शरीफ के साथ कितनी दूर तक जा सकते हैं मोदी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मई, 2013 में जब नवाज शरीफ अभूतपूर्व ढंग से तीसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिना देरी किए चुनाव में भारी जीत के लिए शरीफ और उनकी पार्टी पीएमएल-एन को बधाई दी। सिंह ने भारत-पाक संबंधों में एक नया अध्याय जोड़ने के लिए शरीफ के साथ काम करने की इच्छा जताई। उन्होंने शरीफ को भारत आने का न्योता भी दिया। भारतीय जनता पार्टी ने तुरंत ही यह कहते हुए मनमोहन सिंह की आलोचना की कि शरीफ को आमंत्रित करने में उन्होंने जल्दबाजी दिखाई और ऐसा करने से पहले उन्हें भारत के प्रति पाकिस्तान के रवैये में सकारात्मक बदलाव का आकलन करना चाहिए।
पिछले वर्ष से पाकिस्तान के रवैये में ऐसा क्या बदलाव आया, जिसने नरेंद्र मोदी को शरीफ और दक्षेस देशों के अन्य नेताओं को शपथ ग्रहण समारोह में निमंत्रित करने के लिए प्रेरित किया? ऐसा क्यों हुआ कि पिछले वर्ष जिस पार्टी ने कांग्रेस की आलोचना की थी, उसी ने शरीफ और उनकी टीम की दिल खोलकर मेजबानी की? इसका उत्तर बेहद सरल है-यह किसी मंच का उपयोग कर कहीं और मौजूद श्रोताओं को प्रभावित करने की मोदी की रणनीति का एक और उदाहरण है। जैसे इस मामले में श्रोता ऐसे अंतरराष्ट्रीय नेता थे, जिन्हें किंग जॉर्ज पंचम की नियुक्ति के बाद भारत में हुए सबसे बड़े राज्याभिषेक समारोह में शामिल होने के लिए निमंत्रित नहीं किया गया था।
राष्ट्रपति भवन के प्रांगण से मोदी ने जो संदेश दिया, उसके बारे में एक विदेशी विश्लेषक ने इस लेखक को ई-मेल किया। उन्होंने लिखा कि यह कार्यक्रम 'मोदी को पश्चिमी मीडिया द्वारा एक डरावने हिंदू राष्ट्रवादी नेता के रूप में चित्रित किए जाने के विपरीत पश्चिमी जगत के सामने एक बहुआयामी नेता के रूप में' पेश करने में सफल रहा। जिस तरह से मोदी और शरीफ की द्विपक्षीय बातचीत का खुलासा एक दिन बाद हुआ और उसके ठीक बाद उनके कनिष्ठ मंत्री का अनुच्छेद 370 की समीक्षा प्रक्रिया शुरू होने संबंधी बयान आया, उससे स्पष्ट है कि इस निमंत्रण का उद्देश्य दोनों देशों के बीच जारी राजनयिक गतिरोध तोड़ना नहीं था। मगर यह संदेश चला गया कि जैसा ज्यादातर लोग उनसे अपेक्षा करते हैं, मोदी अविवेकी हिंदू कट्टरपंथी नहीं हैं।
फिर भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि मोदी एक जटिल प्रचार अभियान के जरिये प्रधानमंत्री बन गए हैं, जिसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश के खिलाफ तंज जरूरी तत्व थे। कम से कम दो मौकों पर उन्होंने स्पष्ट तौर पर पाकिस्तान का उल्लेख किया। पहली बार मार्च में असम में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, 'असम बांग्लादेश के करीब है और गुजरात पाकिस्तान के। आज असम बांग्लादेशी प्रवासियों के कारण परेशान है, लेकिन पूरा पाकिस्तान मुझसे परेशान है।' उसके कुछ दिनों बाद उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ तीन एके का इस्तेमाल करता है, एके-47 एसॉल्ट राइफल, एके एंटनी (तत्कालीन रक्षा मंत्री) और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल। मोदी आज जिस तरह शांतिदूत बनना चाहते हैं, क्या प्रचार अभियान के दौरान अपनाई आक्रामक छवि को दफना पाने में सक्षम होंगे?
भव्य संकेतों के बावजूद भारत-पाक संबंधों में नाटकीय बदलाव नहीं होने वाला है। हैरानी होगी, अगर मोदी सितंबर में होने वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भाग लेते हैं और वहां शरीफ के साथ अलग से बातचीत करने संबंधी कोई कदम उठाते हैं। यहां यह याद करना प्रासंगिक होगा कि मई, 1998 में दोनों देशों द्वारा परमाणु हथियारों के परीक्षण के मात्र चार महीनों बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने बातचीत की पहल की थी। पर अपने पूर्ववर्ती की तरह मोदी में शांति की भावना अंतर्निहित नहीं है। बल्कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से जुड़े हैं। ऐसे में यह मानना कठिन है कि दोनों मुल्कों के रिश्तों में कोई नाटकीय सुधार आएगा।