उपराष्ट्रीयताओं से सीखे हिंदी समाज
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राष्ट्र राज्य के दौर में भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा का सबसे बड़ी वाहक वह हिंदी पट्टी ही है, जिसे प्रगतिशील विचारधारा गाय और गोबर पट्टी कहती है। गैर हिंदीभाषी क्षेत्रों और हिंदी भाषी क्षेत्रों के राष्ट्रीयता बोध में फर्क सिर्फ इतना है कि हिंदीभाषी क्षेत्रों की अपनी कोई उपराष्ट्रीयता नहीं है, लेकिन गैर हिंदीभाषी क्षेत्रों की राष्ट्रीयता से पहले अपनी मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, मलयालम आदि उपराष्ट्रीयताओं को लेकर बोध ज्यादा है। यही वजह है कि उनके यहां जड़ों से जुड़ने के साथ ही अपना अलग भाषा और सांस्कृतिक बोध है। लेकिन इसके ठीक उलट राष्ट्रीयता बोध से भरी हिंदी पट्टी की स्थिति है। यहां अपनी परंपरा, संस्कृति और भाषा पर किसी भी हद तक सवाल उठाए जा सकते हैं।
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उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किए जाने को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं, उससे इसी धारणा को बल मिलता है। लेकिन गैर हिंदीभाषी क्षेत्रों को देखिए। 1996 में बंबई का नाम बदलकर मुंबई किया गया, तो इसे मराठी समाज ने अपनी अस्मिता की बहाली के रूप में लिया। उसी साल मद्रास का नाम बदलकर चेन्नई और कोचीन का नाम कोच्चि किया गया, तो तमिल और मलयाली अस्मिताओं ने उसका दिल खोलकर स्वागत किया था। 2001 में जब कलकत्ता या कैलकटा का नाम बदलकर कोलकाता किया गया, तो उसे बंगाली अस्मिता और संस्कृति से ही जोड़कर देखा गया। दिलचस्प है कि तब पश्चिम बंगाल में प्रगतिशील विचारधारा वाली बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार थी। 2006 में पांडिचेरी का नाम पुद्दुचेरी किया गया। भारत में नाम बदलने की फेहरिस्त छोटी नहीं है। 1974 के पहले तक वड़ोदरा, बड़ौदा के नाम से जाना जाता था।
कुछ एक आवाजों को छोड़ दें, तो अतीत में शहरों के नाम बदलने को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ। उत्तर प्रदेश सरकार की तमाम मुद्दों पर आलोचना की जा सकती है। लोकतंत्र में आलोचना होना स्वाभाविक भी है। लेकिन इलाहाबाद का नाम बदलने को लेकर की जा रही आलोचना को सहज नहीं माना जा सकता। सोशल मीडिया पर इस नाम बदलने को लेकर कहा जा रहा है कि जिनका इतिहासबोध खराब होता है, वे भूगोल बदलते हैं। अगर यह सही है, तो अतीत में नाम बदलने वालों के भी इतिहासबोध खराब थे, इसीलिए उन्होंने भूगोल बदले।
1960 के पहले तक वाराणसी शहर को आधिकारिक तौर पर बनारस कहा जाता था। इस सांस्कृतिक शहर के लिए जब पौराणिक नाम को आधिकारिक बनाया गया, उन दिनों तो आज की तरह जनसंघ का बोलबाला भी नहीं था। कांग्रेस की केंद्र और राज्य-दोनों जगह सरकारें थीं। कलकत्ता जब कोलकाता हुआ, तब तो वहां पश्चिम बंगाल और केंद्र में कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार थी। इसी तरह केरल में जब भी शहरों के नाम बदले गए हैं, वहां या तो कांग्रेस की सरकार रही या वामपंथी पार्टियों का गठबंधन सत्ता में रहा। लेकिन वहां की जनता ने इसे हाथोंहाथ लिया और इस पर विवाद नहीं हुआ।
यह अस्मिताबोध की बहाली ही थी कि रूस ने लेनिनग्राड का नाम बदलकर सेंट पीटर्सबर्ग किया था और 2003 में उसकी तीन सौवीं सालगिरह धूमधाम से मनाई थी। सेंट पीटर्सबर्ग का नाम सोवियत संघ की कम्युनिस्ट सत्ता ने अपने महान नेता लेनिन के नाम पर रखा था, जिसे बदल दिया गया और लोगों ने हाथोंहाथ लिया था। हिंदीभाषी समाज को भारतीय उपराष्ट्रीयताओं से सीख लेनी चाहिए। अपनी संस्कृति और भाषा के प्रति अस्मिता का बोध ही है कि उन्हें सगर्व बनाता है और इसके दम पर वे विकास की दौड़ में सम्मान के साथ कहीं ज्यादा आगे हैं।