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खुशियों की होम डिलिवरी
अशोक सण्ड
Updated Tue, 23 Jul 2013 08:41 PM IST
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नदियों के उफान के इस सीजन में यह संयोग है कि टीवी के इश्तहारों में भी ‘खुशियों’ की बाढ़ आई हुई है। पैदाइश इलाहाबाद, साकिन मुंबई के बच्चन साहब को इस बाढ़ में बहते देखकर लगा कि जनाब अकबर इलाहाबादी के वक्त में ‘खुशियों के खजाने’ वाली ‘मैगी’ होती, तो जज साहब कोफ्त के दौरान डबलरोटी खाने का मशवरा कतई न देते। खुशी बजरिये टीवी की रोशन खिड़की आपके हमारे दुआरे खड़ी है। ‘धन’ की किवड़िया तो खोलना ही पड़ेगा।
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मौजूदा हालात में जब खुशी की ‘चवन्नी’ नदारद और रुपया सीनियर सिटीजन की गति प्राप्त खंखार रहा है, ऐसे में टीवी की यह बयार ही भली। कीमत रुपये की घटती है, लेकिन दुखी करते हैं डीजल, पेट्रोल के दाम। आलू, टमाटर और प्याज अलग ‘भाव’ खा रहे हैं।
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लाख समझाएं हमारे संत-महात्मा कि सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, लेकिन हम भक्तों के पल्ले तो ‘शोले’ वाला सिक्का ही पड़ता है, जिसमें दोनों तरफ या तो सुख हैं या फिर बोथ साइड दुख। नसीब अपना-अपना। बावरा मन देव साहब की हम दोनों के गीत के बोल पर अटक रहा है।
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सुख और दुख के रास्ते बने हैं सबके वास्ते। जहां में ऐसा कौन है, जिसको गम मिला नहीं। पचासेक साल पहले वाली सोच और सिचुएशन आज भी मौजूद है। बीते दिनों तो दुख का ‘पहाड़’ ही टूट पड़ा।
खैर, आम आदमी की जिंदगी से गैर-हाजिर होती खुशी में ‘टीवी-कमर्शियल’ खुशी बांट रहे हैं। ‘खुशियों की होम डिलीवरी’ की शुरुआत पिज्जा बनाने वाली एक कंपनी ने की, तब से आज तक ठंडा बनाने वालों द्वारा ‘बेवजह’ खुशियां बांटने का सिलसिला चालू आहे।
एक तरफ खुशियों की चाबी सौंपती छोटी कार है, तो दूसरे छोर पर खुशियों की प्लानिंग करती बीमा कंपनियां मौजूद हैं। खुशियों का क्या ठिकाना, आने वाले दिनों में बिल्डर खुशियों का बसेरा, शैंपू, डीयो वाले खुशियों की बौछार, चड्डी-बनियान वाले ‘खुशियों का एहसास-फिट है बॉस’ वगैरह-वगैरह बांटते दिखें।
संभवामि युगे-युगे...की थीम पर दो हजार चौदह में हमारे माननीय भी खुशियों के वायदों का टोकरा लिए शर्तिया हमारे-आपके दुआरे खड़े मिलेंगे। ओक्के, बाय, सी यू के इस दौर में कहां गए वे लोग, जो दंडवत पायलागी करने पर कहते थे ‘खुश रहो’। वैसे में तबीयत सहज ही खुश हो जाती थी।