष्य में जगह-जगह पर प्रश्न किए गए हैं शंका के रूप में, शंकर ने उनका समाधान किया है। इन सभी जगहों पर समस्त प्रश्न मनुष्य के जीवन और उत्तर जीवन को लेकर ही हैं। जीवन को लेकर सारे प्रश्न नैतिक मूल्यों के इर्द-गिर्द ही देखे गए हैं। मनुष्य के नैतिक मूल्यों का उसके सामाजिक या राजनीतिक जीवन से सामंजस्य ही ग्रंथों में अभिष्ट है। अध्यात्म के संदर्भ में भी प्रवेश की शर्त नैतिक जीवन शैली ही तय की गई है।

महाजनपद युग यानी राजाओं के शासन में भी राजा और प्रजा के नैतिक शिष्टाचार को उत्कृष्ट माना गया था। प्रश्न करने पर राजा प्रसन्न होता था और कभी प्रश्न करने का प्रायश्चित भी करना पड़ता था। ग्रंथों और ऋषि-मुनियों द्वारा राजाओं को उपदेश और निर्देश भी दिया जाता था कि वे राज्य में सुशासन कैसे करें। राजा स्वयं ज्ञानी और शिक्षित मनुष्यों से संपर्क करता था कि अधिक योग्य कैसे बने। जैसे, कौटिल्य अपने अर्थशास्त्र में उपदेश देते हैं कि गर्मी में लगभग सूख गई नदी को प्रकृति जैसे वर्षाकाल में अधिक जल लौटाकर संतुष्ट कर देती है, राजा को प्रजा से कर वैसे ही लेना चाहिए। या जैसे भंवरा फूलों से रस ग्रहण करता है और फूल का न रंग उड़ता है, न उसके स्वरूप में कोई फर्क पड़ता है, प्रजा से राजा को कर ऐसे ही लेना चाहिए।

स्पष्ट है कि प्रश्न का आधार हुआ करता था मनुष्य की नैतिक जीवन शैली। बाद में ऐसे प्रश्नों और शंकाओं के स्तर को दूसरी दिशा दी जाती थी। यानी आंतरिक स्थिति या मनःस्थिति पर प्रश्न। यहां से एक भारतीय का आध्यात्मिक जीवन आरंभ होता था। ऐसे उत्तर जीवन का प्रथम आधार भी प्रश्न ही होता था, जैसे-जीवन क्या है, स्त्री, पुरुष, प्रकृति, सौंदर्य, ईश्वर, बुराई, दुख, नियम, पृथ्वी, मृत्यु, आनंद आदि क्या हैं, क्यों हैं, आदि। सम्यक प्रश्न करना योग्य होना होता है। इससे पात्रता आती है। मनुष्य होने की गरिमा दिखती है। आत्मसम्मान का गौरव प्रतिष्ठित होता है। 

काशी में 20 वीं शती के मध्य में एक महापुरुष हुए पंडित गोपीनाथ कविराज। वह कहते थे कि शिव ज्ञान के पर्याय हैं। संसार में ज्ञान प्रतिष्ठित करने की शिव इच्छा के कारण वह मनुष्य में सदाशिव स्तर पर प्रकट होते हैं, यानी अपने को दो रूपों में व्यक्त करते हैं-शिव और शक्ति। इसे हम मन के दो रूपों में समझते हैं। जो मन प्रश्न करता है, वह है संशयात्मिका शक्ति और मन का ही जो दूसरा भाग उत्तर देता है, वह है निश्चयात्मिका शक्ति। प्रश्न भी हमारे भीतर से आता है और उत्तर भी हमारे भीतर ही रहता है। उत्तर कभी बाहर नहीं मिलता।

मनुष्य मन के इन्हीं दो रूपों को भारतीय ग्रंथों में संवाद शैली के रूप में दर्शाया गया है। अर्जुन प्रश्न मन, तो कृष्ण हमारा उत्तर मन। नचिकेता-यम या गार्गी-याज्ञवल्क्य संवाद भी हमारे आंतरिक संवाद की प्रतीक शास्त्र उपस्थितियां हैं। उत्तर मन ही हमें उत्तर जीवन का इशारा सौपता है। गंगा को उत्तर वाहिनी इसी अर्थ में कहा गया है। ऐसा आलोकवर्षी जीवन मनुष्य ने इसी भारतीय पृथ्वी पर जिया है। वह इसीलिए आज भी प्रश्न करने का साहस रखता है। अंतर्दृष्टि से प्रकाशित अंतश्चेतना उसका उत्तर है।

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