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कैसे निकलेगा अवसाद की समस्या का निदान

मुकुल श्रीवास्तव Updated Fri, 03 Apr 2015 07:43 PM IST
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how to diagnose depression

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आमतौर पर भारत खुशहाल दिखता है, लेकिन हकीकत कुछ अलग है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक भारत छत्तीस प्रतिशत की अवसाद दर के साथ दुनिया के सर्वाधिक अवसाद ग्रस्त देशों में एक है। मानव संसाधन के लिहाज से ऐसे आंकड़े किसी भी देश के लिए अच्छे नहीं कहे जाएंगे, जहां हर चार में से एक महिला और हर दस में से एक पुरुष इस रोग से पीड़ित हो। वर्ष 2001 से 2014 के बीच देश में 528 प्रतिशत अवसाद रोधी दवाओं का कारोबार बढ़ा है। फार्मास्युटिकल मार्केट रिसर्च संगठन एआईओसीडी एडब्लूएसीएस के अनुसार भारत में अवसाद रोधी दवाओं का कारोबार बारह प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रहा है।
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'डेली' (डिसेबिलिटी एडजस्ट लाईफ ईयर) में मापा जाने वाला यह रोग विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 2020 तक बड़े रोगों का सबसे बड़ा कारक बन जाएगा। अवसाद से पीड़ित व्यक्ति भीषण दुख और हताशा से गुजरते हैं। उल्लेखनीय है कि हृदय रोग और मधुमेह जैसे रोग अवसाद के जोखिम को तीन गुना तक बढ़ा देते हैं। समाजशास्त्रीय नजरिये से यह प्रवृत्ति हमारे सामाजिक ताने-बाने के बिखरने का संकेत दे रही है। बढ़ता शहरीकरण और एकल परिवारों की बढ़ती संख्या लोगों में अकेलापन बढ़ा रही है और संबंधों की डोर कमजोर हो रही है। बदलती दुनिया में विकास के मायने सिर्फ आर्थिक विकास से ही लगाए जाते हैं, जबकि सामाजिक पक्ष को एकदम से अनदेखा किया जा रहा है। शहरों में संयुक्त परिवार इतिहास बनते जा रहे हैं, जहां लोग अपने सुख-दुख बांट लिया करते थे। इसका निदान लोग अधिक व्यस्तता में खोज रहे हैं, नतीजा अधिक काम करना, कम सोना और तकनीक पर बढ़ती निर्भरता। मानसिक स्वास्थ्य की कीमत पर आर्थिक विकास हो रहा है। इस तरह अवसाद के एक ऐसे दुश्चक्र का निर्माण होता है, जिससे निकलना लगभग असंभव होता है।


अवसाद से निपटने के लिए नशीले पदार्थों का सेवन इसकी गंभीरता को बढ़ा देता है। जागरूकता की कमी के कारण इस बीमारी के लक्षण भी ऐसे नहीं हैं कि इसे आसानी से पहचाना जा सके। आमतौर पर इनके लक्षणों को व्यक्ति के मूड से जोड़कर देखा जाता है। अवसाद के लक्षणों में हर चीज को लेकर नकारात्मक रवैया, उदासी और निराशा जैसी भावना, चिड़चिड़ापन, भीड़ में भी अकेला महसूस करना और जीवन के प्रति उत्साह में कमी आना है। ये ऐसे लक्षण नहीं हैं, जिनसे लोगों को इस बात का एहसास हो कि वे अवसाद की गिरफ्त में आ रहे हैं। आम लोगों की नजर में तो इन संकेतों को सामान्य माना जाता है। दूसरी समस्या है कि ज्यादातर भारतीय मनोचिकित्सक से मशविरा लेने में हिचकते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा करने पर वे पागल घोषित कर दिए जाएंगे। इस धारणा को खत्म करना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है।

हमारे यहां कोई स्वीकृत मानसिक स्वास्थ्य नीति नहीं है और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल विधेयक अभी संसद में लंबित है, जिसमें रोगियों की देखभाल और संबंधित अधिकारों का प्रावधान है। हमारे यहां मनोचिकित्सकों की भी भारी कमी है। देश में 8,500 मनोचिकित्सक, 6,750 मनोवैज्ञानिकों और 2,100 नर्सों की कमी है। इस समस्या से निपटने के लिए सांस्थानिक सहायता भी जरूरी है। समस्या की पहचान हो चुकी है, अब देखना है कि हम इसका निदान करने के लिए कैसी पहल करते हैं!

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