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अहिंसा की अपनी परंपरा को कैसे भूल गया चीन 

Sun, 30 Aug 2020 11:27 AM IST
gautam chatterjee गौतम चटर्जी
Updated Sun, 30 Aug 2020 11:27 AM IST
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How China forgot its tradition of non-violence
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : Social media

क्या किसी देश की वैचारिक रीढ़ को पुनर्नवा की जरूरत होती है? चीन जैसे देश की वैचारिक रीढ़ उतनी ही प्राचीन है, जितनी भारत की। ऐसे देश की शताब्दी युगीन राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास यात्रा में कितने भी उतार, चढ़ाव और आलोड़न आए, अदृश्य रूप से मजबूत उसकी वैचारिक रीढ़ देश की गरिमा को बनाए रखती है, जिसकी मजबूती कभी उसके ऋषियों यानी कवियों ने बनाई होती है। भारत में तो ऐसा ही दीखता है, लेकिन चीन के संदर्भ में अब ऐसा नहीं कहा जा सकता। यदि ऐसा होता, तो वह बेवजह युद्धकामी नहीं बना रहता।


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दोनों देशों के बीच फर्क सिर्फ इसी बात का है। और यह पिछली आधी-एक सदी से है। कन्फ्यूशियस और बुद्ध का समय एक है। लाओ जू भी उसी युग में हुए। उन्होंने जो कहा, उसे दोनों देशों के कवियों ने शताब्दियों तक जिया। यही दोनों देशों की वैचारिक रीढ़ हैं। चीन में कवियों की प्राचीन और लंबी परंपरा मिलती है। ईसा पूर्व 12वीं शती से मध्य काल तक इस देश में जितने भी प्रतिनिधि कवि हुए हैं, यदि आप उन्हें ध्यान से पढ़ें, तो देख सकते हैं कि इस देश की वैचारिक रीढ़ कितनी मजबूत और आकर्षक रही है। उस युग में कवि वहां के लोगों द्वारा की जा रही पशु हिंसा को कविता में इस तरह दर्शाते हैं कि एक सामाजिक विवेक की दीर्घकालिक स्थिति बने।


दूरदृष्टि से नहाई ऐसी कविता क्या आज चीन को पढ़ने की जरूरत नहीं रही? अल्पज्ञात है कि छठी शताब्दी में विद्वान परमार्थ ने एक महत्वपूर्ण काम यह किया था कि ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिकाओं का चीनी अनुवाद व्याख्या के साथ वह चीन ले गए थे। कुमारजीव ने भी ऐसा ही महती काम किया था कि वह बौद्ध ग्रंथों, देशनाओं का चीनी अनुवाद चीन ले गए थे। किनके लिए और क्यों? ताकि चीनी युद्ध मानसिकता को जीवन में स्थायी भाव सौंपे? तीन हजार साल की मनुष्य सभ्यता में जीवन को समझने के अपने विराट दर्शन ‘ताओ’ में लाओ जू कहते हैं कि एक महान देश किसी नदी की तलहटी या बिल्कुल निचली गहराई की तरह होता है, एक ऐसी जगह जहां आकर सभी देशों की धाराएं मिलती हैं, एक होती हैं। वह विश्व की मां होती है, शांत और मातृत्वपूर्ण। शांतिप्रिय होने के कारण वह स्थिति की निचली तह को ग्रहण करती है। इसलिए यदि एक महान देश किसी छोटे देश के सामने अपने को विनम्र बनाता है और उसका सम्मान करता है, वह मैत्री के स्तर पर विजयी होता है और छोटे देश का विश्वास अर्जित कर लेता है।

यह है चीन की वैचारिक रीढ़। क्या इसके पुनर्नवा की आवश्यकता आ पड़ी है? क्या पीछे मुड़कर भारत अपनी इस समृद्ध वैचारिकता को देख रहा होता है? क्या अपनी गहरी पहचान के लिए, जो उसकी वास्तविक आस्था है, एक प्राचीन देश को बार-बार ऐसा करते रहने की जरूरत नहीं है? क्या युद्ध या सामाजिक आलोड़न यह नहीं दर्शा देता कि अब अपने पर ही आस्था नहीं रह गई? अपनी संस्कृति की छाया में विश्राम करते किसी भी देश को शांत-सुखद वर्तमान के लिए बद्धमूल द्वंद्वों से बाहर आने की जरूरत होती है। बद्धमूल द्वंद्व का आशय है, जहां अब विचार के लिए कोई जगह रही नहीं। कुछ देशों को छोड़कर पूरा विश्व अभी ऐसी ही राजनीतिक परिणति का हास्यास्पद और दुर्भाग्यपूर्ण प्रहसन बना हुआ है, जिसका दुख उस देश के लोग सीधे और रोज पी रहे हैं। फिर एक महान देश की दीर्घजीवी वैचारिकता का क्या हुआ? क्या हम अपने ही ऋषियों या कवियों को अपमानित नहीं कर रहे? ऋषि, जिन्हें देवता कहे जाने की परंपरा भारत से चीन तक गई थी।

किसी देश का, उसकी वैचारिक रीढ़ का पुनर्नवा कैसे हो? जब हम कहते हैं कि इस देश की एक प्राचीन परंपरा है, तो हम उस देश की उस सांस्कृतिक चेतना की ओर इशारा कर रहे होते हैं, जिसमें अपने को फिर-फिर पुनर्नवा करने की मूल शक्ति निहित और चिह्नित रहती है। एक विराट वृक्ष के फलों में निहित बीजों में उसकी अगली विराटता का महाकाव्य वृक्ष की ही आंतरिक चेतना द्वारा लिखा जा चुका होता है, जिसे सिर्फ नए रूपों में प्रकट होना होता है, जिस प्राचीन वृक्ष की जड़ों को सभ्यता के नाम पर उसी देश का मनुष्य काटने पर तुला रहता है। चीन और भारत की पारंपरिक कलाएं ऐसी ही सांस्कृतिक चेतना को प्रकट करती रही हैं और उस चेतना का जीवंत उपजीव्य रही हैं।

यह चेतना ही नागरिकों की सामाजिक और राजनीतिक समझ को वैचारिक पारदर्शिता देती है और नागरिक इस लायक बनता है कि देश को उसकी गरिमा की याद इस तरह दिलाता रहे कि वह कविताओं और ग्रंथों में वैसा ही स्थान अर्जित करता रहे, जैसा उसकी परंपरा में रहा है। समकालीन चीनी कहानियों को यदि आप पढ़ें, तो भी अभिभूत और कृतकृत्य हुए बिना नहीं रह सकेंगे। इनमें केकड़े खाने की सामाजिक जीवन शैली का वर्णन भर नहीं है। बीती सदी के साठ और सत्तर के दशकों में हमारे देश में हिंदी में लिखी बड़ी कहानियों से बेहतर और मनुष्य को अपनी जीवन नदी में गहरे उतरने की ताकत देती कहानियां हैं ये। इन कहानियों के पास बैठकर जीवन की गहन सरणियों में आसानी से देर तक रहा जा सकता है, देश की वैचारिक रीढ़ के पुनर्नवा की पहल भी की जा सकती है। बिल्कुल सामने तैनात मृत्यु से आंखें भी मिलाई जा सकती हैं और इससे उपर भी उठा जा सकता है। मनमाने व्यभिचार को अपदस्थ भी किया जा सकता है।  

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