गरीब देशों की लाचार बेटियां
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सिर्फ बांग्लादेश की लड़कियां नहीं, एशिया और अफ्रीका के और भी अनेक देशों की लड़कियां घरेलू नौकरानी का काम करने के लिए पश्चिम एशिया के देशों में जाती हैं। इथियोपिया की एक लड़की शावला से कुवैत का एक परिवार रोज उन्नीस घंटे काम लेता था। शावला वहां से निकल भागने के बारे में सोचती थी, पर वैसा नहीं कर पाती थी, क्योंकि उस कुवैती परिवार के पास ही उसका पासपोर्ट था। तंजानिया की एक लड़की आतिया कमाने के लिए ओमान गई थी। वहां जिस घर में वह काम करती थी, वहां के लोग उसे पीटते थे। उसके साथ बलात्कार भी होता था। फिलीपींस की एक लड़की का शव एक खाली फ्लैट के फ्रीजर में मिला था। उस फ्लैट का मालिक एक कुवैती था। पैसे कमाने के लिए दूसरे देशों में जाने वाली गरीब लड़कियों की ऐसी कारुणिक कहानियां जब-तब सुनाई पड़ती हैं।
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कतर, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने वादा किया था कि वे प्रवासी लड़कियों पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए कानून बनाएंगे। वह कानून कहां है? प्रवासी श्रमिकों को कफाला नियम के मुताबिक, वीजा दिया जाता है। कफाला की शर्त ही यह है कि मालिक की अनुमति के बगैर श्रमिक उनका काम छोड़कर नहीं जा सकते, एक घर का काम छोड़ दूसरे घर का काम नहीं पकड़ सकते और देश नहीं छोड़ सकते। इन श्रमिकों का पासपोर्ट उनके मालिकों के पास रहता है। श्रमिकों को जितने समय तक काम करने का हुक्म दिया जाता है, उन्हें उतने समय तक काम करना पड़ता है। काम न करने पर उन्हें दंडित होना पड़ता है। अगर वे मालिक का घर छोड़कर भागते हैं, तो उन्हें गिरफ्तार किया जाता है।
काम के लगातार दबाव से, भूख से, अत्याचार और अन्याय से परेशान होकर ये लड़कियां भागना चाहती हैं। कुछ भाग जाती हैं, कुछ नहीं भाग पातीं। सऊदी मालिक समझते हैं कि ये लड़कियां उनकी दासी हैं और दासियों को सजा देने का अधिकार उन्हें है। सजा देने का मतलब है बलात्कार। जॉर्डन, लेबनान, ओमान, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात में भी घरेलू नौकरानियों पर शारीरिक, मानसिक और यौन अत्याचार होता है। गरीब देशों की गरीब लड़कियां जब अमीर देशों में घरेलू कामकाज करने और अपना भाग्य बदलने के लिए जाती हैं, तब वे नहीं जानतीं कि वे बिक गई हैं। ये लड़कियां हजारों सपने लिए हवाई जहाज में बैठती हैं और लाश बनकर घर लौटती हैं। लेकिन गरीबों के मरने से किसी को भला क्या फर्क पड़ता है!
