कूटनीति की मेज पर हिंदी
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भाषा के मोर्चे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसी रेखा खींच दी है, जिसके सामने अब तक की सारी रेखाएं छोटी पड़ गई हैं। यह रेखा है कूटनीति की मेज पर हिंदी की। राजनीति यदि जनपथ है, तो कूटनीति राजपथ। कोई भाषा कूटनीति की भाषा यों ही नहीं बन जाती। उसे जनता की भाषा तो होना ही पड़ता है, साथ ही, अभिजात वर्ग की भाषा भी बनना होता है। फ्रेंच को दुनिया भर में कूटनीति की भाषा के रूप में जाना जाता है, तो सिर्फ इसीलिए कि वह दुनिया भर में आभिजात्य की भाषा रही है। उसमें साहित्यिक ऊंचाई है, तो नफासत भी। दुनिया के अनेक देशों तक उसकी पहुंच रही है। अमेरिका के उत्कर्ष के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धीरे-धीरे अंग्रेजी ने उसकी जगह लेने की कोशिश की है, लेकिन अभी तक वह पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाई है। औपनिवेशिक दासता झेल चुके देश ही उसे वैश्विक कूटनीति की भाषा बनाना चाहते हैं।
भाषायी कूटनीति का दूसरा पक्ष यह है कि ज्यादातर स्वतंत्र-चेता देश अपनी भाषा में ही कूटनीति करना चाहते हैं। जबकि वर्चस्ववादी देश चाहते हैं कि उनकी भाषा वैश्विक कूटनीति की भाषा बने। आज अधिसंख्य ताकतवर देश अपनी भाषा में ही कूटनीति करते हैं। ब्रिटेन, अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, चीन और जापान इनमें से कुछ देश हैं। ऐसा नहीं है कि इन देशों के नेता अपने पड़ोसी देश की भाषा नहीं जानते। अपनी सामान्य बातचीत में भले ही वे अन्य भाषा में बात करते हों, लेकिन कूटनीति की मेज पर अपनी भाषा ही बोलते हैं, भले ही उसके लिए दोभाषिया ही क्यों न बिठाना पड़े। वे भारत में अपना राजदूत हिंदी सिखाकर नहीं भेजते।
लेकिन भारत की स्थिति उल्टी रही है। यहां कूटनीतिक काबिलियत के लिए अंग्रेजी जानना जरूरी है। हमारे यहां यह आवाज उठती रही है कि हमें अपनी कूटनीति में अपनी राजभाषा अर्थात हिंदी का इस्तेमाल करना चाहिए। आजादी से पहले इसमें कोई मतभेद नहीं था। लगभग आमराय थी कि स्वाधीन भारत को अपनी ही भाषा में सब काम करने चाहिए। लेकिन आजादी के बाद, जब हिंदी विरोध एक राजनीतिक हथियार बन गया, तब यह काम कुछ मुश्किल हो गया। इसमें सबसे बड़ा विरोध नौकरशाही की तरफ से आया, जो अपने मूल चरित्र में ही यथास्थितिवादी होती है। उसमें भी हमारी विदेश सेवा हमारी दासवृत्ति का सबसे प्रबल उदाहरण रही है।
लंबे अरसे तक उन्हीं युवाओं को विदेश सेवा में प्रवेश मिलता था, जो ऐसे चुनींदा स्कूलों से पढ़े होते थे, जहां पूरी तरह से अंग्रेजी संस्कार दिए जाते थे। उनका भाषायी उच्चारण, चाल-ढाल, खान-पान के तौर-तरीके पूरी तरह से अंग्रेजी की चाशनी में डुबोए होते थे। इसलिए पुराने राजनयिकों में सामंत-रजवाड़े, विदेशों से शिक्षित धनी-मानी लोग ही प्रायः मिलते थे।
