कितने दिन चलेगी संसद
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पिछले कई दिनों से यह बावरा मन खुद की समस्या के इस सूखे तालाब में डूबा है कि कैसे चलेगा संसद का मानसून सत्र। पहले से ही मंडित है, पक्षी-विपक्षी की कांव-कांव का कोलाहल। बादशाह अपनी फौज के हौसले बढ़ा रहे हैं; मुद्रा मत चूको 'चौहान' की तरह। स्मृति दोष में तो अच्छे-अच्छे अपनी शिक्षा भूल जाते हैं। उधर शहजादे फीता लिए घूम रहे हैं कि छप्पन इंच वाले 5 और 6 के मध्य दशमलव बैठाना है। वैसे हंगामे के बादल 'लाल' और 'भगवे' भी हैं। वे गरजेंगे, भिड़ेंगे और आपस में टकराएंगे। 'सशक्त' महिला इस बला को टालने के लिए 'बैठ जाइए, कृपया अपनी जगह बैठ जाइए' का जाप कर-करके जब थक जाएंगी, तो टीवी स्क्रीन पर अंकित हो जाएगा कि संसद की कार्यवाही स्थगित हो गई है।
वे एक बार फिर टेनिस के खिलाड़ियों की तरह मिक्स्ड डबल्स खेलने के लिए पसीना पोछेंगे। 'सब्सिडाइज्ड' आहार लेकर नई ऊर्जा के साथ एक बार फिर ‘छल-कबड्डी आल-ताल, मेरी मूंछें लाल-लाल’ करेंगे। तमाशा तो होना ही है। कृपया बैठ जाइए, अपनी सीट पर बैठ जाइए... की तस्बीह होगी। व्यापक व्यापकौ व्यापमः ललित-साहित्य और दलित विमर्श- सब कुछ है एजेंडे में। संसद में आस्तीनें चढ़ेंगी, शेम-शेम के नारे उछलेंगे, मेजें थपथपाई जाएंगी और वातानुकूलित दरबार में ‘राग गर्मजोशी’ भी होगा।
मीडिया तो कब से पलक पांवड़े बिछाए खड़ा है। पैनलिस्ट ने भी होमवर्क कर लिया है। भारतीय नारियां इस मौसम में विशेष रूप से आम का अचार डालती हैं, जो बेस्वाद सब्जी के विरुद्ध संघर्ष करना सिखाते हैं। अखबार में भी आम आदमी के लिए 'खबरों का अचार' डाला जाएगा। फीकी राजनीति में कुछ दिनों तक स्वाद ही स्वाद रहेगा। अच्छे-बुरे दिन तो जुमले की बातें हो गई हैं। पब्लिक भी अच्छी-अच्छी बातों के नकलीपन को भांप गई है। कितने दिन चलेगी संसद, राम जाने। लेकिन हे प्रभो! उन्हें माफ करना, वे खुद नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं देशवासियों के लिए।