अरब देश अंतरराष्ट्रीय श्रम कानूनों की परवाह नहीं करते। पर मुश्किल यह है कि जो देश अपनी गरीब और मजबूर लड़कियों को दूसरे देशों में काम करने के लिए भेजते हैं, अगर वे कहें कि उनकी लड़कियों को सुरक्षा देनी होगी, तो अमीर देश वहां की लड़कियां न लेकर उन देशों की लड़कियां मंगवाएंगे, जो उनकी सुरक्षा की मांग करने की स्थिति में ही नहीं हैं। उदाहरण के लिए, अगर भारत अपनी लड़कियों की सुरक्षा की शर्त रखता है, तो अरब देश बांग्लादेश से कामकाजी लड़कियां लेंगे। स्पष्ट है कि एक या दो देश अगर अरब देशों का विरोध करते हैं, तो उससे कुछ नहीं होगा। इस मामले में सभी देश अगर एकजुट हो जाएं, अगर वे एक सुर में बोलें कि उनकी लड़कियों को पूर्ण सुरक्षा न मिलने, उन्हें पूरा वेतन न मिलने, उन्हें दासी बनाकर रखने की प्रवृत्ति बंद न करने तक वे अपनी लड़कियां नहीं भेजेंगे, तब शायद कोई समाधान निकले और अरब देश घरेलू कामगारों के हित में मानवीय कानून बनाने में शायद कोई रुचि दिखाएं। उससे पहले तक कुछ नहीं होगा। विडंबना यह है कि जिन सरकारी और गैरसरकारी संगठनों के जरिये घरेलू कामकाज करने के लिए लड़कियां अरब देशों में भेजी जाती हैं, उनके लिए इन लड़कियों की सुरक्षा कोई मुद्दा ही नहीं है।
मेरे पास यह जानकारी है कि सऊदी अरब से जो हजारों लड़कियां बांग्लादेश लौटी हैं, उनमें से 86 फीसदी लड़कियों को वेतन नहीं मिला, 61 फीसदी को शारीरिक अत्याचार झेलना पड़ा, 24 फीसदी लड़कियों को भूखे रहना पड़ता था और 14 प्रतिशत लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ। सऊदी अरब से लौटने वाली इन घरेलू कामगारों में नूरी बेगम भी हैं। बांग्लादेश लौटते ही उन्होंने उस दलाल पर मुकदमा किया, जिन्होंने उसे लालच देकर सऊदी अरब भेजा था। वहां दो महीने काम करने पर भी जब उन्हें वेतन नहीं मिला, तो वह उस घर से निकल भागीं। सजा के तौर पर दो महीने उन्हें जेल में काटने पड़े। चार महीने तक सऊदी अरब में रहने और खाली हाथ लौटने पर उन्हें दलाल पर बहुत गुस्सा आया। लेकिन मुकदमा करने का नतीजा यह हुआ कि दलाल और उसके आदमियों ने उन्हें बुरी तरह पीटा।
असली समस्या दरअसल कफाला नियम को लेकर है। हम अपने यहां कामकाज के लिए किसी महिला को रखते हुए जिन नियमों के मुताबिक चलते हैं, कफाला नियम उसकी परवाह नहीं करता। हमारे यहां काम या घरवालों का व्यवहार पसंद न आने पर कामवालियां काम छोड़ देने के लिए स्वतंत्र हैं। वे जितने भी दिन काम करती हैं, उतने दिनों का पैसा उन्हें दे दिया जाता है। वे घड़ी देखकर आती हैं और तय समय तक वही काम करती हैं, जिसके बारे में उन्हें बताया जाता है। और कामवालियों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने का तो सवाल ही नहीं है। हालांकि क्रूरता के कुछ किस्से यहां भी सुने जाते हैं, पर उनमें कामवालियों को सहानुभूति मिलती है और न्याय भी। बेशक कुछ देशों में कफाला की शर्तें उदार की गई हैं, जैसे कि श्रमिकों का पासपोर्ट मालिकों को रखने का अधिकार खत्म कर दिया गया है। लेकिन घरेलू कामगारों पर यह शर्त लागू नहीं होती।
मुसलमानों के लिए सऊदी अरब एक पवित्र देश है। वह इस्लाम का जन्मदाता है। लेकिन उसी देश के लोग दूसरे देशों की मजबूर लड़कियों को दासी बनाकर रखते हैं। सऊदी अरब के मुसलमान भी कभी गरीब थे। लेकिन तेल के कारण वे अमीर हो गए, तो गरीब मुसलमानों को वे इंसान ही नहीं समझते। इससे फिर यही साबित होता है कि धर्म नहीं, मानवता महान है। और मानवता का उद्भव किसी धर्म से नहीं हुआ।