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आसान नहीं उच्च विकास दर
एम के वेणु
Updated Fri, 12 Jun 2015 07:59 PM IST
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पिछले पखवाड़े मौद्रिक नीति संबंधी अपने बयान में रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने राजग सरकार को सावधान किया कि वह वर्ष 2015-16 में उच्च विकास दर हासिल करने और मुद्रास्फीति को नीचे ले जाने के लक्ष्य को आसान न समझे। बल्कि राजन की चेतावनी तो यह है कि अगर केंद्र ने कृषि अर्थव्यवस्था को, जिसके खराब मानसून से प्रभावित होने की आशंका है, पटरी पर लाने के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं की, तो वास्तव में वित्त वर्ष का अंत निम्न विकास दर और उच्च मुद्रास्फीति के साथ हो सकता है।
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केंद्रीय बैंक ने जनवरी, 2016 में मुद्रास्फीति के छह फीसदी की ऊंची दर पर और आर्थिक विकास दर के 7.6 प्रतिशत पर रहने का अनुमान लगाया है। गौरतलब है कि 7.6 फीसदी का यह आंकड़ा पुरानी पद्धति के मुताबिक करीब 5.5 प्रतिशत के बराबर होगा। यूपीए के कार्यकाल के दौरान अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बुरा वर्ष 2013-14 रहा, जब आर्थिक विकास दर लगभग 4.8 फीसदी दर्ज की गई थी। लेकिन नई सरकार ने आधार वर्ष बढ़ाकर आर्थिक विकास दर को जिस तरह आंकड़ों में ऊपर उठाया है, उसके मुताबिक तो 2013-14 की विकास दर नाटकीय ढंग से करीब सात फीसदी हो जाती है! इसलिए सात प्रतिशत से अधिक विकास दर निश्चित तौर पर गर्व करने लायक नहीं है। उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार द्वारा गठित सांख्यिकी समीक्षा समिति आंकड़ों की विश्वसनीयता के मुद्दे पर गौर करेगी।
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रघुराम राजन के आकलन का शेयर बाजार पर बहुत बुरा असर पड़ा और रिजर्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा के बाद बाजार 600 अंक नीचे लुढ़क गया। तब से बीएसई सूचकांक 1,000 अंक से ज्यादा गिर चुका है और पिछले वर्ष राजग सरकार के सत्ता में आने के बाद उसने जो बढ़त हासिल की थी, लगभग वह सब गंवा दिया है।
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बाजार की घबराहट का कारण यह है कि जीडीपी एवं मुद्रास्फीति से संबंधित राजन की भविष्यवाणी ने उस अनिश्चितता को बढ़ा दिया है, जो विकास के प्रचार के बाद भी हाल के महीनों में बढ़ती गई है। राजन संभवतः वैश्विक बाजार के उन खिलाड़ियों एवं निवेशकों के बीच विश्वसनीय बने रहना चाहते हैं, जो मानते हैं कि वह सच बोलने का साहस रखते हैं। राजन ने यह भी कहा कि वह अर्थव्यवस्था के चीयरलीडर नहीं हैं। वे लोग दूसरे हैं, जो ऐसा करते हैं!
इस तरह से रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कुछ विशिष्ट टिप्पणियां की हैं। पहला, मानसून के संदर्भ में अनिश्चितता है और सबसे बुरी खबर यह है कि इस वर्ष दीर्घकालीन औसत के हिसाब से वर्षा 88 फीसदी हो सकती है। यह अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल नहीं है। रिजर्व बैंक ने कच्चे तेल के मूल्य बढ़ने की भी आशंका जताई है, जिससे मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ेगा। राजन के मुताबिक, आगे ब्याज दरों में कटौती इस बात पर निर्भर करेगी कि इन कारकों का क्या रुख रहता है। रिजर्व बैंक इस बात पर भी नजर रखेगा कि सरकार भविष्य में खाद्य भंडारों का प्रबंधन किस तरह करती है। खाद्य भंडारों का बेहतर प्रबंधन मुद्रास्फीति कम करेगा और भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावनाओं के द्वार खोलेगा।
राजन ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील एक दूसरे मुद्दे को भी छुआ है, जिसे संभवतः केंद्र सहजता से नहीं लेगा। जब प्रधानमंत्री मोदी आगामी खरीफ सीजन के दौरान किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने को लेकर राज्य सरकारों के दबाव में हैं, जिनमें भाजपा शासित राज्य भी है, तब केंद्रीय बैंक ने चेतावनी दी है कि उच्च खरीद मूल्य मुद्रास्फीति को बढ़ा सकता है और इससे भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावना घट सकती है।
इससे प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री, दोनों की दुविधाएं बढ़ेंगी। वे न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के पक्ष में हैं, जिसकी हाल के महीनों में किसानों ने मांग भी की है। लेकिन अगर वे ऐसा करते हैं, तो रिजर्व बैंक आगे ब्याज दरों में कटौती नहीं करने के लिए इसका बहाने के रूप में इस्तेमाल करेगा, जिससे उद्योग जगत दुखी हो जाएगा। लिहाजा प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर-तीनों नीति-निर्माताओं के सामने आगे कठिन चुनौती है।
रघुराम राजन ने हालांकि ब्याज दर में 0.25 फीसदी की कटौती की, पर उन्होंने संकेत कर दिया कि आगे कटौती विभिन्न कारकों पर निर्भर करेगी, जिसमें अमेरिकी अर्थव्यवस्था कैसे बर्ताव करती है, यह भी शामिल है। अगर अमेरिकी केंद्रीय बैंक ब्याज दर बढ़ाता है, तो उभरते बाजारों की पूंजी अमेरिकी सरकार के बॉन्ड की तरफ चली जाएगी। भारत से अचानक यदि पूंजी बाहर जाएगी, तो रिजर्व बैंक लघु अवधि के लिए पूंजी के बाह्य प्रवाह को रोकने के लिए ब्याज दर बढ़ाने पर मजबूर हो सकता है।
हालांकि भारतीय उद्योग जगत अगले छह महीनों में ब्याज दरों में कम से कम 1.5 फीसदी की कटौती चाहता है। कोटक महिंद्रा म्यूचुअल फंड के प्रबंध निदेशक नीलेश शाह मानते हैं कि ब्याज दरों में एक फीसदी कटौती से कंपनियों के मुनाफे में सात प्रतिशत सुधार होगा, क्योंकि वैसे में उनके फंड की लागत कम हो जाएगी। उद्योग जगत का तर्क है कि यदि एक बार कंपनी का मुनाफा ऊपर जाता है, तो निवेश चक्र पुनर्जीवित हो जाएगा। हालांकि रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कहा है कि वह सिर्फ कॉरपोरेट बैलेंस शीट के हितों को नहीं देख सकते। इसके बजाय केंद्रीय बैंक दीर्घकालीन आर्थिक स्थिरता को महत्व देगा, जिससे खाद्य आपूर्ति और मुद्रास्फीति प्रबंधन की विश्वसनीयता स्थापित होने की भी उम्मीद है।
विकास को आगे बढ़ाने की कठिन जिम्मेदारी वित्त मंत्री और उनकी टीम को ही निभानी होगी, क्योंकि उन्होंने बजट में वायदा किया था कि सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा निवेश बहाली से ज्यादा रोजगार का सृजन किया जा सकता है और जीडीपी की दर आठ फीसदी से अधिक हो सकती है। रेलवे और सड़क, दो ऐसे क्षेत्र हैं, जो उम्मीद बंधाते हैं कि सरकार द्वारा संचालित निवेश अगले एक वर्ष में अर्थव्यवस्था को ऊपर उठा सकता है।