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राहुल बदल पाएंगे कांग्रेस को!

Fri, 29 May 2015 08:22 PM IST
रशीद किदवई
रशीद किदवई Updated Fri, 29 May 2015 08:22 PM IST
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how much change can Rahul deliver?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'अच्छे दिन' लाने का जो वायदा किया था, वह सत्ता में आने के एक वर्ष के बाद 'बुरे दिनों' से छुटकारे में तब्दील हो गया है। इससे भाजपा के धुर समर्थकों में मायूसी जरूर छा सकती है, मगर फिर भी एनडीए और उसके महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री के लिए बंटा हुआ विपक्ष और कांग्रेस नेता के तौर पर राहुल गांधी का नया अवतार अच्छी खबर है।

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दरअसल, राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस में पुनर्जागरण का जो प्रदर्शन हो रहा है, वह छलावे से ज्यादा कुछ नहीं है। कांग्रेस के चेहरे के तौर पर राहुल की वापसी ने झूठी उम्मीदें पैदा की हैं। उनकी बोलने की शैली सुधरी है, वह लगातार सक्रिय हैं और सोशल मीडिया पर भी वह अपनी आंशिक उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। इससे वह मीडिया के आकर्षण का केंद्र तो बन गए हैं, मगर इससे न तो कांग्रेस की तस्वीर (यों कहें कि दयनीय) सही मायनों में सामने आ रही है, और न ही विपक्ष के सुसंगठित होने की कोई उम्मीद पैदा हो रही है। ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी (एआईसीसी) के उपाध्यक्ष का भविष्य में भारत की ग्रैंड ओल्ड पार्टी (कांग्रेस) के शीर्ष पर काबिज होना तय है। मगर यह भी सच है कि उन्होंने लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं की अब तक उपेक्षा ही की है। अपनी मां सोनिया गांधी के ठीक विपरीत एम करुणानिधि, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, मायावती और के चंद्रशेखर राव जैसे तमाम क्षेत्रीय क्षेत्रपों के साथ उनका कोई तालमेल नहीं है। इतना ही नहीं, यह देखते हुए, कि राहुल खुद उदारीकरण समर्थक और पश्चिम से प्रेरित हैं, उनके नेतृत्व में लेफ्ट के साथ किसी रणनीतिक साझेदारी की संभावनाएं कमोबेश नगण्य दिख रही हैं।
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दूसरी ओर मोदी हैं, जो अतीत की कड़वाहट के बावजूद ममता बनर्जी और जयललिता जैसी अग्रणी क्षत्रपों के साथ कुछ व्यवहारिक तालमेल कायम करने में कामयाब रहे हैं। प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के शपथ ग्रहण के बाद से तकरीबन नौ महीनों तक ममता उनके 'बॉयकॉट' की मुद्रा में थीं। ऐसे में, प्रधानमंत्री के ढाका प्रतिनिधिमंडल में शामिल होने का उनका फैसला काफी महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, भ्रष्टाचार के मामले में जयललिता को कर्नाटक उच्च न्यायालय की क्लीन चिट मिलने के बाद मोदी ने उनसे बात करने में तनिक भी देर नहीं लगाई। इससे एक बार फिर उनकी 'नेताओं के नेता' होने वाली छवि जाहिर हुई है, जो उनकी राजनीतिक सूझबूझ और चतुराई को इंगित करती है। गौरतलब है कि राज्यसभा में बहुमत में न होने की वजह से एनडीए के लिए ममता और जयललिता का समर्थन जरूरी है, ताकि सरकार बगैर किसी अड़चन के अपने विधेयक पारित करा सके।
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कांग्रेस के बहुप्रतीक्षित संगठनात्मक चुनाव फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिए गए हैं। कांग्रेस का कहीं विस्तार हो रहा हो, ऐसा कुछ दिख नहीं रहा है। कर्नाटक, केरल, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में कांग्रेसी भी समझ रहे हैं कि अगले विधानसभा चुनावों में उन्हें विपक्ष की भूमिका ही निभानी पड़ेगी। बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे जिन राज्यों में चुनाव नजदीक हैं, वहां कांग्रेस कहीं दौड़ में नहीं दिखती। सच्चाई तो यह है कि राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण इन राज्यों में अगर कांग्रेस दहाई का आंकड़ा भी छू ले, तो वह खुद को खुशकिस्मत मानेगी। ऐसे में कहा जा सकता है कि 2017-18 तक पूर्वोत्तर के कुछेक राज्यों को छोड़ दें, तो किसी भी राज्य में कांग्रेस की सरकार नहीं बचने वाली। सवाल उठता है कि क्या ऐसे हालात में 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल कांग्रेस का नेतृत्व कर पाने की स्थिति में होंगे। सवाल यह भी है कि अगले चार वर्षों में क्या उनके पास ऐसा संगठन होगा, जो भाजपा और संघ परिवार की संयुक्त ताकत का सामना कर सके।

हालांकि राहुल भी कोई नाउम्मीद राजनेता नहीं हैं। अतीत में उन्होंने समय-समय पर अपनी प्रतिभा, विश्वसनीयता और ताजगी का परिचय दिया है। मसलन, दिसंबर, 2005 का एक वाकया लें। एक मुलाकात के दौरान जब आईटी दिग्गज बिल गेट्स ने अपने अरबों डॉलर वाले बिल गेट्स फाउंडेशन के जरिये भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में कुछ योगदान देने की बात की, तब राहुल तुरंत बोले, 'आप बिहार के लिए कुछ क्यों नहीं करते?' इसके बाद अगले कुछ मिनटों तक राहुल उन्हें बताते रहे कि हर वर्ष किस तरह घातक कालाजार से बिहार में सैकड़ों जानें जाती हैं। बिल व उनकी पत्नी मेलिंडा गौर से उनकी बातें सुनते रहे।

आज कांग्रेस के भीतर ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जो राहुल के नेतृत्व में हर चुनाव में कामयाबी का स्वाद तो चखना चाहते हैं, मगर वह यह भी चाहते हैं कि पार्टी की सफाई की अपनी मंशा में राहुल कभी सफल न हो पाएं। वे नहीं चाहते कि पार्टी में राहुल सबके लिए एक 'जज' की भूमिका में हों, जैसा कि जनवरी, 2014 में जयपुर अधिवेशन में उन्होंने वायदा किया था। वे राहुल को पहचान वाली राजनीति की वकालत करते देखना चाहते हैं, जो सिर्फ जाति, उपजाति और धर्म के आधार पर ही लोगों को आगे बढ़ाए।


वैसे अगर गैर-कांग्रेसी विपक्ष पर नजर दौड़ाएं, तो राजनीतिक फायदे के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी के लिए काफी संभावनाएं दिख रही हैं। जनता परिवार को टूटने से रोकने की मशक्कत जारी है। इस परिवार में चुनाव चिह्न चुनने जैसी साधारण बातें भी मुद्दा बन रही हैं। नए समूह के मुखिया के तौर पर मुलायम सिंह यादव का नाम आने से समाजवादी पार्टी का वह धड़ा नाखुश है, जिसे अखिलेश यादव, राम गोपाल और दूसरे नेताओं के हाशिये पर हो जाने का डर सता रहा है। इसके अलावा मुलायम सिंह की सेहत पर भी सवाल हैं। माकपा के नए महासचिव सीताराम येचुरी आकर्षक जरूर हैं, मगर ममता बनर्जी की हालिया कामयाबी के बाद पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की जल्द वापसी दिन के सपने सरीखी ही लग रही है।

-वरिष्ठ पत्रकार और 24, अकबर रोड के लेखक

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