रेलवे के अच्छे दिनों की उम्मीद
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इस बार रेल बजट से काफी आशाएं थीं। यह पहले से सुना जा रहा था कि प्रधानमंत्री मोदी और रेल मंत्री सुरेश प्रभु का जोर रेलवे के स्वास्थ्य को सुधारना है। उस लिहाज से एक क्रांतिकारी रेल बजट की उम्मीद की जा रही थी। मगर ये उम्मीदें पूरी तरह से तो नहीं, मगर काफी हद तक टूटती हुई जरूर दिख रही हैं। इसे अच्छा कदम माना जाएगा कि इस बार न तो नई ट्रेनों की घोषणाएं हुईं और न ही बड़ी-बड़ी परियोजनाओं की बात कही गई। मगर यात्री किराये और माल भाड़े की विसंगति खत्म नहीं की गई। रेल मंत्री से उम्मीद थी कि वह यात्री किराया बढ़ाएंगे और माल भाड़े में कमी करेंगे। मगर माल भाड़े में वृद्धि करके उन्होंने विसंगति बढ़ाने का काम किया है। इसी तरह लोकल ट्रेनों के टिकटों पर खर्च हो रहे करीब 23,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी खत्म करने की दिशा में भी ठोस प्रयास की जरूरत थी। मगर इस दिशा में भी यह बजट निराश करता है।
भारतीय रेल की बुनियादी समस्या उसके आधारभूत ढांचे का बेहतर न होना है। रेल मंत्री ने इसके लिए 8.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश जुटाने का लक्ष्य रखा है, मगर इसका रोडमैप क्या होगा, यह उन्होंने नहीं बताया। रेलवे के 20-20 विजन डॉक्यूमेंट में लिखा है कि अगले दस वर्षों में रेलवे को 14 लाख करोड़ रुपये चाहिए। यानी उसे हर साल लगभग 1.40 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है। उस हिसाब से देखें, तो बजट में साढ़े आठ लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य उसी का हिस्सा लगता है। मगर सच्चाई यह है कि रेलवे के आंतरिक संसाधनों से 10-12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा इकट्ठा नहीं हो पाते। और अगर सरकार पीपीपी से पैसे जुटाने की सोच रही है, तो पिछले करीब दस वर्षों में इस मद में भी पैसा नहीं आया है। आंकड़े बताते हैं कि पीपीपी से 39,000 करोड़ रुपये जुटाने का प्रावधान था, मगर 800 करोड़ ही हासिल हो सके हैं।
इसी तरह, ऑपरेटिंग रेशियो में कमी भी एक बड़ा मुद्दा है। ऑपरेटिंग रेशियो यानी हर एक रुपया पैदा करने में कितना पैसा खर्च होता है। इससे यह पता लगता है कि कुल खर्च करने के बाद रेलवे के पास अपने इस्तेमाल के लिए कितना पैसा बचा है। यह रेलवे का महत्वपूर्ण मानक है। पिछले वित्त वर्ष में यह 93.6 प्रतिशत था, जिसे घटाकर इस बार 88.5 प्रतिशत लाने का वायदा किया गया है। आम तौर पर इसे घटाने के दो तरीके होते हैं- या तो अपनी आमदनी बढ़ाइए अथवा खर्च घटाइए। ऑपरेटिंग रेशियो का घटना रेलवे की अच्छी सेहत बताता है, मगर यह कैसे होगा, यह रेल मंत्री ने नहीं बताया। माल भाड़ा तो उन्होंने जरूर बढ़ाया, पर इससे वह भला कितना रुपया जुटा लेंगे। इसी तरह स्टेशनों की स्पॉन्सरशिप के प्रयास पहले भी हुए हैं, मगर हजार-दो हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की आमदनी वहां से नहीं होगी; फिर इसमें समय भी काफी लगेगा। इसी तरह रेलवे के आधुनिकीकरण, सिग्नल टेक्नोलॉजी और ट्रैफिक कैपेसिटी (गाड़ियों के आवागमन की क्षमता) में विशेष तकनीकी ध्यान देने की तरफ भी रेल मंत्री उदासीन दिखे।