आजादी के लगभग तीस साल बाद जब सिविल सेवा परीक्षा में सुधार हुए, तब जाकर मध्यवर्गीय युवाओं को विदेश सेवा में जगह मिलने लगी। वे लोग क्यों हिंदी जैसी जनभाषा को कूटनीति की भाषा बनने देते, जो अंग्रेजी संस्कारों में पले-बढ़े हों? इसलिए हिंदी वालों की यह मांग बनी ही रही कि इसे संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाया जाए। उनकी यह हसरत तब पूरी हुई, जब 1977 में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया। यह भाषण शुरू में अंग्रेजी में लिखा गया था।
जब अटल जी को भरोसा हो गया कि हिंदी में भी भाषण दिया जा सकता है, तब अनुवाद करके पढ़ा गया। लेकिन आज तक हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा नहीं बन पाई है, क्योंकि हमारी सरकार उसके जरूरी बंदोबस्त नहीं कर रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी का प्रयोग दूसरी बार 23 नवंबर, 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने दक्षेस देशों के माले सम्मलेन में किया। इन दो प्रयासों के अतिरिक्त कोई और उदाहरण सामने नहीं आता, जब हमारे किसी नेता ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिंदी में बोला हो। ये दो घटनाएं भी प्रतीकात्मक ही थीं, क्योंकि इनकी वजह से व्यवहार में कोई खास सुधार नहीं आया।
लेकिन जब नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में आए सात पड़ोसी देशों के नेताओं के साथ हिंदी में बातचीत की, तो पहली बार लगा कि अब कूटनीति के अंतःपुर में हिंदी पहुंच रही है। उसके बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी हिंदी में कामकाज शुरू किया। गृह मंत्री राजनाथ सिंह भी संयुक्त राष्ट्र में गए, तो हिंदी में बोले। मोदी ने नेपाल और भूटान की संसदों में हिंदी में भाषण दिया। जापान में भी वह हिंदी में बोले।
अब वह संयुक्त राष्ट्र जा रहे हैं, जहां फिर हिंदी में बोलेंगे। अमेरिका, रूस और चीनी नेताओं के साथ भी वह हिंदी में ही बोलने वाले हैं। प्रधानमंत्री के इस कदम से हिंदी कूटनीति की पटरी पर आएगी। कूटनीतिक वार्ताओं में भाषा आपके देश और जनता का प्रतिनिधित्व करती है। देश के स्वाभिमान की भाषा कोई देशी भाषा ही हो सकती है।
कूटनीति में भाषा की क्या अहमियत होती है, इसे समझने के लिए दो उदाहरण काफी होंगे। आजादी के तुरंत बाद विजयलक्ष्मी पंडित तत्कालीन सोवियत संघ में भारत की राजदूत बनाई गईं। वह 17 अगस्त, 1947 को मॉस्को में जोसफ स्टालिन के पास अंग्रेजी में लिखा अपना प्रत्यय पत्र लेकर पहुंचीं, तो स्टालिन ने उसकी भाषा पर आपत्ति की। उन्होंने कहा कि यह भाषा न आपके देश की है, न मेरे देश की। तब कहते हैं कि रातोंरात हिंदी में लिखा पत्र दिल्ली से मॉस्को भेजा गया। लेकिन भारत के प्रति सोवियत नेताओं का दिल नहीं पसीजा। वे भारत को अंग्रेजों का पिट्ठू ही समझते रहे।
ढाई साल तक विजयलक्ष्मी पंडित मॉस्को में रहीं, स्टालिन ने कभी उन्हें तवज्जो नहीं दी। चीनी प्रधानमंत्री चाओ एन लाई ने नेहरू से कहा कि काश, आप अपनी भाषा में हमसे द्विपक्षीय मुद्दों पर बात कर पाते। नेहरू के पास कोई जवाब नहीं था, तो उन्हें अपनी हाजिर जवाबी का सहारा लेना पड़ा,‘सबसे बड़ी भाषा तो प्रेम की होती है।’ सच बात यह है कि कूटनीति में प्रेम की भाषा नहीं चलती। कूटनीति की कामयाबी इसी में है कि आप अपनी बात मनवा लें। इसके लिए किसी अन्य देश की भाषा से अपनी भाषा ज्यादा मुफीद होती है।