जरूरत इस बात की थी कि सरकार डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर विशेष ध्यान देती, खासकर पश्चिमी फ्रेट कॉरिडोर (दिल्ली से मुंबई तक मालगाड़ियों के लिए अलग से रेल पटरियां बिछाने) को तवज्जो दी जानी चाहिए थी। इसे 2012 में ही पूरा होना था। अगर इसे पूरा कर लिया जाए, तो न सिर्फ माल की ढुलाई बढ़ जाएगी, बल्कि यात्री गाड़ियों को भी इससे लाभ होगा, क्योंकि मालगाड़ियों के लिए अगर रेल पटरियां बिछाने से मौजूदा पटरियों पर भार कम होगा, और फिर रेलवे इस पर यात्री गाड़ी चलाकर यात्री सुविधा बढ़ाने के साथ ही अपनी आमदनी भी बढ़ा सकता है। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय रेलवे कर्मचारियों की तुलना में हमारे कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ाने पर भी जोर देना चाहिए। एनटीकेएम (नेट टन किलोमीटर यानी प्रति किलोमीटर मालों की ढुलाई) प्रति रेलवे कर्मचारी या पैसेंजर किलोमीटर प्रति रेलवे कर्मचारी के मानक के हिसाब से हम अंतरराष्ट्रीय मानक के हिसाब से बहुत पीछे हैं। इसे पूरा करने के लिए जरूरी है कि रेलवे अपने कर्मचारियों की संख्या घटाकर उसमें नई-नई तकनीकों का समावेश करे। मगर ऐसी दूरदर्शी सोच नहीं दिख रही है। इसी तरह टिकटों के आरक्षण की समयावधि बढ़ाना भी उत्साहित नहीं करता। चार महीने की समय सीमा तय करने से रिजर्वेशन का भ्रष्टाचार रुकेगा नहीं, बल्कि दलालों को और भी मौका मिलेगा। इसलिए विसंगति बढ़ेगी ही।
बहरहाल, अच्छी बात यह है कि कई दशकों के बाद ऐसा हुआ कि रेलवे बजट में कोई नई ट्रेन चलाने की घोषणा नहीं हुई है। नई ट्रेनों की घोषणा आम तौर पर राजनीति की वजह से की जाती रही है। यानी अब राजनीतिकरण से रेलवे का पीछा छूट रहा है। इसी तरह नई-नई परियोजनाओं की घोषणा नहीं करना बताता है कि सरकार रेलवे की आर्थिक स्थिति सुधारना चाहती है और पूर्व की योजनाओं को पूरा करने के बाद ही नई योजनाएं शुरू करना चाहती है। ऐसा करना जरूरी था, क्योंकि अभी एक लाख तैंतालिस हजार करोड़ की परियोजनाएं लंबित हैं, और करीब-करीब साढ़े चार लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर सर्वे वगैरह हो चुके हैं। जब इन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए पैसे नहीं हैं, तो भला नई परियोजनाओं की घोषणा करने का क्या मतलब?
इसके अलावा यात्री और मालगाड़ियों की गति बढ़ाने की बात भी अच्छा संकेत दे रही है। 160-180 किलोमीटर प्रति घंटे की गति यदि यात्री ट्रेनों की होगी और मालगाड़ियों की 100 किलोमीटर प्रति घंटे, तो इससे रेलवे की आमदनी बढ़ेगी। ट्रेनों की गति बढ़ने से रेलवे की तरफ रुझान ज्यादा बढ़ेगा। बहरहाल, यह सच है कि बजट में होने वाली कई घोषणाएं सिर्फ कागजों तक ही सिमट जाती हैं। मगर इस बार चूंकि प्राथमिकता लोकलुभावन बजट पेश करना नहीं, बल्कि रेलवे की क्षमता बढ़ाना था, इसलिए उम्मीद बनती है कि रेलवे के अच्छे दिन आएंगे। इसका स्वागत होना चाहिए।
-लेखक रेलवे के सेवानिवृत्त वित्त आयुक्त हैं